संस्करण: 27 जून-2011

प्रशासन नहीं, पार्टी सँभालने में व्यस्त रहती हैं मायावती

? सुनील अमर

               उत्तर प्रदे में कानून और व्यवस्था की हालत इन दिनों ज्यादा खराब है। हत्या और बलात्कार जैसे संगीन अपराधों की बाढ़ सी आ गई है। ज्यादा हैरतअंगेज यह है कि ऐसी घटनाओं में पुलिस तथा मंत्रियों व विधायकों की संलिप्तता भी पाई जा रही है। मामला कितना संगीन है इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि ऐसी हर बात और घटना का ठीकरा हमेा केन्द्र और विपक्ष के सिर फोड़ देने वाली मुख्यमंत्री ने अपराधों में वृध्दि को स्वीकार किया है। इसी के साथ यह भी सच्चाई है कि महिलाओं के साथ होने वाले अपराधों में भी खासी बढ़ोत्तरी हुई है। ये सारी घटनाऐं इस परिप्रेक्ष्य में और ज्यादा गंभीर तथा ध्यान आकर्शित करने वाली हो जाती हैं कि उत्तर प्रदे में प्रबल बहुमत के साथ एक दलित महिला मुख्यमंत्री के तौर पर सत्तारुढ़ है।

               सुश्री मायावती चौथी बार उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री हैं। यह उनका रिकार्ड रहा है कि वे अधिकारियों को दंडित करने में हिचकिचाती नहीं चाहे वह अधिकारी आई.ए.एस.ही क्यों न हो। इस बार तो प्रबल बहुमत के चलते उन्होंने अपने ऐसे विधायकों व मंत्रियों को भी जेल भिजवाने में देर नहीं लगाई है जो किसी न किसी प्रकार प्रशासन द्वारा वांछित रहे। पिछले तीन बार के कार्यकाल के मुकाबले इस बार वे ज्यादा दुलर्भ और सख्त हैं,ऐसा शीर् प्रशासनिक अधिकारी ही नहीं बल्कि उनकी पार्टी के विधायक,सांसद और मंत्रीगण भी कहते हैं। बावजूद इस सबके प्रदेश में कानून व्यवस्था की हालत बेहद खराब है और सख्ती के बावजूद मुख्यमंत्री की पकड़ भी नहीं बन पा रही है तो जाहिर है कि उनकी प्रशासनिक प्रणाली में ही कहीं दोष है।

               यह एक स्वाभाविक प्रष्न है कि क्या सख्ती या हनक से प्रशासनिक क्षमता आ जाती है? जाहिर है कि नहीं। प्रशासन को जवाबदेह बनाना जरुरी होता है। मायावती का मौजूदा कार्यकाल विसंगतियों से भरा है। लखनऊ के अम्बेडकर उद्यान में चार साल पहले शपथ लेने वाली दलितों की वह सरकार आज पहचान में ही नहीं है। आज उस सरकार का जो चेहरा रोज-ब-रोज सामने दिखता है, उसमें तो कोई दलित ही नहीं! मायावती तो वही हैं लेकिन बातें अब वे किसी सर्वजन की करती हैं! उनकी प्राथमिकताऐं इस बार बदली हुई है। उत्तर प्रदेष में मजबूत बहुमत प्राप्त कर लेने के बाद उन्होंने न सिर्फ देष के अन्य राज्यों में अपनी पार्टी बसपा को विस्तारित करने व चुनाव लड़ने की योजना पर भाग दौड़ शुरु की बल्कि अपनी काबीना के तमाम विश्वस्त और जातिगत आधार पर उपयुक्त मंत्रियों को भी इस कार्य में लगाया। आरोप तो यहॉ तक हैं कि ऐसे कार्यो में उन्होंने प्रदेश के उन नौकरशाहों का भी इस्तेमाल किया और कर रही हैं जो उनके अनुकूल हैं। इसके विपरीत जो अधिकारी तटस्थ रहना चाहे या मुख्यमंत्री या मंत्रियों के मनोनुकूल कार्य न कर सके उनका उत्पीड़न भी हुआ। नौकरशाही में यह संदेश दिया गया कि या तो हमारे साथ रहो या फिर खामियाजा भोगो। इस तरह के माहौल में, कोई भी अधिकारी या कर्मचारी बस उतना ही काम करता है जिससे उसकी नौकरी किसी तरह बची रहे और दिन कट जॉय। माया सरकार ने इस बार सरकारी कार्य-संस्कृति ही बदल डाली।

               मुख्यमंत्री, मंत्री और वरिष्ठ अधिकारियों के हमेशा इलेक्षनमय रहने का असर प्रशासन पर पड़ना स्वाभाविक ही था। मुख्यमंत्री तक उनके चंद मंत्री और अधिकारी ही सीधे पहुॅच सकते हैं। स्थिति यह है कि पार्टी के वरिष्ठ नेता, विधायक और सांसद हतों इंतजार के बावजूद मायावती से मुलाकात नहीं कर पाते। उनकी तानाशाही का आलम यह है कि पार्टी की बैठकों में वे अगर किसी से कुछ पूछ लें तो दूसरी बात है अन्यथा कोई कितना भी वरिष्ठ क्यों न हो, सुश्री मायावती से कुछ कहने या पूछने की हिम्मत नहीं कर सकता,बात चाहे पार्टी हित की ही क्यों न हो। अधिकारियों/कर्मचारियों की भी यही हालत है। चंद अधिकारी हैं जो सर्वे-सर्वा हैं। इन्हीं के ऑख-कान से मुख्यमंत्री सारे विभागों को देखती-सुनती हैं। किसी भी प्रशासनिक प्रणाली में यह स्थिति ठीक नहीं कही जा सकती। इससे अधिकारियों में जिम्मेदारी के प्रति विरक्ति और कई बार प्रतिक्रिया भी होती है,जिसका प्रतिफलन उत्तर प्रदेश की गिरती कानून व्यवस्था के रुप में देखने को मिल रहा है। इस वर्ष के शुरुआती तीन महीनों में ही राजधानी लखनऊ में 77 लोग कत्ल कर दिये गये जिसमें 22 महिलाऐं थीं! राज्य के बाकी हिस्सों की बदहाली का अनुमान लगाया जा सकता है।

               यह महज संयोग नहीं है कि आज बसपा सरकार के आधा दर्जन से भी अधिक मंत्री और विधायक हत्या और बलात्कार के जुर्म में जेलों में बंद हैं। फैजाबाद जिले के एक बसपा विधायक आनन्दसेन यादव को बलात्कार और हत्या के जुर्म में अभी एक माह पूर्व अदालत ने आजीवन कारावास की सजा सुनाई है। इस प्रकार यह संभवत: दे का एकमात्र ऐसा राज्य हो गया है जिसके इतने ज्यादा विधायक और मंत्री जेल में हैं। बसपा के इस चार साल के कार्यकाल में सबसे त्रासद तो यह जून महीना साबित हो रहा है। इसमें जैसे बलात्कार और हत्याओं की बाढ़ सी आ गई है। गाजियाबाद के भट्टा पारसौल गॉव में किसानों पर गोलीबारी और आतिजनी की घटना की लपट अभी थमी भी न थी कि 19 और 20 जून के 48 घंटों में दु्कर्म और हत्या के छह मामले पुलिस में दर्ज होने से तो सनसनी ही फैल गई। लखीमपुर खीरी जिले के निघासन कस्बे में तो पुलिसकर्मी ही एक मासूम बच्ची को थाने में उठा लाये और उसे बलात्कार के प्रयास में मार डाला। अनुमान लगाया जा सकता है कि पुलिस में दर्ज न हो पाने वाले मामले कितने अधिक होंगें। और यह अपराध किसी एक क्षेत्र में ही हो रहे हों ऐसा भी नहीं है। गोण्डा, फैजाबाद, एटा, कानपुर, लखनऊ, लखीमपुर, गाजियाबाद, फिरोजाबाद, सीतापुर और गोरखपुर! इन सब जगहों से ऐसे ही अपराधों की खबरें आ रही हैं। फिर भी प्रदे के मुख्य सचिव कह रहे हैं कि ये सब तो छिटपुट घटनायें हैं।वर्ष 2012 में उत्तर प्रदेश विधानसभा का चुनाव होने वाला है। सभी राजनीतिक दल अपने प्रत्याशियों की सूची को अन्तिम रुप देने में लगे हैं और आयाराम-गयाराम का खेल भी शुरु हो गया है। जाहिर है कि बसपा प्रमुख भी इन दिनों अपना सारा धयान पार्टी को सँवारने और उसके पेंच कसने में ही लगा रही हैं। प्रदे की इतनी चिंतनीय कानून व्यवस्था के बावजूद अभी गत दिनाें वे महाराष्ट्र का राजनीतिक दौरा कर रही थीं। कोई भी बड़ी वारदात होने पर मुख्यमंत्री एक-दो अधिकारियों को निलम्बित कर यह मान लेती हैं कि जनता तक सही संदे चला गया। अब वे घटनास्थलों पर भी प्राय: नहीं जातीं। पिछले कार्यकाल तक तो वे अधिकारियों को उनके सवर्ण होने का ताना मारकर सार्वजनिक रुप से जलील कर देती थीं, लेकिन इस बार उन्होंने चूॅकि तथाकथित सर्वजन की सरकार बनायी है, इसलिए ऐसे कामों से बच रही हैं। प्रदेष में बुरी तरह बिखरा और हता जैसा दिखने वाला विपक्ष भी उन्हें निष्चिन्त बनाये हुए है। अब देखना यह है कि उनकी यह नि्चिन्तता मतदाताओं को कितना मुतमईन कर पाती है।


? सुनील अमर