संस्करण: 27 जून-2011

मध्यप्रदेश में कांग्रेस-शासन काल में अल्पसंख्यक कल्याण का नया विभाग बना

अल्पसंख्यक आयोग को संवैधानिक दर्जा मिला

? राजेन्द्र जोशी

               मध्यप्रदेश में विगत कांग्रेस-शासन काल के दौरान अल्पसंख्यक कल्याण की दिशा में जितने भी कार्यक्रम लागू हुए उनकी वजह से अनेक मामलों में यह प्रदेश देश का पहला राज्य बनकर उभरा। प्रदेश में भारत को प्रथम वक्फ न्यायालय की स्थापना की गई तथा वक्फ एक्ट के अंतर्गत शैक्षणिक और धार्मिक स्थल,न्यासों और संपत्तियों को रेंट कंट्रोल एक्ट से मुक्त रखने के मामले में यह प्रदेश देश का पहला राज्य भी बना। तत्कालीन मुख्यमंत्री श्री दिग्विजय सिंह के नेतृत्व वाली सरकार में अल्पसंख्यक कल्याण के कार्यक्रम के प्रति मिली तवज्जों के कारण लोगों ने श्री सिंह को मौलाना दिग्विजय सिंह भी कहना शुरू कर दिया था। मध्यप्रदेश सरकार ने पहली बार वर्ष 1994में एक अलग अल्पसंख्यक विभाग कायम किया और अल्पसंख्यक आयोग जिसे पूर्ववर्ती सरकार ने भंग कर दिया था,उसे दिग्विजय सरकार ने बहाल किया और उसे संवैधानिक दर्जा दे दिया। इसी शासनकाल में वर्ष 1996 में मप्र वक्फ एक्ट 1995 के तहत वक्फ बोर्ड की स्थापना की गई। अनुदान प्राप्त मदरसों और मकतबों के दोपहर का भोजन मुहैया कराने वाला यह प्रदेश देश का पहला राज्य बना। सरकार ने अल्पसंख्यक समुदायों की समस्याओं को तेजी से हल करने के लिए राज्य स्तरीय समिति बनाई जिसका अधयक्ष राज्य अल्पसंख्यक आयोग के अधयक्ष को बनाया गया।

               अल्पसंख्यकों की भलाई की दिशा में जहां शिक्षा के क्षेत्र में नये-नये निर्णय लिए गये वहीं सरकारी नौकरियों के लिए जामिया उर्दू,अलीगढ़ द्वारा संचालित परीक्षाओं को मान्यता भी दी गई। मुस्लिम महिलाओं को सरकारी नौकरी में भर्ती के लिए उम्र में दस  वर्ष की छूट भी दी गई। मधयप्रदेश के इतिहास में प्रथम अवसर था जब पहली बार मदरसा शिक्षा को आधुनिक शिक्षा से जोड़ने के उद्देश्य से मदरसा बोर्ड का गठन किया गया। हेडस्टार्ट योजना के अंतर्गत मदरसों के प्राथमिक स्तर के विद्यार्थियों को कम्प्यूटर के माधयम से शिक्षा देने की पहल भी शुरू की गई। इसके अलावा एक वर्षीय कम्प्यूटर-डिप्लोमा भी शुरू किया गया। अल्पसंख्यक बहुल क्षेत्रों में अल्पसंख्यकों के परम्परागत व्यवसायों के विकास के लिए तकनीकी/व्यावसायिक मिडिल स्कूलों की स्थापना का भी सरकार ने निर्णय लिया। इन विद्यालयों के उत्तीर्ण छात्रों के लिए आईटीआई एवं पॉलिटेक्निक संस्थानों की स्थापना के निर्णय लिए गये।

               कांग्रेस शासन काल के दौरान अल्पसंख्यकों के कल्याण की जहां अनेक योजनाएं का और कार्यक्रमों का क्रियान्वयन शुरू किया गया वहीं कुछ नये कार्यक्रमों के प्रति भी सरकार ने अपनी प्रतिबध्दता दिखाई थी और भावी योजनाओं का भी खाका तैयार कर लिया था। अल्पसंख्यक भाइयों में सरकार के प्रति विश्वसनीयता का जो माहौल निर्मित हुआ था उससे सरकार को प्रदेश में साम्प्रदायिक सद्भाव तथा शांति बनाये रखने में निरंतर ही इस वर्ग के लोगों का सहयोग प्राप्त होता रहा। जहां सरकार का रूख साम्प्रदायिक तनाव पैदा करने वाले तत्वों के प्रति कठोर रहा वहीं ऐसे तत्वों से पीड़ित व्यक्तियों को उचित संरक्षण और सहायता देने के उपाय किए गये। ये सब जमीनी हकीकत हैं जिनका तत्कालीन सरकार की विशेष उपलब्धियां मानकर शासकीय स्तर से भरपूर प्रचार प्रसार हुआ था।

               कुल मिलाकर कांग्रेस का मधयप्रदेश में दस वर्षीय कार्यकाल अल्पसंख्यक समुदाय की भलाई के कार्यक्रमों के लिए काफी बेहतर सिध्द हुआ है। जहां इस समुदाय की महिलाओं, छात्रों की शिक्षा और उनके स्वास्थ्य की योजनाऐं प्राथमिकता से संचालित हुई वहीं इस समुदाय के लोगों के लिए रोजगार,नौकरियों और परम्परागत व्यवसायों की व्यवस्थाऐं सुनिश्चित की गई। इस समुदाय के उठते जीवन स्तर और उनकी समृध्दि के लिए जो कार्य किए गये उसे विभिन्न राजनैतिक दलों ने तुष्टीकरण कहकर नकारने का प्रचार जरूर किया किंतु वह सिर्फ राजनैतिक प्रतिद्वंद्वता और तत्कालीन शासनकाल के प्रतिर् ईष्या-भाव बनकर रह गया।

               कांग्रेस की सत्ता के खिलाफ राजनैतिक द्वंद्व का नजारा तब देखने को मिलता है, जब आम निर्वाचन के समय विपक्षी पार्टियों द्वारा साम्प्रदायिकता और अपने कट्टरपंथी आचरण का सहारा लिया जाता है। अल्पसंख्यक समुदाय के मन में प्रदेश की वर्तमान सरकार ने अपनी विश्वसनीयता कायम करने के लिए अपने पांसे फेंकने शुरू कर दिए हैं। वर्तमान में अल्पसंख्यक भाइयों के प्रति छद्म प्रेम प्रदर्शित करने की भूमिकाएें  रची जाने लगी हैं और उनके मन में भावनात्मक विद्वेष फैलाकर अपने आपको इस समुदाय का हितैषी बताने के लिए नाटकीय मंच तैयार किए जाने लगे हैं। अब तो यह माना जाने लगा है कि किसी भी वर्ग, जाति या समुदाय के लोगों के हितैषी दिखने के लिए उन्हें भोज पर आमंत्रित करना ही अपनी राजनैतिक उपलब्धियों का प्रमाण है। राजनीति में अब तो यह परम्परा विकसित हो गई है कि ऊपर से तो अपने आपको बड़े साफ-सुथरे, ईमानदार जनकल्याण कार्यक्रमों के प्रति वफादार और कर्तव्यनिष्ठ दिखते रहो किंतु बाहर से  अपने दल के एजेंडे पर कायम रहकर खेल खेलते रहो। राजनीति में अब तो जो कुछ हो रहा है उससे लगने लगा कि हाथी के खाने के दांत कुछ और होते है और दिखाने के दांत कुछ और। राजनीति में दलों के ही द्वि-अर्थी आचरण को यही कहा जा सकता है ''यह अंदर की बात है''। सत्ता के तो क्या कहने हैं! इसे टी.वी. चैनलों में चल रहे एक विज्ञापन से समझा जा सकता है जिसमें कहा जाता है कि 'वहीं फ्रंट में आयेगा जिसने रूपा फ्रंटलाइन बनियान पहनी है'। मतलब यह कि सत्ता सिर्फ उन्हीं के लिए है जो उनके राजनैतिक एजेंडे के अनुसार उनकी सोच और विचारधाराओं पर ही चलते हैं। यह सब कुछ आम चुनावों के वक्त सामने आ जाता है कि किस राजनैतिक दल के चाल-चलन से प्रभावित होकर अल्पसंख्यक भाई वोट देने के अपने प्रजातांत्रिक हक का उपयोग करते हुए कैसा परिचय देते हैं।

 ? राजेन्द्र जोशी