संस्करण: 27 जून-2011

गुजरात पुलिस एक बार फिर कठघरे में

? जाहिद खान

               गुजरात हाई कोर्ट के ताजा आदेश ने एक बार फिर गुजरात पुलिस और सूबाई सरकार को कठघरे में खड़ा कर दिया है। अदालत ने सीबीआई को इस बात की जांच करने को कहा है कि सादिक जमाल की मौत कैसे हुई ? सादिक जमाल को जनवरी 2003 में अहमदाबाद क्राइम ब्रांच के प्रमुख रहे डी.जी. बंजारा और उनकी टीम ने सूबे के नरोड़ा इलाके में फर्जी मुठभेड़ में मार गिराया था। पुलिस ने सादिक को लश्कर-ए-तैयबा का दहशतगर्द बतलाते हुए, उस पर मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी, तत्कालीन उप प्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी और विहिप लीडर प्रवीण तोगड़िया की हत्या की साजिश रचने का इल्जाम लगाया था। मोदी हुकूमत में यह पहला मौका है, जब गुजरात हाई कोर्ट ने मुठभेड़ का कोई मामला जांच के लिए सीबीआई को सौंपा है। वरना, इससे पहले सूबे में जो भी जांचें चल रही हैं, वे सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर हैं।

               गौरतलब है कि 8 साल पहले हुई इस मुठभेड़ की दास्तान, उन सैंकड़ों मुठभेड़ों की तरह फाईलों में ही दफन होकर रह जाती, गर मुंबई के एक साहसी पत्रकार ने मकोका कोर्ट को दिए अपने बयान में इस मुठभेड़ को फर्जी नहीं बतलाया होता। पत्रकार ने कोर्ट में अपने सनसनीखेज बयान में बतलाया था कि किस तरह से मुंबई पुलिस के कथित एनकाउंटर स्पेशलिस्ट दया नायक ने 11 जनवरी 2003 को सादिक जमाल को एक पूर्वनियोजित साजिश के तहत मुंबई के बोरीवली नेशनल पार्क से गुजरात पुलिस को सौंपा और उसके महज दो दिन बाद सादिक की मुठभेड़ में मौत हो गई। इस खुलासे के बाद सादिक के भाई शब्बीर जमाल ने साल 2007 में गुजरात हाई कोर्ट में इस मुठभेड़ की जांच कराने के लिए याचिका दायर कर दी। हाईकोर्ट में इंसाफ के लिए शब्बीर जमाल की गुहार आखिरकार रंग लाई। गुजरात सरकार जिस केस को ठंडे बस्ते में दबाकर चैन की नींद सो रही थी, अब उसे अदालत के दबाव में दोबारा खोलना पड़ेगा। जस्टिस एम.आर. शाह ने सरकारी वकील कमल त्रिवेदी की इस दलील कि, ''मामला पुराना है और इसे सीबीआई को सौंपने से राज्य पुलिस का मनोबल टूट सकता है,'' को यह कह कर खारिज कर दिया कि ''पुराना होने के बावजूद अपराधा कभी नहीं मरता।''

               अदालत का यह फैसला मोदी सरकार के लिए तो झटका है ही, साथ ही गुजरात पुलिस के कई पुलिस अफसरों को भी कानूनी शिकंजे में फंसा सकता है। यह पहली बार नहीं है, जब गुजरात पुलिस फर्जी मुठभेड़ के मामले में जांच के कठघरे में हो, बल्कि इससे पहले भी सोहराबुद्दीन शेख और उसकी बीबी कौसर बी, तुलसी प्रजापति की हत्या के मामलों में सूबे के कई आला अफसर साबरमती जेल में बंद हैं। सादिक जमाल फर्जी मुठभेड़ मामले में गुजरात पुलिस के आला अफसर मसलन आईपीएस डी.जी. बंजारा, तत्कालीन संयुक्त आयुक्त पीपी पाण्डे, एसीपी तरूण बारोट समेत पुलिस के तकरीबन आधा दर्जन अधिकारी मुब्तिला हैं। उनमें डीजी बंजारा तो सोहराबुद्दीन शेख केस का भी अहम अभियुक्त है। डीजी बंजारा अपने कार्यकाल के दौरान मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी से अपनी नजदीकता के लिए जाना जाता था और उस वक्त वह आतंकवाद विरोधी दस्ते का प्रमुख था। बंजारा ने उस दौरान कथित आतंकवादियों से 9 मुठभेड़ें की और 15 लोगों को मौत के घाट उतार दिया। इन हत्याओं में मुंबई की छात्रा इशरत जहां की विवादास्पद हत्या भी शामिल है। जिसे 3 दीगर लोगों के साथ बेदर्दी से मार दिया गया था। यह महज इत्तेफाक नहीं है कि डी.जी. बंजारा ने अपने कार्यकाल में जो भी मुठभेड़ें कीं, उनमें ज्यादातर जांच के दायरे में हैं।

               आखिर हाईकोर्ट को सादिक जमाल मामले की जांच सीबीआई को सौंपने की जरूरत क्यों महसूस हुई ? इस सवाल का जबाव ज्यादा मुश्किल नहीं है। इस मामले में गुजरात पुलिस के कई प्रभावशाली अफसरों के नाम सामने निकलकर आ रहे हैं,लिहाजा यह कैसे मुमकिन है कि गुजरात पुलिस अपने ही महकमे के अफसरों के खिलाफ निष्पक्ष जांच करेगी। फिर सादिक जमाल मुठभेड़ मामले से मिलता-जुलता तुलसी प्रजापति मुठभेड़ मामला हमारे सामने है। गोया कि इस मामले में भी गुजरात पुलिस की जांच बेहद ढीले-ढाले ढंग से चल रही थी। एफआईआर दर्ज करने के बाद आरोपपत्र तैयार करने में पुलिस ने तीन साल लगा दिए। आखिरकार, तुलसीराम प्रजापति की मां की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई को इस बात की जांच करने को कहा, कि तुलसीराम की मौत कैसे हुई ? गौरतलब है कि सोहराबुद्दीन और उसकी बीबी कौसर बी को फर्जी मुठभेड़ में मारे जाने के मामले में प्रजापति एक मात्र चश्मदीद गवाह था। लिहाजा, यह शक शुरू से ही रहा है कि इस कांड को अंजाम देने में जिनका हाथ था, वही प्रजापति को भी खत्म करना चाहते थे। और उसे भी उन्हीं तरीकों से ठिकाने लगाया होगा।

               कुल मिलाकर, मुल्क में फर्जी मुठभेड़ के मामले अनेक सूबों से आए-दिन सामने आकर निकलते रहते हैं। यह वर्दी में किया जाने वाला अपराध है, जो कि इनामो इकराम व पदोन्नति के लालच में किया जाता है। लेकिन गुजरात में फर्जी मुठभेड़ के मामले इस मायने में खास हैं कि इनमें पुलिस के साथ-साथ गुजरात सरकार पर भी इल्जाम लगे हैं। सोहराबुद्दीन, कौसर बी और प्रजापति फर्जी मुठभेड़ मामले के आरोपियों में गुजरात के एक पूर्व गृहमंत्री का नाम भी शामिल है। मोदी सरकार में गृह राज्यमंत्री रहे अमित शाह को बीते साल जुलाई में उस वक्त मंत्री पद छोड़ना पड़ा था, जब सीबीआई ने सोहराबुद्दीन मामले में चार्जशीट पेश की। सीबीआई की चार्जशीट में अमितशाह पर हत्या, हत्या की साजिश, आपराधिक षडयंत्र, अपहरण, जबरन वसूली, बंधक बनाने और सबूतों को नष्ट करने जैसे कई संगीन इल्जाम हैं। खैर ! उसके बाद उनकी गिरतारी भी हुई। शाह फिलवक्त सशर्त जमानत पर हैं लेकिन सीबीआई की जांच जिस तरह से आगे बढ़ रही है, उनका ज्यादा दिनों जेल से बाहर रहना नामुमकिन ही है। गुजरात हाई कोर्ट द्वारा सादिक जमाल मुठभेड़ मामले की जांच सीबीआई के सुपुर्द करने के बाद सूबे के अंदर हुई वे सभी मुठभेड़ें, एक बार फिर जांच की जद में आ गई हैं, जो कि मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी के एक दशक की हुकूमत के दौरान अंजाम दी गईं।


? जाहिद खान