संस्करण: 27 जून-2011

फारबिसगंज का खून किसके नाम ?

रंग ला रही है हिन्दुत्व की 'अभिनव अंगडाई'

? सुभाष गाताड़े

               क्या साठ साल से चले आ रही एक सड़क को - बिना किसी वैकल्पिक इन्तजाम के या कमसे कम इसके बारे में लोगों से वायदा करके - किसी अलसुबह बन्द किया जा सकता है ? और इस कदम का शान्तिपूर्ण ढंग से विरोध कर रहे आम लोगों पर गोलियां बरसायी जा सकती हैं ?

               किसी भी सभ्य समाज में ऐसा कदम गैरवाजिब माना जाएगा ! मगर ऐसा प्रतीत होता है कि मीडिया द्वारा 'सुशासनबाबू' कह कर नवाजे जाते नीतिशकुमार के राज में चीजें अलग ढंग से ही चलती हैं। वरना न ही सूबे के अररिया जिले के फारबिसगंज के अल्पसंख्यकबहुल भजनपुरा गांव को रानीगंज से जोड़नेवाली सड़क रातोंरात बन्द की जाती और न ही इसका शान्तिपूर्ण प्रतिरोध कर रहे लोग गोलियों का निशाना बनते।

               फारबिसगंज काण्ड को लेकर बिहार के तमाम इलाकों में ही नहीं बल्कि देश में कई अन्य स्थानों पर प्रदर्शन हुए हैं, जिसमें न केवल दोषी पुलिसकर्मियों पर बल्कि स्थानीय विधायक के खिलाफ भी  कार्रवाई करने की जोरदार मांग उठी है। पिछले दिनों राजधानी दिल्ली के बिहार भवन पर भी जनतंत्राप्रेमी संगठनों का जोरदार प्रदर्शन हुआ, जब यह ख़बर मिली थी कि जनाब नीतिशकुमार विदेशयात्रा के सिलसिले में वहां पहुंचनेवाले हैं।

               ध्यान रहे कि भजनपुरा को रानीगंज से जोड़नेवाली उपरोक्त सड़क, जो अल्पसंख्यक बहुल भजनपुरा (आबादी 1,000) को पास के अस्पताल, ईदगाह और करबला के मैदान तक पहुंचने का एकमात्रा जरिया थी। समय समय पर उसकी मरम्मत करने का काम जिला परिषद, ग्राम पंचायत, मुखिया आदि की तरफ से किया गया था। इतनाही नहीं इस सड़क को मद्देनज़र रखते हुए नेशनल हाईवे 57 के निर्माण के वक्त लोगों की सहूलियत के लिए एक सबवे का भी निर्माण किया गया था। मगर आरो सुन्दरम इण्टरनेशनल कम्पनी की तरफ से इलाके में लगायी जा रही ग्लुकोज फैक्टरी के लिए 'बिहार इण्डस्ट्रियल एरिया डेवलपमेण्ट अथारिटी' जमीन अधिग्रहण के नाम पर इन सभी तथ्यों को दरकिनार किया गया। कहा जा रहा है कि बिहार विधानपरिषद के भाजपा सदस्य अशोक अग्रवाल तथा उनके परिवार के सदस्य इस फैक्टरी से जुड़े हैं, यहां तक कि विधायक का बेटा कम्पनी के निदेशक मण्डल में भी है।

               उपरोक्त फैक्टरी को मुमकिन बनाने के लिए बगल के 28 एकड़ जमीन के अलावा सड़क को भी मिटा देने का निर्णय लिया गया और इसी योजना के मद्देनज़र 2जून को सड़क के एक किनारे पर भाजपा विधायक के निर्देशों पर एक दीवाल खड़ी की गयी और दूसरी तरफ नींव डालने के मकसद से दूसरी तरफ जमीन को गहरे खोदा गया। इस समूचे काम को एक तरह से लोगों को अन्धेरे में रख कर अंजाम दिया गया। 3जून को लोगों ने देखा कि उनके आनेजाने का रास्ता बन्द कर दिया गया है। और फिर आपस में मीटिंग करके उन्होंने विरोधा करने का निर्णय लिया, और सड़क को बन्द करनेवाली दीवार गिरा दी। छह पुलिस थानों की पुलिस वहां पहले से मौजूद थी जिसने इसका जवाब अपनी गोलियों से दिया।

               सीपीआई (एमएल) द्वारा इस मसले को लेकर भेजी गयी फैक्ट फाइंडिंग टीम की रिपोर्ट बताती है कि किस तरह 'सैकड़ो दौर गोलियां चलायी गयी और मुस्तफा एवं साजमीं के जख्मी होने के बाद पुलिस उन पर कूद पड़ी और उसने उन्हें जूतों से मारा।'

               इन दिनों पटना मेडिकल कालेज के अस्पताल में भरती अररिया जिले के भजनपुरा गांव की रहीना खातून को रह रह कर 3जून का वह प्रसंग याद आता रहता है जब पुलिस की अंधाधुंध गोलियों में से एक उसकी गोद में सवार छह माह के साहिल को पार करती हुई उसके हाथ को लगी थी। 3जून की उसी मनहूस रात को नन्हें साहिल ने उसकी गोद में दम तोड़ दिया था। रहीना बगल की फैक्टरी में काम कर रहे अपने पति को खाना देकर लौट रही थी।

               अस्पताल के उस वार्ड में उसके साथ भजनपुरा गांव के कई अन्य लोग भी भर्ती हैं, गोली किसी के मुंह को पार करती निकली है तो आठ साल का शाहनवाज जिन्दगी भर के लिए अपाहिज हुआ है। पहले अररिया के जिला अस्पताल में ही इन सबका इलाज चल रहा था, बाद में जिलाधिकारी ने उसे और गांव के कई घायल लोगों को यह कहते हुए पटना भेज दिया कि सरकार उनका इलाज कराएगी। मगर वह निरा वादा ही साबित हुआ है। इन लोगों को बाद में समझ में आया कि अररिया अस्पताल में इनके भरती होने से पूरे इलाके के लोगों की सहानुभूति इनके प्रति हो रही थी, और सरकार के खिलाफ लोगों का गुस्सा बढ़ता जा रहा था। इसलिए चालाकी के साथ उन्हें वहां से हटा दिया गया।

               अगर समूचे बिहार को देखें तो छह माह के अन्दर अल्पसंख्यकों को निशाना बनाते हुए यह दूसरा गोलीकाण्ड है। याद रहे कि 22 दिसम्बर 2010 को कुरसाकान्ता के अन्तर्गत आनेवाले बमराहा के गांव वाले जब बलात्कार की किसी घटना को विरोध कर रहे थे, तब सीमा सुरक्षा बल के लोगों द्वारा गोलीचालन कर अल्पसंख्यक समुदाय के चार लोगों को मार डाला गया था।

               बिहार में लालू के 'कुशासन' से मुक्ति दिला कर उसे 'विकास' के रास्ते पर डालने का दूसरा पहलू यह है कि धीरे धीरे सामाजिक-राजनीतिक जीवन का हिन्दूकरण करने एवं अल्पसंख्यक समुदाय को अधिक असुरक्षित करने का सिलसिला तेजी पकड़ रहा रहा है।

               जानकार बताते हैं कि नीतिशकुमार की हुकूमत कायम होने के बाद विगत छह सालों में पूर्वी बिहार के इस इलाके में संघ की गतिविधियों ने जोर पकड़ा है। सत्तर के दशक में उन्होंने बांगलादेशी घुसपैठियों के नाम पर मुहिम चलायी थी,जिसमें वह बुरी तरह फेल हुए थे। अब सूबे में सत्ता में आने के बाद उन्होंने यह प्रचार करना शुरू किया है कि इलाके के अल्पसंख्यक इस समूचे क्षेत्रा को - बांगलादेश की सीमा से लेकर भारत नेपाल सीमा तक, जिसमें उत्तार प्रदेश के कुछ जिले भी शामिल हैं - इस्लामिस्तान बनाना चाहते हैं। इस झूठे प्रचार के बलबूते वह समुदाय को सामाजिक एवं आर्थिक तौर पर कमजोर करना चाहते हैं।

               जद (यू) की तरफ से विधानपरिषद सदस्य बने प्रेमकुमार मणि -जिन पर पिछले दिनों निहित स्वार्थी तत्वों ने कातिलाना हमला भी किया - बिहार में 'हिन्दुत्व की इस अभिनव अंगडाई' (फारवर्ड प्रेस, जून 2011) की चर्चा करते हुए लिखते हैं कि किस तरह 'पटना में गंगा आरती शुरू हो चुकी है और सिमरिया में अमृत कुंभ की तैयारी जोरशोर से जारी है।' उनके मुताबिक 'सिमरिया  घाट को लेकर संघ की सांस्कृतिक डिजायन यूं है। इस घाट में गंगा उत्तरायणी है और इसलिए पवित्र है।' इसे लेकर कहानी यही चलती है कि यह वही स्थली है जहां समुद्र मंथन से निकले अमृत कलश के लिए देवों और असुरों में संग्राम हुआ था और जिस स्थान पर अमृत बांटा गया था। वही स्थान सामृता अर्थात सिमरिया हो गया है। हिन्दुओं में यह मान्यता है कि कार्तिक मास में यहां स्नान करने से मनोवांछित फल मिलते हैं। इसी हेतु इस वर्ष कार्तिक मास में यहां अर्ध्दकुंभ मेला लगेगा। 'समाचार यह है कि चारों शंकराचार्यों ने डिज़ायन पर मोहर लगा दी है। सरकार के पास इसे रखा जाएगा और स्वीकृति मिलने पर भारी सरकारी खर्चे पर यह सांस्कृतिक आयोजन होगा।'

               अब जबकि नीतिशकुमार अधिक आत्मविश्वासी प्रतीत होते हैं और भाजपा भी अधिक शक्ति के साथ चुनावों में लौटी है, यह उम्मीद करना बेकार होगा कि भजनपुरा मामले में पीड़ितों को न्याय मिलेगा। अब जरूरत इस बात की आ पड़ी दिखती है कि बिहार की जनसंघर्षों की भूमि में हिन्दुत्व की इस 'अंगड़ाई' को रोकने के बारे में कुछ दूरगामी योजना बनायी जाए।


? सुभाष गाताड़े