संस्करण: 27 जून-2011

करोड़ों खर्च, फिर
भी बढ़ी गरीबी

? महेश बाग़ी

               मध्यप्रदेश में गरीबी उन्मूलन के कई प्रयासों और सैकड़ों योजनाओं के बावजूद अब तक कोई सफलता नहीं मिली है। ग्रामीण गरीबी अपनी जगह बढ़ती जा रही है, जो ग्रामीणों को पलायन के लिए शहरों में जाने को मजबूर कर रही है तो दूसरी ओर शहरी गरीबी अनियंत्रित रूप से बढ़ती जा रही है। कस्बाई शहरों से लेकर प्रदेश के महानगरों में झुग्गी-झोपड़ियों का जाल बढ़ता जा रहा है,जिससे सुविधाओं का अभाव होता जा रहा है। प्रदेश में शहरी गरीबी की जिलेवार स्थिति के अनुसार प्रदेश में सबसे कम शहरी गरीबी शहडोल जिले में 12.6प्रतिशत है तो सर्वाधिक 77 प्रतिशत शिवपुरी जिले में। महानगरों में गरीबी के आंकड़े भयावह तस्वीर पेश कर रहे हैं। राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण वर्ष 2004-05 के अनुसार देश के 20 प्रमुख राज्यों में गरीबी के स्तर की दृष्टि से मध्यप्रदेश में ग्रामीण गरीबी का स्तर 36.8 प्रतिशत तथा शहरी गरीबी का स्तर 42.4प्रतिशत है। राष्ट्रीय स्तर पर ग्रामीण गरीबी के स्तर की दृष्टि से राज्य नीचे से छठवें तथा शहरी गरीबी की दृष्टि से नीचे से दूसरे स्थान पर है। मध्यप्रदेश में जिला स्तरीय, शहरी एवं ग्रामीण गरीबी के आंकड़ों के अनुसार गरीबी का स्तर काफी विषमताएं लिए है। प्रदेश में शहरी गरीबी की जिलेवार स्थिति के अनुसार देश में सबसे कब शहरी गरीबी शहडोल जिले में 12.6 प्रतिशत है तो सर्वाधिक शिवपुरी जिले में 12.6, मंदसौर 18.0, सीधाी 19.4, उमरिया 20.9 और इंदौर 20.2 प्रतिशत। ये जिले प्रदेश के किसी एक भौगोलिक क्षेत्र में स्थित न होकर पूरे प्रदेश में बिखरे हुए हैं। इनमें इंदौर जैसा विकसित तो सीधी जैसा पिछड़ा जिला भी सम्मिलित है। सर्वाधिक शहरी गरीबी वाले 5 जिले हैं-दतिया 64.1, सागर 67.1, भिंड 69.1, दमोह 70.2 और शिवपुरी 77.4 प्रतिशत। ये जिले मुख्यत: उत्तरी मधयप्रदेश और केन्द्रीय मधयप्रदेश में स्थित है। प्रदेश के शहरी क्षेत्रों में भी तीन चौथाई आबादी का गरीबी से ग्रसित होना चिंता का विषय है क्योंकि प्रदेश के 15 जिलों में शहरी गरीबी का स्तर 50 से 60 प्रतिशत के मधय है।

 

               प्रदेश के कुछ जिलों में ग्रामीण एवं शहरी गरीबी के मधय काफी विषमता पाई जाती हैं। कुछ जिले ऐसे हैं जिनमें ग्रामीण गरीबी की तुलना में शहरी गरीबी का प्रतिशत काफी अधिक है जैसे नीमच जिले के ग्रामीण क्षेत्र में गरीबी का प्रतिशत तो मात्र 0.2 प्रतिशत है, वहीं शहरी गरीबी कई गुना अधिक यानि 37.2 प्रतिशत है। यही स्थिति खंडवा, खरगौन, रतलाम, गुना आदि जिलों में है। दूसरी ओर कुछ जिले ऐसे हैं जिनमें ग्रामीण गरीबी का स्तर शहरी गरीबी से तुलनात्मक दृष्टि से काफी अधिक है। ऐसे जिलों में शहडोल 64.6 एवं 12.6 प्रतिशत, उमरिया 76.4 एवं 20.9 प्रतिशत और सीधी 57.6 एवं 19.4 प्रतिशत हैं। देश में शहर के स्लम में रहने वालों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। इस समय देशभर में 6 करोड़ से भी ज्यादा लोग स्लम में रहते हैं। 2001 की जनगणना के दौरान 50 हजार और उससे भी ऊपर की जनसंख्या वाले 640 शहरों में रह रहे लोगों की भी पहली बार अलग से गणना की गई। इस गिनती से पता चला कि इन शहरों में 4 करोड़ 26 लाख लोग स्लम बस्तियों में रह रहे हैं। यह संख्या इन शहरों की कुल आबादी के 23 प्रतिशत से भी कुछ अधिाक हैं। गरीबी का यह आंकड़ा अमेरिका की जनसंख्या का 14.3 फीसदी हिस्सा है। आंकड़े के मुताबिक अमेरिका का हर सातवां व्यक्ति गरीबी है। वर्ष 2008 में 3.98 करोड़ लोग गरीबी रेखा से नीचे थे जो यहां की जनसंख्या का 13.2फीसदी हिस्सा था। आवास एवं शहरी गरीबी उपशमन मंत्रालय की ओर पिछले साल जारी भारतीय शहरी गरीबी रिपोर्ट-2009 के अनुसार देश में शहरी गरीबों की संख्या 1993-94 और 2004-05 के दौरान 763.40 लाख से बढ़कर 808 लाख हो गई है। केन्द्रीय आवास एवं शहरी गरीबी उन्मूलन मंत्रालय के अफसरों का कहना है कि 2001 की जनगणना के बाद महागनरों व सभी छोटे-बड़े शहरों में स्लम बस्तियों का फैलाव बढ़ा है। इन बस्तियों में मूलभूत सुविधाओं और अन्य नगरीय इन्फ्रास्ट्रक्चर का अभाव है, रहने को प्लास्टिक के तिरपाल से ढंकी झुग्गियां हैं। यकीनन शहरों में मलिन बस्तियों की स्थिति भयावह होती जा रही है। नवीनतम आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2009 में देश के शहरों में रहने वाले 30 करोड़ लोगों में से आठ करोड़ लोग गरीब हैं। इनमें से चार करोड़  से भी अधिक लोग 52 हजार मलिन बस्तियों में जीवन जीने के लिए मजबूर हैं। इन मलिन बस्तियों को देश में कहीं तंग बस्ती, कहीं झोपड़-पट््टी, तो कहीं झुग्गी बस्तियों के नाम से जाना जाता है। नाम भले ही अलग-अलग हों, लेकिन इनकी पीड़ाएं, इनकी समस्याएं एवं स्थिति देश के सभी शहरों में एक जैसी है। नेशनल सैंपल सर्वे आर्गेनाइजेशन की मलिन बस्तियों की स्थिति पर रिपोर्ट में कहा गया है कि देश के नगरों, महानगरों की मलिन बस्तियों में लोग कदम-कदम पर कठिनाइयों और बदतर हालत के बीच नारकीय जीवन के लिए विवश हैं। ये जीवन की मूलभूत सुविधाओं से भी वंचित हैं। उन्हें न तो रहने की पर्याप्त जगह मिल पाती है और न ही उन्हें पीने के लिए स्वच्छ पानी मिल पाता है। स्थिति इतनी विकट है कि तीन-चौथाई मलिन बस्तियों में शौचालय और लगभग एक तिहाई में जल निकास व जल-मल निकास की सुविधाओं का पूर्णत: अभाव है। इन बस्तियों में प्रतिदिन निकलने वाले कूड़े-करकट को हटाने और ठिकाने लगाने की व्यवस्था नहीं है। इन बस्तियों के आधो से ज्यादा बच्चे कुपोषण के शिकार हैं। बस्तियों में रहने वाले परिवारों में बाल मृत्यु दर, स्वच्छ आवास एवं पर्यावरण में रहने वाले शहरी परिवारों के मुकाबले तीन गुनी है। स्लम में रहने वाले लोग गंदगी, बीमारी, भूख और अन्य हादसों में बड़ी संख्या में अकाल मौत के शिकार हो जाते हैं। विडम्बना यह है कि इनमें से लगभग आधो से ज्यादा सरकारी आंकड़ों में शामिल नहीं हैं। इसी कारण बहुत-सी सरकारी विकास योजनाओं का लाभ इन मलिन बस्तियों में रहने वालों को नहीं मिल रहा है। इतना ही नहीं बस्तियों की सुविधा के लिए कार्यरत बहुत-न्सी एजेंसियों और योजनाओं के बीच समन्वय नहीं होने के कारण इन बस्तियों की दयनीय स्थिति में सुधार नहीं आ पाता। हालांकि केन्द्र सरकार बस्ती को शहर के हिस्से के तौर पर स्वीकार करते हुए वहां बुनियादी सुविधाओं के विकास के लिए मानक तैयार कर रही है। केन्द्र सरकार ने राज्यों के सहयोग से मास्टर प्लान में बदलाव की मुहिम छेड़ने का आग्रह किया है। राज्यों से कहा जा रहा है कि मलिन बस्ती मुक्ति का अभियान चलाकर शहरी नियोजन के मौजूदा मॉडल को बदलें।



 
? महेश बाग़ी