संस्करण: 27 जून-2011

अन्ना हजारे और गांधी

? प्रभात पटनायक

               जितना संसद का अवमूल्यन होता है, लोकतंत्र की जड़ों को काटता है

               अन्ना को 21वीं सदी का गांधी कहना, जो कुछ उन्होंने करना शुरू किया, विशुध्द अतिशयोक्ति है, लेकिन कई उनके तरीकों में समानता देखना चाहते हैं, एक खासतौर से, उनका अपने उद्देश्यों को पूरा करने के लिए अनशनों का सहारा लेने में। हालांकि यह गलत है। वाकई,यह वास्तविकता कि बहुत सारे लोगों का यह समझना कि अन्ना की पध्दति गांधी की पध्दति के समाने है, सिर्फ यह सोचना इशारा करता है कि आधुनिक भारत गांधीजी को कितना याद करता है या कितना समझता है। 

               गांधीजी ने कुल 17 अनशन किए, जिनमें तीन बड़े अमरण अनशन थे। ये सभी तीन अनशन लोगों को हिंसा के खिलाफ एकजुट करने के उद्देश्य से किए गए थे,न कि औपनिवेशिक राज्य से विशेष रियायतों को निकालने के लिए। ब्रिटिश सरकार के 'दलित वर्गों' के लिए पृथक मतदाता वर्ग करने के प्रस्ताव के खिलाफ उनका 1932 का अनशन इस दावे के उलट लग सकता है, लेकिन निस्संदेह वह अनशन 'अस्पृश्यता' के चलन के खिलाफ ज्यादा निर्देशित था, बजाय ब्रिटिश सरकार के खिलाफ, जो पृथक निर्वाचक वर्ग के विचार का बहिष्कार किया था, एक बार जब गांधी और अंबेडकर के बीच येरवदा समझौता किया गया।  (टैगोर ने, वास्तव में, अनशन की प्रशंसा की और कहा, ' यह भारत की एकता और उसकी सामाजिक अखंडता के लिए बहुमूल्य जीवन का त्याग करने जैसा है।') 1932 का अनशन वास्तव में ब्रिटिश-विरोधी नहीं था, न ही यह केवल शुध्दरूप से राजनीतिक अनशन था, एक वास्तविकता, जो गांधीजी के, आठ महीने में ही, 'हिन्दु जाति' द्वारा 'हरिजनों' के उत्पीड़न पर उनकी वेदना जताने के लिए शुरू किए गए दूसरे 21 दिन के अनशन से रेखांकित हुई। (इकोनॉमिक एंड पॉलिटीकल वीकली के 4 जून, 2011 में सुधीर चंद्र का पेपर देखें।)

               संक्षिप्त में, गांधी के अमरण अनशन कभी भी, खुद और विरोधी के रूप में औपनिवेशिक राज्य से, विशेष रियायतों को निकालने के लिए दोहरा व्यवहार नहीं थे। वह, उदाहरण के लिए, नमक कर को वापस लेने की मांग के लिए अमरण अनशन पर नहीं गए थे, बल्कि इसके स्थान पर उन्होंने इसके खिलाफ आंदोलन शुरू किया। और भारत की स्वतंत्रता के लिए गांधीजी किसी भी स्थिति में कभी अमरण अनशन पर जाने की नहीं सोचे, इसके बदले उन्होंने आजादी हासिल करने के लिए आंदोलन पर आंदोलन शुरू किए। दरअसल गांधीजी ने औपनिवेशिक राज्य पर एक विशेष मांग लागू करने,या एक विशेष रियायत लेने के लिए अमरण अनशन को अहिंसा का नहीं बल्कि हिंसा का काम माना।

               इस तरह से अंतर्निहित अमरण अनशन में हिंसा की धमकी है : यदि आप मेरी मांग नहीं मानते, मैं अपना जीवन समाप्त कर दूंगा, और उस स्थिति में आप हिंसा के उस तेज बौछार द्वारा, जो मेरी मौत से गुस्साए लोग आपके ऊपर करेंगे, एक तरफ बह जाएंगे, इसलिए आपका मेरी मांग मानना बेहतर है। सरकार या कुछ विशेष संस्था के खिलाफ विशेष मांगों को मनवाने के लिए निर्देशित अमरण अनशन हिंसा का अप्रत्यक्ष प्रदर्शन है, यह एक हिंसा की अप्रत्यक्ष धमकी देता है और उसकी सफलता ने इस धामकी की विश्वसनीयता पर निर्दिष्ट किया है।  यहां तक कि जो इस तरह के अनशन के कारण से एक प्रयत्न किया है, इस धमकी की प्रकृति धमकी देकर पैसा ऐठने वाले से भिन्न नहीं है, जो मांग करता है कि किसी का सारा सामान शांतिपूर्वक उसे सौंप दिया जाना चाहिए, ऐसा न होने पर उस पर हिंसा होगी।

               गांधी जी ने ऐसा कुछ नहीं किया होगा। जिस व्यक्ति ने चौरी-चौरा में हिंसा की एक घटना के कारण असहयोग आंदोलन वापस ले लिया और 'पवित्रीकरण कार्य' के रूप में अमरण अनशन पर चला गया, उस व्यक्ति ने हिंसा की किसी अप्रत्यक्ष धमकी के तहत कभी कोई मांग, यहां तक कि औपनिवेशिक राज्य के खिलाफ, नहीं की होगी। उनका अमरण अनशन जितना लोगों की ओर लक्षित था, उतना एक संस्था या सरकार के नहीं। जिसका उद्देश्य जनता को हिंसा के खिलाफ एकजुट करना था। चाहे ऐसे किसी भी अमरण अनशन गांधी जी के जीवन का दावा किया, यह किसी व्यक्ति या संस्था के खिलाफ साधारण गुस्से के तरीके से नहीं चिल्लाते होते और इस वजह से किसी एक लक्ष्य के खिलाफ हिंसा का प्रादुर्भाव नहीं होता, जो यह भय दिखाने की एक सामान्य समझ निर्मित करती, जो उस तरह के व्यवहार में लोग निश्चित रूप से शर्मिंदा होते, जो गांधी जी चाहते थे, जब उन्होंने पहली जगह में अनशन शुरू किया। उदाहरण के लिए, सांप्रदायिक सौहार्द के लिए उनका अमरण अनशन, चाहे वह उनके जीवन की मांग किया, वह सांप्रदायिक सौहार्द बनाए रखने और हिंसा से दूर रखने में लोगा को सिर्फ भय दिखाता, ठीक वैसे जैसा गांधी जी हो जाना चाहते थे, जब वह एक अनशन हो शुरू करते, और उनकी जान ले सकने वाले उनके अमरण अनशन से पहले बिल्कुल ऐसा ही हुआ।

               एक तरह के अमरण अनशन हैं, जिनका उद्देश्य एक विरोधी से कुछ विशेष रियायत निकालना है, और इसलिए जो फितरत से हिंसा की प्रत्यक्ष धमकी को प्रतिरोधी और अपरिहार्य बनाते हैं, और एक ऐसा अमरण अनशन है, जो किसी विशेष विपक्षी को निर्देशित नहीं करता, जो लोगों को एकजुट करने की कोशिश करता है, और जो, इस कारण से, हिंसा की किसी धमकी को अपरिहार्य नहीं बनाता। अन्ना हजारे और बाबा रामदेव के अनशन पहली श्रेणी में आते हैं, गांधी जी का अनशन बाद वाली श्रेणी में आता था। वे जमीन और आसमान के अंतर की तरह एक-दूसरे से भिन्न थे। हजारे और रामदेव के तरीकों को गांधीवादी कहना असंगत है, उनके अमरण अनशनों को 'अहिंसक' कहना गलत है, क्योंकि वे 'हमारे मांगों मानो अन्यथा हिंसा हो जाएगी' पसंद करने वालों में से एक हैं, वह प्रतिरोधाी वर्ग में से हैं। गांधीजी के अनशन इस तरह के नहीं थे। एक प्रतिरोधी अमरण अनशन न सिर्फ गांधीवादी-विरोधी है, बल्कि यह स्वतंत्र भारत के संदर्भ में लोकतंत्र-विरोधी है। और जबकि उद्देश्य प्राप्ति की कोशिश करना सराहनीय है,यह हमारे संवैधानिक व्यवस्था के लिए खतरनाक निहितार्थों से भर हुआ है। यह व्यवस्था उपेक्षित नहीं होना को है,क्योंकि यह संभवत:हमारे इतिहास की पिछले दो सहस्राब्दी में लोगों के लिए सबसे बड़ी प्रगति को दर्शाता है,जैसे कि यह 'समानता' की अवधारणा पर आधारित है,समानता जो जाति-व्यवस्था के तर्क का प्रतिवाद है। इस व्यवस्था का अस्तित्व में आना भारत की 'लंबी क्रांति' में मील का पत्थर है।

               सच में, अपने समाज में विशाल और विस्तृत आर्थिक विषमता को देखते हुए, इस कानूनन समानता ने अपने आपको एक वास्तविक समानता में नहीं बदला। लेकिन यह कानूनी तौर पर समानता खुद वैचारिक प्रणाली की जड़ों पर प्रहार करती है, जिसने सदियों से दमनकारी व्यवस्था की स्थिति को सही ठहरा था। लेनिन ने एक बार कहा था कि 'समानता' सामंती शोषण के खिलाफ संघर्ष में सबसे क्रांतिकारी विचार था, यह वहां और भी अधिक क्रांतिकारी है, जहां सामंती शोषण जाति दमन में फंसा हुआ है। इस 'समानता' की सर्वाधिक सुस्पष्ट संस्थागत अभिव्यक्ति संसद है, जो 'एक व्यक्ति एक वोट' के सिध्दांत के मुताबिक चुनी हुई है।

               सच में, यह अरबपतियों, लोगों की जरूरतों और महत्वाकांक्षाओं के प्रति संवेदनाशून्य, और राजनीतिक वर्ग के स्वार्थी जीविकावादियों से भरी है। लेकिन, फिर भी, देश में दूसरी कोई संस्था नहीं है, जो वैधाता की समान अवस्था का दावा कर सकती है। यह आश्चर्यजनक नहीं है कि इस देश में चुनाव आबादी के सबसे वंचित तबकों द्वारा सर्वाधिक उत्साहयुक्त सहभागिता प्रदर्शित करते हैं, वे अब भी उत्पीड़ितों के एक त्योहार बनाते हैं। जो कुछ भी एक संस्था के रूप में संसद का अवमूल्यन होता है, यह भारत की लंबी क्रांति की जड़ काटता है। और अन्ना हजारे के आसपास का आज का 'सिविल सोयायटी' सक्रियतावाद निश्चित रूप से यही करता है, यद्यपि यह उच्च विचारों द्वारा प्रेरित हुआ हो सकता है और यह देश के विभिन्न प्रतिष्ठित सार्वजनिक व्यक्तित्वों की सहभागिता का गवाह हो।

               मैं यहां रामदेव प्रोजेक्ट की बात नहीं कर रहा हूं ,जो पूर्णतया अलग शैली से संबंध रखते हैं। मैं यहां अन्ना हजारे और आरएसएस के बीच कथित संबंधों की बात भी नहीं कर रहा हूं, जो, घटना की समग्रता को समझने के लिए बहुत महत्व के बावजूद, मेरे वर्तमान दलील के लिए उपयुक्त नहीं है। और मेरा 'सिविल सोसायई' सक्रियतावाद आपने आप में झगड़ा भी नहीं है, इसके विपरीत, मैं इसका मान करता हूं। मेरी समस्या है कि वर्तमान अवस्था में इस तरह के सक्रियतावाद ने, प्रतिरोधी किस्म के एक अमरण अनशन से पोषित, संसद की प्रतिष्ठिता अवमूल्यलन करने का काम किया, बजाए इसे मजबूत करने पर निर्देशित करने के।

               जेपी आंदोलन ने, जिसके साथ इसकी तुलना की जा सकती है, संसद की प्रतिष्ठिता को कभी खोखला नहीं किया, इसके विपरीत, इसका परिणाम था कि जेपी की पहल से गठित जनता पार्टी द्वारा संसद में बहुमत सीट हासिल की गई। 'सिविल सोसायटी' सक्रियतावाद आज संसद को पाने की कोशिश नहीं करता है, बल्कि इसकी उपेक्षा करता है, सिविल सोसायटी प्रतिनिधियों और मंत्रियों के लोकपाल बिल का मसौदा तैयार करने को एक साथ बैठने और काम करने के और क्या मायने हो सकते हैं, यदि नहीं तो यह मान लें कि स्वीकृति के एक स्वचलित ठप्पे से तैयार एक दस्तावेज देकर संसद नाम मात्र की संस्था रह जाएगी?

भ्रष्टाचार को पैसा बनाने की फैलती हुई संस्कृति से बहुत बढ़ावा मिला है, जो हमारे समाज के अंदर नव-उदारवाद द्वारा दाखिल की गई। निस्संदेह इससे मुकाबला किया जाना चाहिए था, लेकिन मुकाबला अनिवार्य रूप से सीमित हो जाएगा, यदि आर्थिक व्यवस्था, जिसमें यह पनपती नहीं बदली है। अन्य उक्त सभी में हमें सावधान रहना होगा कि यह लड़ाई हमारे 'आधुनिक' देश के आधार पर गठित संवैधानिक व्यवस्था के लिए उच्च वर्ग के सदाशयी सदस्यों द्वारा घेरे हुए मुक्तिदाता की प्रतिस्थापन का नेतृत्व नहीं करती।


? प्रभात पटनायक

 (लेखक जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली में सेंटर फॉर इकोनॉमिक स्टडीज के भूतपूर्व प्रोफेसर हैं)