संस्करण: 27 फरवरी- 2012

संदर्भ : साल 2002 गुजरात दंगे मामले में हाई कोर्ट का फैसला

एक दिन जरूर जीतेगें, वे अपनी हारी हुई लड़ाई

? जाहिद खान

                लोकायुक्त नियुक्ति और फर्जी मुठभेड़ मामलों में मुंह की खाने के बाद मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को अदालत से हाल ही में एक और झटका लगा। गुजरात हाई कोर्ट ने साल 2002 दंगों से संबंधित एक याचिका पर सुनवाई करते हुए जहां दंगों के दौरान निष्क्रियता और लापरवाही बरतने के लिए मोदी सरकार की कड़ी आलोचना की, वहीं अपना फैसला सुनाते हुए दंगों की रोकथाम के लिए कोई कार्यवाही न करने पर फटकार भी लगाई। सूबाई सरकार की कड़ी आलोचना करते हुए अदालत ने कहा कि दंगों की रोकथाम करने के लिए गुजरात सरकार की अपर्याप्त प्रतिक्रिया और निष्क्रियता से सूबे में अराजक हालात पैदा हुए, जो कई दिनों तक इसी तरह जारी रहे। कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश भास्कर भट्टाचार्य और न्यायमूर्ति जेबी परदीवाला की खंडपीठ ने यह टिप्पणी सूबे में इस अवधि के दरमियान 500 से ज्यादा धार्मिक स्थलों को क्षतिग्रस्त किए जाने के लिए मुआवजे का आदेश देते हुए की।

               गौरतलब है कि अदालत इस्लामिक रिलीफ कमेटी ऑफ गुजरात (आईआरसीजी) द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई कर रही थी। याचिका में अदालत से 2002 में दंगों के दौरान धार्मिक स्थलों को नुकसान पहुंचाए जाने के लिए मुआवजा देने का सरकार को निर्देश देने की मांग की गई थी। याचिकाकर्ताओं ने यह निर्देश इस आधार पर देने की मांग की थी कि राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग इसकी अनुशंसा साल 2005 में कर चुका है। जिसे सूबाई सरकार ने उस वक्त सिध्दांत रूप में मंजूर भी कर लिया था। लेकिन बाद में मोदी सरकार ने मानवाधिकार आयोग की इन अनुशंसाओं को किनारे कर दिया। यहां तक कि उसने मानव अधिकार आयोग की वार्षिक रिपोर्ट और दीगर रिपोर्टों को आज तक विधानसभा में नहीं रखा। बहरहाल, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की रिपोर्ट को गुजरात विधानसभा के सामने नहीं रखने पर हाई कोर्ट ने मोदी सरकार को आड़े हाथों लेते हुए इसे गंभीर त्रुटि और मानवाधिकारों का उल्लंघन बतलाया।

               मोदी सरकार नष्ट हुए धार्मिक स्थलों के लिए मुआवजे की मांग का यह कहकर मुखालफत कर रही थी कि ऐसा मुआवजा देना किसी धर्म का प्रोत्साहन देना होगा। जो कि कानून के खिलाफ है। लेकिन हाई कोर्ट ने मोदी हुकूमत की इस थोथी दलील को खारिज करते हुए कहा कि दंगों के समय ध्वस्त किए धर्मस्थलों की मरम्मत या पुनर्निमाण के लिए राषि मंजूर करना किसी समुदाय विषेश को प्रोत्साहन देना नहीं माना जा सकता। लिहाजा, इससे किसी शासकीय नियम के उल्लंघन का सवाल ही पैदा नहीं होता। अदालत ने अपने फैसले में कहा कि यदि तबाह किए गए भवनों और वाणिज्यिक प्रतिष्ठानों के लिए मुआवजा जारी किया जा सकता है, तो क्षतिग्रस्त धर्मस्थलों के लिए भी इस तरह का भुगतान किया जाना चाहिए। मोदी सरकार के इस फैसले को अदालत ने गंभीर भूल बतलाते हुए इसे मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 की धारा 20 का स्पष्ट उल्लंघन माना। अदालत ने अपने फैसले में बकायदा संविधाान के हवाले से कहा कि सूबाई सरकार की नीति में मुआवजा केवल क्षतिग्रस्त आवासीय व व्यावसायिक स्थानों तक सीमित रखना और धार्मिक स्थलों के लिए मुआवजा नहीं देना संविधान के अनुच्छेद 14, 25 और 26 के तहत नागरिकों को मिले बुनियादी अधिकारों का उल्लंघन है।

                  दरअसल, यह पहला मौका नहीं है जब दंगा पीड़ितों के जानिब संवेदनहीनता दिखाने की वजह से मोदी सरकार को अदालत की खरी-खोटी सुननी पड़ी। उनके इसी गैर जिम्मेवाराना रवैये पर मुल्क की सबसे बड़ी अदालत सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक फैसले में उन्हें आधुनिक दौर का नीरो करार देते हुए कहा था, ''गुजरात जल रहा था और वे बांसुरी बजा रहे थे।'' बीते 10 सालों में ऐसा कई बार हुआ है, जब कभी फर्जी मुठभेड़ के मामलों में तो कभी दंगों के मामलों में गुजरात सरकार को अदालत ने फटकार लगाई। पर मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को इसकी जरा सी भी परवाह नहीं। वे बड़ी ही बेशर्मी से अदालतों के आदेषों और निर्देषों को हंसी में उड़ाते आए हैं। राश्ट्रीय मानव अधिकार आयोग और राश्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग के तमाम निर्देशों व अनुशंसाओं को उन्होंने सूबे में ताक पर रख दिया है। गोया कि मोदी राज में संविधान के हिसाब से कोई काम नहीं होता। लगातार चुनाव जीतने की कामयाबी ने मोदी के अंदर एक ऐसा अहंकार पैदा कर दिया है, जो अपने आगे किसी को कुछ नहीं समझता। कायदे-कानून उनके ठेंगे पर। अपने आप को संविधान और कानून से ऊपर समझने का ही नतीजा है कि अब वे अदालती आदेशों की भी नाफरमानियों पर उतर आए हैं। इस फैसले के तुरंत बाद आए एक दीगर फैसले में गुजरात हाई कोर्ट ने अपना आदेश न मानने के मामले में मोदी सरकार को अवमानना का नोटिस जारी किया है। यह मामला भी गुजरात दंगों का है। जस्टिस अकील कुरैशी और सीएल सोनी की पीठ ने दंगा प्रभावित 56 दुकानदारों की एक याचिका पर सुनवाई करते हुए मोदी सरकार से जबाव तलब किया कि अदालत के आदेश के बाद भी इन दुकानदारों को मुआवजा क्यों नहीं दिया गया। गुजरात में इतना कुछ होने के बाद भी नरेन्द्र मोदी बीजेपी और संघ परिवार के चहेते बने हुए हैं। पार्टी को नहीं लगता कि गुजरात में कहीं कुछ गलत हुआ है। जब भी मोदी इल्जामों में घिरते हैं, पूरी पार्टी उन्हें बचाने में लग जाती है। बीजेपी की नजर में नरेन्द्र मोदी आज भी एक आदर्श मुख्यमंत्री हैं।

               नरेन्द्र मोदी गुजरात दंगों को गोधारा घटना की प्रतिक्रिया बतलाकर अपने गुनाहों को छिपाते आए हैं। जबकि, सच्चाई क्या है ? यह अब खुलकर सारे मुल्क के सामने आ गई है। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग, अल्पसंख्यक आयोग, सामाजिक संगठनों, अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार समूहों से लेकर मीडिया की तमाम रिपोर्टों में यह सच्चाई दर्ज है कि दंगों के दौरान मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी, उनके मंत्रिमंडल के कई दूसरे सदस्य और बड़ी तादाद में पुलिस अफसरों ने अपना संवैधानिक कर्त्तव्य निभाने की बजाय सूबे के अल्पसंख्यकों को दंगाईयों के रहमो करम पर छोड़ दिया था। गुजरात हाई कोर्ट की ताजा टिप्पणी ने उसी सच्चाई की एक बार फिर तस्दीक की है। गुजरात सरकार दंगों को रोकने में ही नहीं बल्कि साम्प्रदायिक हिंसा के शिकार लोगों को इंसाफ दिलाने के मामले में भी नाकाम रही। सबूतों को नष्ट करने की कोशिशों और सूबाई सरकार के असहयोगी रुख की वजह से सुप्रीम कोर्ट को दंगों के बहुत से मामले सूबे के बाहर स्थानांतरित करने पड़े। दंगा पीड़ितों के जानिब मोदी सरकार की उपेक्षा का ही नतीजा है कि दंगों में बेघर हुए हजारों लोग आज भी शरणार्थी शिविरों में रहने को मजबूर है। बीते कुछ दिनों से सारे गुजरात में घूम-घूमकर कथित सद्भावना मिशन में लगे और उपवास का ढोंग कर रहे मोदी को दंगा पीड़ितों के पुनर्वास की जरा भी परवाह नहीं।

               कुल मिलाकर, गुजरात हाई कोर्ट के हालिया फैसले ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी, मुल्क के सामने लाख झूठ बोलें, लाख गलतबयानियां करें मगर सच को नहीं दबाया जा सकता। सच को जितना दबाया जाएगा, वह उतना ही प्रबलता से दोबारा सामने आएगा। गुजरात दंगों को पूरे 10 साल हो गए, लेकिन पीड़ितों को आज तक इंसाफ नहीं मिला। मोदी सरकार ने पीड़ितों को इंसाफ दिलाने के लिए अपनी ओर से कोई गंभीर जतन नहीं किए। उल्टे इस दौरान उसकी दिलचस्पी आरोपियों को सजा दिलाने की बजाय उन्हें बचाने में ही ज्यादा दिखी। राज्य का पहला दायित्व अपने नागरिकों की जान-माल और उनके बुनियादी अधिकारों की हिफाजत करना है। पर मोदी राज में इस संवैधानिक कर्त्तव्य की ही सबसे ज्यादा अवहेलना हुई है। अलबत्ता, हमारी अदालतों ने जरूर अपना काम पूरी ईमानदारी और कर्त्तव्यनिष्ठता से किया है। दंगों के मामले हों या फिर फर्जी मुठभेड़ के मामले, गोया कि सूबे में इन सब मामलों में अभी तक जो भी इंसाफ मिला है, वह अदालत की बदौलत है। गुजरात में आज भी ऐसे सैंकड़ों लोग हैं, जो अदालतों में इंसाफ पाने के लिए जी-जान से जुटे हुए हैं। इंसाफ उनसे दूर सही, पर मुल्क की अदालत और उसके कानून पर उनका यकीन यह हौंसला बंधााता है कि एक दिन जरूर वे अपनी हारी हुई लड़ाई जीतेगें।   

 
? जाहिद खान