संस्करण: 27 फरवरी- 2012

गुजरात में पशुवत जीवन जीने को मजबूर हैं मुसलमान

? एल.एस.हरदेनिया

               गुजरात के 2002 के नरसंहार के बाद दस साल गुजर गये परंतु अभी भी वहां रहने वाला आम मुसलमान भय और आतंक के साये में जी रहा है। उसे हमेशा इस बात का डर रहता है कि किसी भी क्षण आतंकवादी घोषित कर उसे जेल की काल कोठरी में धकेल दिया जायेगा। उसे जिन परिस्थितियों में जीना पड़ता है उनके चलते उसे यह महसूस होता है कि वह दोयम दर्जे का नागरिक है।

                 गुजरात के आम मुसलमान किन मानसिक और भौतिक परिस्थितियों में जी रहे हैं यह पता लगाने के लिए गुजरात की राजधानी अहमदाबाद में एक सार्वजनिक सुनवाई आयोजित की गई थी। सुनवाई का आयोजन देश और गुजरात की अनेक संस्थाओं और संगठनों ने मिलकर किया था। सुनवाई के लिए गठित जूरी के मुखिया थे,पूर्व न्यायाधीश आर.ए.मेहता। जूरी के अन्य सदस्यों में जाने-माने सामाजिक कार्यकर्ता शामिल थे। जनसुनवाई के दौरान पीड़ित व्यक्तियों से यह जानने का प्रयास किया गया था कि गुजरात के नरसंहार के बाद 10 वर्ष गुजर गये हैं। इतने लंबे अंतराल के बाद वे (मुस्लिम) कैसा महसूस कर रहे हैं? यह आम चर्चा है कि गुजरात विकास कर रहा है, गुजरात में शांति है, गुजरात में सर्वजन सुखाय सरकार सत्ता में है और गुजरात की अस्मिता चमकने लगी है। यह सारा दावा सरकारी प्रचार के द्वारा किया जा रहा है। क्या सरकारी सूत्रों द्वारा प्रचारित स्थिति वास्तव में है?

               सुनवाई में अपनी व्यथा को सुनाने के लिए प्रदेश के लगभग सभी क्षेत्रों से लोग आये थे। लगभग 63 पीड़ितों और उनके परिवार के सदस्यों ने अपने-अपने क्षेत्र में व्याप्त प्रतिकूल परिस्थितियों से जूरी को अवगत कराया। जिन लोगों ने जूरी के समक्ष बयान दिया उनमें से 19 अहमदाबाद से, 13 बडौदा से, 5 गोधरा से, 5 सूरत से और 12 दाहोद से थे। सबका यही कहना था कि आज भी आम मुसलमान आतंक और भय के साये में जी रहे हैं। आज जो वातावरण है उसमें ऐसा लगता है जैसे उन्हें नागरिक के अधिकार प्राप्त नहीं है। उन्हें राज्य के किसी भी सरकारी और गैर-सरकारी संस्थाओं से किसी भी प्रकार की सहायता और यहां तक की सलाह तक उपलब्ध नहीं होती है।

               यहां तक कि पुलिस और कानूनी व्यवस्था से भी उन्हें संरक्षण नहीं मिलता है। उलटे हम पुलिस और कानूनी व्यवस्था से दूरी बनाए रखने में ही अपनी सुरक्षित महसूस करते हैं। हमें 24घंटे यह भय सताता रहता है कि कहीं हमें आतंकवादी घोषित न कर दिया जांय या हमारे परिवार के किसी सदस्य को जेल में न ड़ल दिया जांय। आम तौर से यदि किसी मुसलमान को किसी झूठे मामले में पुलिस पकड़कर ले जाती है,तो उसे लंबे समय तक जमानत का इंतजार करना पड़ता है और जब तक वह जेल में रहता है उसके ऊपर तरह-तरह की ज्यादतियाँ की जाती है। इसके साथ ही हमें समाज के प्रत्येक क्षेत्र में भेदभाव का सामना करना पड़ता है। जिन क्षेत्रों में हमारे साथ भेदभाव किया जाता है उनमें शिक्षा, रोजगार, हाऊसिंग और नागरिक सेवायें जैसे बिजली, पानी और स्वास्थ्य सेवायें शामिल है। इससे हम गरीबी और अभाव के चक्रव्यूह में फंसे रहते हैं।यहां तक कि मीडिया-प्रिन्ट और इलेक्ट्रानिक दोनों-में भी हमारे साथ भेदभाव किया जाता है। हमारे चारों तरफ घृणा और भेदभाव का वातावरण बना रहता है जिस कारण हमें एक प्रकार की घुटन का जीवन व्यतीत करना पड़ता है। सच पूछा जांय तो जिन परिस्थितियों में हम यहां रह रहे हैं,वे उनसे पूरी तरह विपरीत हैं जिनका प्रावधान संविधान में किया गया है। संविधान के अनुसार समाज में धर्मनिरपेक्षता, सामाजिक न्याय और भाईचारे का वातावरण रहना चाहिए। परंतु सन् 2002के बाद हम इस तरह के वातावरण के लिए तरस रहें हैं और हमें यह भी नहीं मालूम कि हम कब तक तरसते रहेंगे।

               जूरी के समक्ष अपने बयान देते हुए पीड़ितों ने कहा कि हम भी चाहते हैं कि हम प्रदेश के विकास के कार्यों में हिस्सेदार बने। परंतु हमें ऐसा करने का अवसर नहीं दिया जाता है। सरकार और हिन्दुओं का एक हिस्सा यह मानता है कि हमें तो यहां रहने तक का अधिकार नहीं है। अनेक मुसलमानों को, विशेषकर युवकों को किसी न किसी मामले में फंसाने के प्रयास किए जाते हैं। युवकों के ऊपर झूठे आरोप लगाये जाते हैं और उन्हें किसी न किसी आतंकवादी घटना से जोड़ा जाता है। इन युवकों को एक नहीं 20 से 30 मामलों में फंसाया जाता है। स्पष्ट है कि इन मामलों से राहत पाने के लिए उन्हें अपनी पूरी जिन्दगी संघर्ष करना पड़ सकता है।          

                 मुसलमानों को एक और संकट का सामना करना पड़ता है। वह संकट है बहिष्कार का। बहिष्कार के कारण व्यापारी हमसे सभी प्रकार के रिश्ते तोड़ लेते हैं। हमारे युवकों को रोजगार नहीं मिलता है। नतीजे में अनेक मुस्लिम परिवार भूखमरी की स्थिति में जीवन यापन करने को मजबूर हो जाते हैं। मुसलमानों को किराये से मकान पाना काफी कठिन है। न सिर्फ कठिन वरन् असंभव है। यदि मुसलमान मकान खरीदना चाहता है तो उसे शायद ही कोई हिन्दू बेचने को तैयार होता है। मुसलमानों के बारे में सतत यह प्रचार होता रहता है कि वे गौहत्या करते हैं ताकि उनका मांस खा सकें। जन सुनवाई के बाद जूरी ने अपनी रिपोर्ट में गुजरात के मुसलमानों की स्थिति पर चिंता प्रगट करते हुए उसमें सुधार के लिए अनेक सुझाव दिये। एक सुझाव यह दिया कि जिन लोगों को यह शंका है कि उन्हें झूठे मामलों में फंसाया गया है उन मामलों की सत्यता जानने के लिए एक उच्चस्तरीय जांच आयोग गठित किया जांय। इस आयोग का मुखिया सर्वोच्च न्यायालय के अवकाश प्राप्त मुख्य न्यायाधीश को बनाया जांय। जाँच के बाद यदि आयोग इस नतीजे पर पहुँचता है कि आरोप झूठे थे तो उन पुलिस अधिकारियों को जिन्होंने झूठे मामले बनाये थे कड़ा दंड दिया जांय। भारत सरकार के अल्पसंख्यक मंत्रालय के किसी उच्च अधिकारी की नियुक्ति की जांय जो इस बात पर नजर रखे कि अल्पसंख्यकों को उन योजनाओं का लाभ मिल रहा है या नहीं जो उनके लिए बनाई गई हैं। पीड़ित मुसलमानों के लिए नि:शुल्क कानूनी सहायता की व्यवस्था की जांय। कानूनी सहायता के लिए प्रत्येक जिले में एक अधिकारी को पदस्थ किया जाए। इस तरह के संगठनों की गतिविधियों को नियंत्रित किया जाए  जो मुसलमानों को तरह-तरह की धमकियां दिया करते हैं। जिन मुसलमानों को दंगा पीड़ित मान लिया गया है उन्हें वह सब सहायता दी जाए जिसकी उन्हें पात्रता है। यह आम शिकायत है कि मुसलमानों को सहकारिता क्षेत्र के बैंको और अन्य बैंकों से कर्ज नहीं मिलता है। जरूरत मंद लोगों को कर्ज प्राप्त हो इसके लिए एक यह सुनिश्चित प्रयास किया जाए। यह भी सुनिश्चि किया जाए कि मुसलमानों के बच्चों को सभी शिक्षण संस्थाओं में पढ़ने की सुविधाा मिले। इसके अतिरिक्त स्वास्थ्य सेवाओं का लाभ भी उन्हें सतत मिले यह सुनिश्चित किया जाए।

  ? एल.एस.हरदेनिया