संस्करण: 27 फरवरी- 2012

नेशनल कांउटर टेररिज्म सेंटर पर बवाल क्यों

? नीरज नैयर

                तंकवाद के नाम पर केंद्र को कठघरे में खड़ा करने वाले राय खुद इस मसले पर कितना गंभीर हैं इसका अंदाजा इस बात से हो जाता है कि अधिकतर राय सरकारों को नेशनल कांउटर टेररिज्म सेंटर (एनसीटीसी) पर आपत्ति है। राज्यों की इस आपत्ति की वजह इस नई संस्था को मिलने वाले अधिकार हैं, राज्य मानते हैं कि एनसीटीसी के अस्तित्व में आने के बाद उनके अधिकारों में कटौती हो जाएगी।

                भाजपा शासित राज्यों ने तो इसे बाकायदा संघीय ढांचे के लिए खतरा बताया है। यूपीए सरकार के लिए सबसे यादा परेशानी की बात ये है कि उसके सहयोगी भी विरोधियों की जमात का हिस्सा हैं। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के अलावा डीएमके ने भी इस प्रावधान पर नाराजगी जताई है। अब तक जिन राज्यों ने एनसीटीसी का खुलकर विरोध किया है उनमें मधयप्रदेश, गुजरात, बिहार, हिमाचल प्रदेश, पश्चिम बंगाल, उड़ीसा, तमिलनाडु और उड़ीसा शामिल हैं। इन राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने बाकायदा प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर अपनी नाराजगी का इजहार किया है। राज्यों को इस केंद्रीय एजेंसी के अधिकार क्षेत्र और कार्यप्रणाली पर आपत्ति है। एनसीटीसी के अस्तित्व में आने के बाद केंद्रीय एजेंसियों को आतंकी विरोधी कार्रवाई के लिए राज्यों का मुंह नहीं तकना होगा। उनके पास सबूत जुटाने के लिए तलाशी और आरोपियों की गिरतारी का अधिकार होगा। एनसीटीसी सभी जांच और सुरक्षा एजेंसियों से आतंकवाद संबंधित जानकारियां एकत्रित करेगी। इसके बाद जानकारियों के आधार पर टेरर माडयूल को खत्म करने का काम किया जाएगा। एनसीटीसी का काम महज सूचनाओं का आदान-प्रदान ही नहीं होगा। उसे ये भी देखना होगा कि सूचनाओं पर प्रभावशाली ठंग से काम किया जाए। मौजूदा वक्त में आईबी का मल्टी एजेंसी सेंटर (एमएसी) आतंक संबंधित जानकारियों को एकत्रित करने का काम करती है। एनसीटीसी के अस्तित्व में आने के बाद एमकेसी उसमें सम्मलित हो जाएगी। एनसीटीसी में आईबी में काम कर रहे लोगों या आईबी में सीधे भर्ती हुए लोगों को शामिल किया जाएगा। इसमें रॉ, जेआईसी, सेना इंटेलिजेंस डाइरेक्टोरेट, सीबीडीटी और मादक द्रव्य नियंत्रण ब्यूरो जैसी अन्य एजेंसियों के अधिकारियों को भी लिया जाएगा। राज्यों को अंदेशा है कि एनसीटीसी असीमित शक्तियों का प्रयोग उनके खिलाफ कर सकती है। आतंकवाद के मसले पर केंद्र और रायों के बीच इस तरह के टकराव की नौबत हमेशा से बनी रही है। राय सरकारें असफल रिकॉर्ड के बावजूद इस मुद्दे पर पूर्ण स्वतंत्रता चाहती हैं। अहमदाबाद, बेंगलुरु, जयपुर आदि शहरों में हुए धामाकों के गुनाहगार इतने सालों बाद भी गिरत में नहीं आ सके हैं। ज्यादातर आतंकी हमलों में जांच महज खानापूर्ति तक ही सिमट कर रह जाती है।

                राज्य सरकारें खुद भी अपने सीमित संसाधनों का हवाला देती हैं, लेकिन बावजूद इसके कोई अच्छी पहल उन्हें स्वीकार नहीं। एनसीटसी के वजूद में आने के बाद एजेंसियों में तालमेल की कमी जैसी समस्या से मुक्ति मिलने की संभावना काफी हद तक बढ़ जाएगी। आमतौर पर जांच और सुरक्षा एजेंसियां एक-दूसरे के इनपुट को तवज्जो नहीं देतीं। एनसीटीसी के बनने के बाद सारी एजेंसियां सीधो एनसीटीसी को सूचनाओं का आदान-प्रदान करेंगी। रक्षा विशेषज्ञ भी मौजूदा वक्त में एक ऐसी एजेंसी की जरूरत दर्शा चुके हैं जो सीमाओं के फेर में न उलझे। सीबीआई के पूर्व निदेशक जोगिंदर सिंह और सी उदय भास्कर का मानना है कि तमाम इंतजामों के होते हुए आतंकवादी वारदातें समन्वय की कमी को दर्शाती हैं। दो राज्यों की पुलिस में कोई तालमेल नहीं होता, लिहाजा केंद्रीय एजेंसी का होना जरूरी है। ये बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण बात है कि हमारे देश में आतंकवाद पर भी राजनीति होती है। भाजपा हर धमाके के बाद पोटा का रोना रोने लगी है जबकि इससे इतर भी कुछ सोचा जा सकता है। अमेरिका आदि देशों में भी तो सियासत का रंग यहां से जुदा नहीं है मगर वहां आतंकवाद जैसे मुद्दों पर एक दूसरे की टांग खींचने के बजाए मिलकर काम किया जाता है। अमेरिका ने अलकायदा का नामों निशान मिटाने के लिए इराक के साथ जो किया क्या वो हमारे देश में मुमकिन है? शायद नहीं। राज्य सरकारें अपनी सुरक्षा व्यवस्था की चाहें लाख पीठ थपथपाएं मगर सच यही है कि उनका पुलिस तंत्र अब इस काबिल नहीं रहा कि आतंकवादियों से मुकाबला कर सके। इसमें सुधार अत्यंत आवश्यक है पर राज्य इसके प्रति भी गंभीर नहीं दिखाई देते। केंद्र सरकार से हर साल पुलिस आधुनिकीकरण के नाम पर मिलने वाली भारी- भरकम रकम का सदुपयोग भी राज्य नहीं कर पाते हैं।  मौजूदा वक्त में आतंकवाद का स्वरूप जितनी तेजी से बदला है उतनी तेजी से राज्य अपने आप को तैयार नहीं कर पाए हैं। पहले आतंकवाद का स्वरूप क्षेत्रिय था पर अब अखिल भारतीय हो गया है। आतंकवादी सुरक्षा व्यवस्था की खामियों की तलाश में एक राज्य से दूसरे राज्य घूमते रहते हैं ताकि उन खामियों का फायदा उठाया जा सके। ऐसे में आतंकवादियों से निपटने के लिए तरीका भी अखिल भारतीय होना चाहिए। राज्य अकेले इस खतरे से अपने बलबूत नहीं निपट सकते। अमेरिका में भी आतंकवाद से मुकाबले के लिए एनसीटीसी नामक संस्था मौजूद है। 911के बाद अमेरिका ने आंतरिक सुरक्षा के लिहाज से बड़े बदलाव किए। 2003 में टेररिस्ट थ्रैट इंटीग्रेशन सेंटर (टीटीआईसी) की स्थापना की गई। 2004 में इसका नाम बदलकर एनसीटीसी किया गया। इस संस्था का काम राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आतंकवाद से संबंधित सूचनाओं को जुटाना है। यही वजह है कि वहां 2001के बाद कोई आतंकवादी घटना नहीं हुई। लेकिन इस दौरान भारत में न जाने कितने बम फूट चुके हैं। देश में आतंकवाद रोकने के लिए जो कानून हैं वो काफी हैं, जरूरत है तो बस इनको प्रभावी बनाने की। आतंरिक सुरक्षा का जिम्मा रायों का मामला होता है, ऐसे में केंद्र चाहकर भी दहशतगर्दो के खिलाफ अभियान नहीं छेड़ सकता। हर वारदात के बाद राज्य सरकारें सारा दोष केंद्र पर मढ़कर खुद को पाक-साफ साबित करने की कोशिश में लग जाती हैं। वैसे भी केंद्र सरकार इस बात को साफ कर चुकी है कि नई एजेंसी केवल आतंकवाद से जुड़े मुद्दों को देखेगी,तो फिर रायों में उसमें आपत्ति क्यों है। कम से कम आतंकवाद के मुद्दे पर तो राज्यों और राजनीतिक दलों को सियासत से परहेज करना चाहिए। भाजपा आदि दलों को समझना होगा कि ये वक्त आपसी खुंदक निकालने का नहीं बल्कि मिल बैठकर कारगर रणनीति बनाने का है ताकि फिर कोई आतंकी देश की खुशियों के साथ खिलवाड़ न कर सके।  


? नीरज नैयर