संस्करण: 27 फरवरी- 2012

ईरान, अमेरिका और भारत के रिश्ते

? महेश बाग़ी

               रान फिर सुलग रहा है या सुलगाया जा रहा है ? अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यह सवाल गूंज रहा है और ऐसा माना जा रहा है कि अमेरिका ईरान पर युध्द थोप सकता है। दरअसल ईरान द्वारा खुद को परमाणु सम्पन्न देश घोषित करने के बाद अमेरिका प्रासन की भृकुटि टेढ़ी हो गई है। ईरान के इस क़दम से बौखला कर अमेरिका और यूरोपीय संघ ने उसके विरुध्द प्रतिबंध की घोषणाकर दी। बदले में ईरान ने भी अमेरिका और यूरोपीय संघ को तेल की आपूर्ति बंद कर दी। इतना ही नहीं,ईरान ने एक साल पहले सीरिया के साथ हुए समझौते के तहत अपने जंगी जहाज वहां भेज दिए हैं,ये जहाज सीरिया की नौसेना को ट्रेनिंग देने गए हैं। उधर अमेरिका भी सीरियाई सेना द्वारा तैनात बलों तथा बेगुनाह नागरिकों को मारे जाने की भी निगरानी कर रहे हैं। ईरान की इस पहल से भी अमेरिका खफ़ा है तथा उसने सीरियाई प्रशासन के खिलाफ़ तत्काल कार्रवाई करने का प्रस्ताव भी किया,किंतु 50से अधिक कंजरवेटिव सदस्यों के विरोध के चलते यह प्रस्ताव ख़ारिज हो गया।

               अफगानिस्तान और इराक के घाव अभी भरे नहीं हैं। ऐसे में यदि इज़राइल, अमेरिका और उसके मित्र देश ईरान के खिलाफ कोई अतिवादी कार्रवाई करते हैं,तो इसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं। जिस तरह इराक पर अमेरिकी हमले से पूरी दुनिया के मुसलमानों की भावनाएं आहत हुई थीं,वैसी ही भावना फिर उठ सकती है। दुनियाभर के मुसलमानों में यह अहसास फिर ज़ोर पकड़ सकता है कि अमेरिका इस्लाम का दुश्मन है। वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हमले के रूप में अमेरिका इसका ख़ामियाजा फिर भुगत सकता है। हालांकि उसने इस हमले के सूत्रधार ओसामा बिन लादेन को ख़त्म कर अपनी ताकत का अहसास करवा दिया था,  किंतु वह अपने मित्र देश पाकिस्तान को विश्वास में नहीं ले सका, जिसने ओसामा के छुपने की जगह की जानकारी देने वालों के खिलाफ कड़ा कदम उठाया है।

                यदि अमेरिका ईरान के विरुध्द कोई बड़ा क़दम उठाता है, तो उसे पहले ईरान की ताकत का भी आंकलन कर लेना चाहिए। दुनिया में वितरित होने वाले तेल का 11 प्रतिशत भाग ईरान से ही आता है, जो यूरोपीय संघ और अमेरिका के प्रतिबंधा के बावजूद भारत-चीन और तमाम यूरोपीय देश ख़रीदते हैं। चीन इसका सबसे बड़ा आयातक देश है,इसीलिए वह खुलकर ईरान के साथ खड़ा है। भारत ने भी अमेरिकी प्रतिबंधों की मुख़ालफ़त कर ईरान का साथ दिया है। ईरान-अमेरिका में बढ़ती तनातनी ने भारत की चिंताएं भी बढ़ा दी हैं। एक ओर जहां भारत और अमेरिका के रिश्तों में लगातार गर्मजोशी आई है, वहीं भारत ने तेहरात से भी अच्छे संबंध बना कर रखे हैं। इसकी एक वजह यह भी है कि भारत हर महीने ईरान से 1.20करोड़ बैरल कच्चा तेल ईरान से मंगाता है। भारत में यह कच्चा तेल रिफाइंड किया जाता है, जिसका चालीस फ़ीसदी भाग वापस ईरान भेजा जाता है। भारतीय चावल की तो ईरान में भारी खपत होती है। ज़ाहिर है कि दोनों देश व्यापार में साझेदारी करते हैं।

               यहां यह उल्लेख करना भी अप्रासंगिक नहीं होगा कि जब भारत ने अफगानिस्तान के पुर्ननिर्माण में मदद की तो पाकिस्तान ने इस पर गहरी आपत्ति जताई थी। तब ईरान ने ही हमारी सुरक्षा एजेंसियों को अफगानिस्तान तक पहुंचने का मार्ग दिया था।ईरान के ज़रिये भारत की अफ़गानिस्तान तक पैठ को पाकिस्तान अपनी प्रभुसत्ता पर ख़तरा मानता है। उसे यह डर है कि यदि कभी उसे भारत के साथ युध्द करना पड़ा तो उसे दो-दो मोर्चों पर लड़ना पड़ सकता है। यही वजह है कि ईरान से रिश्तों को लेकर भारत ने अमेरिकी प्रतिबंधों का विरोध किया है। भारत के साथ एक दुविधा यह है कि उसे अपने देश के अल्पसंख्यकों की भावनाओं का भी ख्याल रखना है। यद्यपि ईरान शिया बहुल देश है, तथापि भारत के अल्पसंख्यक उसके विरूध्द किसी अमेरिकी कार्रवाई को सहन नहीं करेंगे। ग़ौरतलब है कि भारतीय राजनेता अल्पसंख्यकों वोट बैंक के रूप में देखते है तथा वे अमेरिका का साथ देकर उन्हें नाराज़ नहीं करना चाहेंगे। उधर अमेरिका भी अपनी ज़िद पर अड़ा हुआ है,किंतु उसकी विवशता यह है कि उसे अपने ही घर में पूर्ण समर्थन नहीं मिल रहा है। इराक में सैन्य कार्रवाई का भी अमेरिका में भारी विरोध हुआ है।

               इसी बीच कुछ ऐसे ख़तरनाक संकेत मिले हैं, जिनसे यह आभास होता है कि कोई अंतरराष्ट्रीय एजेंसी दुनिया की शांति भंग करने की फिराक में हैं। पिछले दिनों इज़राइल राजनयिक की पत्नी की नई दिल्ली में हत्या कर दी गई थी। इसी तरह बैंकाक में भी विस्फोट किए गए थे। इन दोनों घटनाओं की एक समानता यह है कि इनमें इस्तेमाल विस्फोटक बेहद महंगे और उन्नत किस्म के थे,जिनका इस्तेमाल आज तक किसी भी आतंकवादी संगठन ने नहीं किया है। फिर ये विस्फोटक कहां से आए ?ईरान पर आंखे तरेरने वाले अमेरिका को इस पर विशेष रूप से धयान देना होगा कि कहीं यही इजराइल को उकसाने की साज़िश तो नहीं है ?इसी के साथ विश्व समुदाय को अमेरिका पर दबाव बनाना चाहिए कि वह दुनिया पर एक और युध्द थोपने की ज़िद छोड़ दे।

 

? महेश बाग़ी