संस्करण: 27 फरवरी- 2012

भारत-ईरान सम्बंध तोडने की कोशिश

? शाहनवाज आलम

               दिल्ली में इजरायली राजनयिक की कार में विस्फोट और जार्जिया और थाइलैंड में इजरायलियों को निशाना बनाने की कोशिशों के बाद इरान के खिलाफ तल्खी बढ गयी है। मीडिया का एक बडा हिस्सा इस घटनाक्रम को आंख मूंद कर पश्चिमी नजरिये से विश्लेषित कर रहा है। जिसके तहत इजरायल को निर्दोष पीडित और इरान को उत्पिड़क के बतौर चित्रित किया जा रहा है। इस प्रक्रिया में मीडिया का यह हिस्सा, जो वैसे तो किसी आतंकी घटना के पीछे उसके इतिहास-भूगोल को खूब खंघालता है, अपने सामान्य विवेक के इस्तेमाल से भी परहेज कर रहा है। जाहिर है इसमें ऐसी कई कमजोर कडियां हैं जिन्हें 'आतंकी हमले' के शोर में छुपाने की कोशिश हो रही है।

               मसलन, आखिर ईरान के इस आरोप को किस बुनियाद पर खारिज किया जा सकता है कि इन हमलों के पीछे दुनिया भर में अपने छुपी कार्यवाइयों और टारगेट किलिंग के लिये बदनाम इजरायली खुफिया एजेंसी ने उसे खुद अंजाम दिया हो ताकि भारत और ईरान के रिश्ते खराब हों। अगर इन आरोपों को ठोस सबूतों के अभाव में स्वीकार नहीं किया जा सकता तब उन्हें नकारने के भी तो आधार होने चाहियें, जो नहीं हैं। दरअसल, ऐसे कई कारण है जिससे ईरान के आरोप ज्यादा मजबूत दिखते हैं जिसे भारत समेत बाहर के हालिया घटनाक्रम भी तर्कसंगत बनाते हैं। मसलन क्या इस घटना का विश्लेषण करते समय इसे नजरअंदाज किया जा सकता है कि दो साल पहले ही हिंदुत्ववादी आतंकी संगठनों के पर्दाफाश के बाद यह तथ्य सामने आये थे कि उन्हें इजरायली सरकार और मोसाद से भारत में आतंकी विस्फोट करने और अपने हिंदु राष्ट्र की परिकल्पना को साकार करने के लिये सैन्य और आर्थिक मदद मिली थी। यहां तक कि हिंदुत्ववादी शक्तियों द्वारा इजरायल से निवार्सित हिंदु सरकार चलाने और इजरायल से इसे मान्यता दे देने तक की सहमति बनी थी। और इजरायल को इस हिंदु राष्ट भारत की मान्यता के लिये संयुक्त राष्ट् संघ में भी आवाज उठाना था। जिसके एवज में हिंदुत्ववादी शक्तियों को भारत में इजरायल के पक्ष में जनमत तैयार करना था। यह सारे सथ्य एटीएस की चार्जशीट में दर्ज हैं।

               जहां तक इसके पीछे भारत-ईरान सम्बंधा बिगाडने और उल्टे ईरान को बदनाम करने का आरोप है तो इसे इजरायल समर्थक हिंदुत्ववादी संगठनों की कार्यशैली भी पुष्ट करती है। जिसकी झलक मक्का मस्जिद से लेकर समझौता एक्सप्रेस जैसी घटनाओं और असीमानंद की आत्मस्वीकृतियों में दिख चुकी है। जहां घटना को अंजाम तो इन संगठनों ने दिया और बदनाम हुए मुसलमान। तब सवाल उठता है इजरायली खुफिया एजेंसियां ऐसा क्यों नहीं कर सकतीं? दरअसल अभी महीने भर पहले ही केरल के कोच्ची शहर में आईबी और रॉ ने एक इजरायली जोडे रब्बी शेनोर जालमन और उसकी पत्नी येफ्फा शेनोय को राष्ट्रीय सुरक्षा के लेहाज से संदिग्ध गतिविधियों में लिप्त होने के आरोप में भारत छोड देने को हुक्म दिया था। जाहिर है इन तथ्यों से आंख नहीं मूंदा जा सकता।

                वहीं इन घटनाओं को हिजबुल्ला द्वारा अपने टॉप मिलीट्री कमांडर इमाद मुग्नियाह की 2008 में मोसाद द्वारा की गयी हत्या का बदला लेने से जोडना भी सही नहीं है। क्योंकि हिजबुल्ला की मारक क्षमता काफी मजबूत है जिसे दुनिया ने 2006 में 34 दिनों तक उसके इजरायल से चले युध्द में देखा है। जहां इजरायल को बैकफुट पर आना पड गया था। लेहाजा, ऐसी मारक क्षमता वाले संगठन के लोग इस तरह के हमले नहीं कर सकते जैसा बैंकाक में बताया गया। जहां हमलावर को इजरायली कार पर हथगोला फेकते बताया गया, जिसके एक पेड से टकरा जाने के चलते हमलावर खुद घायल हो गया। हिजबुल्ला की कार्यनीति से वाकिफ कोई भी व्यक्ति इस थियोरी को नहीं खरीदेगा। बहरहाल, इस संदर्भ में हिजबुल्ला नेता हसन नसरल्ला के बयान पर भरोसा न करने की कोई वजह नहीं दिखती। जिन्होंने इन घटनाओं में अपनी भूमिका नकारते हुये कहा कि उनके लिये अपने एक बडे नेता की हत्या का बदला किसी इजरायली राजनयिक या सैनिक की हत्या से लेना गरिमा के खिलाफ है, और वे जल्दी ही इमाद की गरिमा के अनुरूप हिसाब चुकाएंगे।

               दरअसल, इन घटनाओं के पीछे उद्येश्य भारत-ईरान सम्बंध बिगाडना और ईरान को आतंकी राष्ट् प्रचारित करना है। जिसकी वजहों को समझना मुश्किल नहीं है। दरअसल, इस साल अमरीका में चुनाव होने हैं। ऐसे में यदि ओबामा ईरान पर हमला करते हैं तो उनके लिये वैसे ही रास्ता आसान हो जायेगा जैसे बुश के लिये इराक युध्द से हुआ था। दूसरे, उनकी पार्टी को आर्थिक संकट से यहूदी लॉबी उबार देगी। जो अन्यथा रिपब्लिक पार्टी के साथ जा सकती है। लेकिन सवाल उठता है कि भारत इस डर्टीगेम में क्यों खींचा जा रहा है? तो इसका जवाब इजरायल-अमरीका की यह रणनीति है कि किसी तरह भारत को ईरान के खिलाफ करके उसे चीन के सामने खडा कर दिया जाये जो ईरान के साथ रहेगा। यह अमरीका की 'ड्ीम 21वीं सेंचुरी प्रोजेक्ट' का हिस्सा है। जिस पर पिछले दिनों भी इजरायल अमल करता दिखा जब उसने पूर्वी यरूशलम में महात्मा गांधी की प्रतिमा लगाने की नाकाम कोशिश की। दरअसल, उसकी रणनीति यह थी कि यदि 1967 में फिलिस्तीन से हडपे गये इस भूभाग पर वह प्रतिमा लगाने में सफल हो जाता है तो उस पर उसकी दावेदारी मजबूत हो जायेगी। वहीं अगर फिलिस्तीन इसका विरोध करता है तो वह इसे भारत के राष्ट्रपिता का विरोध प्रचारित कर भारत को फिलिस्तीन के खिलाफ खडा कर लेगा। मौजूदा घटनाओं को भी इसी क्रम में देखना होगा।

 

? शाहनवाज आलम