संस्करण: 27 फरवरी- 2012

हिंदुत्ववादी डिक्शनरी के मायने

? राजीव कुमार यादव

               हिंदुत्ववादी राजनीति लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष भारतीय राज्य व्यवस्था के समानांतर एक सांप्रदायिक और फासिस्ट राज्य व्यवस्था का खाका रखती है। जिसका हर तत्व मौजूदा राज्य व्यवस्था के विपरीत होता है। इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिये वह सिर्फ चुनावी और गैर चुनावी मोर्चों पर ही सक्रिय नहीं रहती बल्कि उसने भाषाई स्तर पर भी अपनी एक अलग 'डिक्शनरी' विकसित की है। जिसके शब्दों का प्रयोग वह खास अर्थों और संदेशों को प्रेशित करने के लिये करती है। जिसकी ताजा झलक पिछले दिनों पिछडे मुसलमानों के आरक्षण सम्बंधी सलमान खुर्शीद और बेनी प्रसाद वर्मा के बयानों के बाद भाजपा नेताओं की तरफ से आयी टिप्पणियों में देखा जा सकता है।

               मसलन भाजपा के राष्टीय प्रवक्ता रविशंकर प्रसाद एक चैनल पर इस मसले पर चल रही बहस में मुसलमानों के आरक्षण को मुसलमानों का 'विशेषाधिकार' कह रहे थे। यहां गौरतलब है कि आरक्षण और विशेषाधिकार में जमीन-आसमान का फर्क होता है। जहां आरक्षण किसी भी समाज को उसके पिछडेपन के आधार पर उसे विकसित करने के उद्येश्य से राज्य द्वारा दिया जाता है तो वहीं विशेषाधिकार का आधार सामाजिक पिछडेपन के विपरीत सामाजिक तौर पर किसी समुदाय के ताकतवर होने के दम्भ से जुडा होता है। जिसका अर्थ दूसरे कमजोर तबकों के हक-अधिकार पर काबिज होने से पूरा होता है। जैसे सामंती समाज में किसी दबंग जाति के लोग योग्यता के बजाये सिर्फ अपने जातिगत दम्भ के आधार पर शासन करने या धार्मिक निजाम को अपने हाथ में रखने का विशेषाधिकार रखते थे। यानी 'आरक्षण' जहां रिसीविंग एंड या हाशिये के लोगों को मिलता है वहीं 'विशेषाधिकार' के साथ सामाजिक आक्रामकता का पहलू जुडा है।

                 ऐसे में रविशंकर प्रसाद इस शब्द के इस्तेमाल से अल्पसंख्कों को मिलने वाले आरक्षण रूपी बैसाखी को किस तरह बहुसंख्यक समाज को निशाना बनाने वाली बंदूक प्रचारित कर साम्प्रदायिकता का कार्ड खेलना चाह रहे थे, समझा जा सकता है। इसी तरह भाजपा के एक दूसरे नेता सलमान खुर्शीद के बयान की तुलना 'रक्षक का भक्षक' बन जाने के मुहावरे से कर रहे थे। जाहिर है वे यही बताना चाह रहे थे कि भारत के कानून मंत्री का काम मुसलमानों से हिंदुओं की रक्षा करना है, और अल्पसंख्यकों को आरक्षण देने का वायदा कर के कानून मंत्री जो स्वयं भी मुस्लिम हैं, हिंदुओं के भक्षक बन  गये हैं। 

                दरअसल, इस तरह की शब्दावलियों के प्रयोग से हिंदुत्ववादी शक्तियां मौजूदा लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष राज व्यवस्था को कमजोर करने और उसके समानांतर अपने साम्प्रदायिक फासीवादी तंत्र के पक्ष में जनमत तैयार करने के लिए करती हैं। जिससे निर्मित तर्कों का इस्तेमाल वो अपने संविधान और लोकतंत्र विरोधी गतिविधियों को जायज ठहराने के लिये करती हैं। मसलन, 90 के दशक के शुरूआती दौर में लालकृष्ण आडवाणी और दीगर हिंदुत्ववादी नेताओं ने धर्मनिरपेक्षता को 'छद्म धर्मनिरपेक्षता' बताना शुरू किया। जिसके आधार पर अपने उपर लगने वाले आरोपों को वे खारिज करने की कोशिश करने लगे। आज आडवाणी, नरेंद्र मोदी, बाल ठाकरे, दारा सिंह और बाबू बजरंगी जैसे तत्व अपने मानवता और संविधान विरोधी अपराधों को इसी तर्क से जायज ठहराते फिरते हैं। जिसे समाज का एक बडा हिस्सा भी सही मानता है।

                 इस तरह अवचेतन रूप से जनता के एक बडे हिस्से को वे संविधान प्रदत मूल्यों के खिलाफ गोलबंद करते जाते हैं। जो अनुकूल मौका पाते ही अपनी तमाम विद्रूपताओं के साथ गुजरात या कंधामाल जैसी घटनाओं में उजागर होती है। यह प्रक्रिया किस हद तक किसी आधुनिक समाज के मनुष्य को मध्ययुगीन बर्बता से लैस कर देने की क्षमता रखती है इसका अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि किसी महिला के पेट से उसके अजन्में बच्चे को चीर कर निकालने के बाद उसे भाले की नोक पर टांगने या किसी पादरी को उसके दो बच्चों समेत कार में जलाने से उसकी चेतना तुष्ट होती है। और इसकी वजह सिर्फ यह होती है कि वो 'हिंदुत्ववादी डिक्शनरी' के शब्दों पर भरोसा कर रहे होते हैं। 

                दरअसल आज जरूरत ऐसे मुद्दों पर यूरोप से सीखने की है। जहां फासीवाद के उभार को रोकने के लिये वहां के संविधान ने सख्त प्रावधान बनाये हैं। जिसकी निगरानी सिर्फ ऐसे संदिग्ध संगठनों पर ही नहीं रहती बल्कि उसके सांसकृतिक अभिव्यक्ति पर भी वह नजर रखता है। जिसके चलते वहां ऐसी भाषा और शब्दावलियां सार्वजनिक अभिव्यक्तियां नहीं पातीं। मसलन जमर्नी में नाजी पार्टी के प्रतीक स्वास्तिक का प्रदशर्न, उसकी स्तूती, नस्ली टिप्पणि या दूसरे समुदायों के खिलाफ विषवमन करके आप बच नहीं सकते। जबकि अपने यहां यह सब कुछ करते हुये भी कोई भी बच सकता है।

? राजीव कुमार यादव