संस्करण: 27 फरवरी- 2012

राजनीति का सूत्र

जाको बैरी चैन से सोये-

बाके जीवन को धिक्कार

? राजेन्द्र जोशी

                पका बैरी यदि चैन से सो रहा है तो इसका मतलब यह हुआ कि वह न तो आपसे भयभीत है और न ही उसे आपकी तरफ से किसी भी तरह का खतरा महसूस हो रहा है। वह अपने आगे आपको कुछ नहीं समझता है। उसे हरदम यह विश्वास और भरोसा बना रहता है कि वह कितना ही आपके खिलाफ विषवमन करे या आपको नुकसान पहुंचाने के खेल खेलता रहे, आप उससे जीत नहीं सकते। कुल मिलाकर निष्कर्ष यह निकलता है कि आप हर मामले में उसके कद के सामने बौने ही साबित हो रहे हैं, इसीलिए तो निश्चित होकर वह सुकून से सो रहा है और सपने देख रहा है। ऐसे बैरी को रात में तो गहरी नींद आती ही है, वह दिन में भी दोपहर की निद्रा का लुत्फ उठाने में पीछे नहीं रहता। यदि ऐसा बैरी सुकून की जिन्दगी जी रहा है तो वह निश्चित मानिये कि वह आपसे छीने हुए सुकून और सुख-शांति की बदौलत ही चैन की बंशी बजा रहा है। चूंकि वह बैरी आपका चैन चुरा चुका है इसलिए अब आप दिन में सोने के बारे में तो सोच ही नहीं सकते बल्कि रात में भी करवट बदलते रहिए।

                 आप किसी भी क्षेत्र में रहकर अपना जीवन गुजारिए, चाहे राजनीति का क्षेत्र हो, समाज सेवा का क्षेत्र हो, व्यवसाय या उद्योग का क्षेत्र हो, उन सभी क्षेत्रों में मित्रों से कहीं ज्यादा आपको अपने बैरियों से पाला पड़ता रहता है। अब आपकी अपनी दक्षता, कुशलता और चतुराई पर यह निर्भर करता है कि आपके बैरी की दशा क्या हो ! होता तो यह है कि चूंकि आप भी अपने बैरी-भाव में दोनों पक्षों के सुकूनों की परस्पर खींचतान चलती रहती हैं एक पक्ष दूसरे पक्ष पर जब तगड़ा वार कर देता है तो स्वाभाविक है दूसरा पक्ष कमजोर पड़ जाता है और जब एक पक्ष कमज़ोर पड़ जाता है तो दूसरा पक्ष चैन की नींद सो जाता है। नींद भी प्राय: बैरी-केटेगरी के उसी पक्ष को अपनी गोद में ले लेती है जो भारी पड़ जाता है। दुबला पक्ष हमेशा करवट बदलता रहता है। दोस्ती और दुश्मनी के रिश्ते जितनी अधिाक इन दिनों राजनीति के क्षेत्र में बनते बिगड़ते रहते हैं, उतने किसी भी क्षेत्र में नहीं। देखने को मिल रहे हैं। राजनीति का क्षेत्र ही एक ऐसा है जिसमें यह तय कर पाना आसान नहीं है कि कौन कब किसका दोस्त बन जाय और कौन कब दुश्मनों की सूची में आ जाय। इन सबकी जड़ में है सत्ता-सुंदरी। सत्ता-सुंदरी के स्वयंवर में भाग ले रहे  बड़े-बड़े योध्दा अपने-अपने दलों के माध्यम से अपने बल और पौरूष के प्रदर्शन की प्रतिस्पर्धा में जुटे हुए हैं। एक दूसरे पटखरी देते हुए सत्ता के तख्त तक पहुंचने के लिए अपना गला आगे बढ़ा रहे हैं। सबको विश्वास है कि स्वयंवर के दौरान सत्ता की सुंदरी की जयमाला उन्हीं के गले में पड़ जायगी। सत्ता-सुंदरी भी बड़ी सयानी है। वह सब आकलन कर रही है कि स्वयंवर में शामिल बड़े-बड़े योध्दा का बेकग्राऊंड क्या है ? वह जानती है कि अपने अपने सेना दलों को जो-जो योध्दा लेकर महासंग्राम में उतरे हैं उनमें किसकी कितनी औकात है। इनमें से कौन उसके मंगलसूत्र की रक्षा कर पायेगा, कौन उसकी इज्जत बढ़ायेगा और कौन कहां ले जाकर उसका चीर-हरण करवा देगा।

                      सत्ता को उन सभी योध्दाओं के आचरण और चरित्र को अजमाने का मौका मिलता रहा है जिन्होंने पहले भी अगले पांच साल तक उसके मांग के सिंदूर का संरक्षण करते रहने का संकल्प लिया था। सत्ता सब जानती है कि कौन राम राम जपते हुए बगुला भगत का चोला धारण किए है, कौन धर्म, जाति, वर्गों और सम्प्रदायों के नाम का इंजक्शन लगवाकर अपनी ताकत बढ़ा रहा है। सत्ता-सुंदरी इस बात से भी सजग और वाकिफ है कि भारत जैसे विशाल प्रजातांत्रिक मुल्क और उसके सूबों की चौतरफा उन्नति में किस का 'हाथ' सदैव आगे आया है। कुल मिलाकर निर्वाचन का दौर एक तरह से सत्ता-स्वयंवर का रूप ले चुका है। अपने अपने गले तक आगे बढ़ गये हैं। अब देखना यह है कि जयमाला किस सेना दल के योध्दाओं के गले में जाकर पड़ेगी। एक तरह से राजनीति इन दिनों 'गला-काट' प्रतियोगिता के दौर से गुजर रही है। सभी योध्दा अपने बल-पौरुष का प्रदर्शन अपने-अपने बैरियों को शिकस्त देने के लिए कर रहे हैं। हर दल यह दुआ मना रहा है कि उसका बैरी चैन से न सो पाय। यदि किसी एक को चैन की नींद भी आ रही है तो दूसरा तब तक सोने नहीं जाता, जब तक वह ऐसा पांसा न फेंक दे, जिससे बैरी की नींद हराम हो जाय।

               पिछले दिनों एक टी.वी. चैनल में बातचीत के दौरान राजनीति के एक चर्चित और चतुर खिलाड़ी श्री दिग्विजय सिंह से साक्षात्कारकर्ता ने सवाल किया कि आपमें ऐसी क्या खूबी है कि आप अपने बयानों से सदैव सुर्खियों में रहते हैं और विपक्ष पर बड़ी चतुराई से वार करते रहते हैं। तब श्री दिग्विजय सिंह ने राजनीति में चाणक्य कहे जाने वाले मध्यप्रदेश के मरहूम मुख्यमंत्री पं. द्वारिकाप्रसाद मिश्र का हवाला देते हुए, खिलखिलाते हुए सुनाया था कि पंडितजी हमेशा कहते थे कि राजनीति में 'जाको बैरी चैन से न सोये, बाके जीवन को धिक्कार'। सच भी है यदि रण में मैदान जीतना है तो बैरी की तो नींद हराम करना ही पड़ेगा।

? राजेन्द्र जोशी