संस्करण: 27 फरवरी- 2012

राजनीति के ये 'विघ्न संतोषी' नेता

? सुनील अमर

                  चुनावी राजनीति को जिन्होंने करीब से जाना-भोगा है उनका मानना है कि यह एक जुआ है। जैसे जुए में जीतने वाला अचानक ही मालामाल हो जाता है और हारने वाला अपना सब कुछ दाँव पर लगाने को आमादा, ऐन उसी तरह राजनीति में भी होता है। फर्क बस इतना है कि जुए में हारा हुआ व्यक्ति धन जीतने की कोशिश करता है लेकिन राजनीति में हारा हुआ व्यक्ति अक्सर चोट खाए हुए सॉप की तरह कटखना हो जाता है और तब उसके प्रयास और मंशा महज इतनी भर रह जाती है कि वह भले ही न जीते लेकिन उसका विरोधी जरुर हारे। मौजूदा समय मे उत्तर प्रदेश में हो रहे विधानसभा चुनावों में इसे बेहतर ढ़ॅंग से देखा-समझा जा सकता है। यहॉ एक समय में दिग्गज रहे कई नेता खुद जीतने के लिए नहीं बल्कि अपने 'दुश्मनों' को हराने के लिए ऐलानिया ढ़ॅंग से चुनाव मैदान में हैं और कोई भी कोर-कसर बाकी नहीं छोड़ रहे हैं। उनकी डाह इतनी जबर्दस्त है कि दुश्मन की एक ऑंख जरुर फूटे, उनकी चाहे दोनो ही फूट जाय! कहने की जरुरत नहीं कि चुनावी गहमागहमी के बीच ऐसे लोग प्राय: विदूषक की भूमिका निभाते हैं। ये खेलने में नहीं बल्कि लोगों का खेल बिगाड़ने में संतोष पाते हैं।

               कभी समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव, प्रवक्ता तथा मुलायम सिंह के खासमखास रहने वाले अमर सिंह इन दिनों स्वगठित राष्ट्रीय लोकमंच नामक एक राजनीतिक दल के सर्वेसर्वा हैं और चुनाव मैदान में हैं। सभी जानते हैं कि सपा से निकाले जाने तक अमर सिंह की वहाँ तूती बोलती थी और अपने निष्कासन की उन्होंने कभी कल्पना भी न की रही होगी। निष्कासन पहले तो उनके लिए आघात जैसा था तत्पश्चात उनके समूचे व्यक्तित्व को झकझोरने वाला साबित हुआ। वे क्रोध और अपमान से खौल उठे और उन्होंने सार्वजनिक रुप से कहा भी कि वे समाजवादी पार्टी को मिटाकर रहेगें। सपा से निकाले जाने के बाद से अमर सिंह ने अब तक सैकड़ों जनसभाऐं की होंगी। उनके क्रोध और चिढ़ का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि उन्होंने अपनी प्रत्येक सभा और प्रेस वार्ता का केन्द्र मुलायम सिंह को ही रखा है और जितने भी तरह के शब्द-प्रहार संभव थे उन्होंने किया है। पूर्वांचल जागरण के नाम पर अमर सिंह ने अपने राष्ट्रीय लोकमंच के बैनर तले पचासों जनसभाऐं की और हर सभा में मुलायम सिंह को कोसने के साथ ही उन्होंने प्रतिज्ञा की कि वे समाजवादी पार्टी को नेस्तनाबूद करके छोड़ेंगें। अपने राजनीतिक संगठन के तहत वे अपने प्रत्याशियों को चुनाव भी लड़वा रहे हैं लेकिन उनका निशाना सिर्फ मुलायम सिंह ही हैं। राजनीतिक प्रेक्षकों का अनुमान है कि जितना धन और श्रम अमर सिंह मुलायम विरोध पर जाया कर रहे हैं उसी से वे अपना राजनीतिक आधार मजबूत करने के लिए बेहतर काम कर सकते थे। लेकिन एक राजनीतिक डाह है जो उन्हें खुद को सुखी नहीं बल्कि मुलायम सिंह को दु:खी देखने को प्रेरित कर रही है। पता नहीं यह अमर सिंह के चरित्र का उजागर होना था या मुलायम सिंह को नेस्तनाबूद कर देने का उनका ऐलान, सभी प्रमुख राजनीतिक दलों ने उन्हें अपने कुनबे मे शामिल करने से इनकार कर दिया। चारो तरफ से थक-हार कर ही उन्होंने राष्ट्रीय लोकमंच की स्थापना की।

               श्री अमर सिंह की ही तरह श्री कल्याण सिंह भी कभी भारतीय जनता पार्टी के लिए 'श्रीमान अपरिहार्य' माने जाते थे। अयोध्या आंदोलन के समय एक दौर ऐसा भी था कि श्री कल्याण सिंह भाजपा के लिए शक्ति पुंज सरीखे हो गये थे। इस स्थिति ने उन्हें दिग्भ्रमित कर दिया और वे पार्टी दिग्गजों से पंगा ले बैठे। वर्ष 1999 में भाजपा से अपने निष्कासन के बाद काफी समय तक वे भी अमर सिंह की तरह भयादोहन की राजनीति कर भाजपा को झुकाने की कोशिश करते रहे। उसमें असफल होने पर उन्होंने राष्ट्रीय क्रांति पार्टी की स्थापना कर भाजपा को मिटा देने की सार्वजनिक रुप से घोषणा की और चुनाव लड़ने के साथ-साथ उन्होंने भाजपा दिग्गजों पर व्यक्तिगत बयानबाजी भी की। यह कितना हास्यास्पद है कि इस सबके बावजूद जब वर्ष 2004 में उन्हें भाजपा में फिर से शामिल होने को कहा गया तो वे बिना एक क्षण गॅवाये अपनी पार्टी का उपसंहार करते हुए भाजपा में शामिल हो गये और एक बार फिर पार्टी का गुणगान करने लगे।

               हालॉकि वापसी पर कल्याण का वह रुतबा भाजपा में रह नहीं गया लेकिन किसी भी महत्तवाकांक्षी व्यक्ति की तरह वे यह मानने को तैयार नही थे। वे पार्टी के भीतर एक बार फिर टकराव का कारण बनने लगे और अंतत: भाजपा को तगड़ा झटका देने के विचार से एक अभूतपूर्व कदम उठाते हुए वे जनवरी 2009 में भाजपा की धुर विरोधी समाजवादी पार्टी में शामिल हो गये। भाजपा के लिए निश्चित ही यह सदमा सरीखा था लेकिन जैसा कि इस देश का राजनीतिक इतिहास गवाह है किसी राष्ट्रीय स्तर की पार्टी को उसका कोई विद्रोही नेता कोई खास क्षति नही पहॅुचा सका,भले ही वह कितने ही बड़े कद का क्यों न रहा हो। अपने बड़े कद की गफलत में चूर कल्याण सिंह की समाजवादी पार्टी में भी नहीं निभी और सपा प्रमुख को भी 2009 के लोकसभा चुनाव ने बता दिया कि उनका कल्याण को गले लगाने का फैसला राजनीतिक रुप से नुकसानदेह ही रहा है। फलत: एक बार फिर कल्याण अपने अखाड़े में हैं और अपनी उपसंहारित पार्टी को जरा बदले हुए नाम - जनक्रांति पार्टी ( राष्ट्रवादी ) से जीवित करते हुए भाजपा को नेस्तनाबूद करने की घोषणा के साथ विधानसभा चुनाव लड़ रहे हैं। उनकी हताशा और बिचलन का आलम यह है कि जिस उमा भारती को एक समय में वे अपनी मानस पुत्री कहा करते थे आज उसी उमा भारती के विरुध्द वे चरखारी विधान सभा क्षेत्र में मोर्चा खोले हुए हैं। उमा भारती ने तो अपना शब्द-संतुलन भरसक बना रखा है लेकिन कल्याण सिंह से यह तक नहीं हो पा रहा है! वे उमा के खिलाफ अनर्गल शब्दों का भी प्रयोग कर रहे हैं।

                 श्री कल्याण सिंह की ही तरह एक समय में उत्तर प्रदेश के वरिष्ठ कॉग्रेसी नेता नारायण दत्त तिवारी ने भी पार्टी से विद्रोह कर अपने कई संगी साथियों के साथ एक नयी पार्टी बनाकर कॉग्रेस को खत्म कर देने की घोषणा की थी। उनका हश्र भी कल्याण सिंह वाला ही हुआ था। कॉग्रेस को खत्म कर देने वाले अपने तमाम बयानों को अपनी पीठ से झटकते हुए वे मौका मिलते ही फिर से पार्टी में शामिल हो गये। अब इधार फिर यही काम वे अपने गृह प्रदेश उत्तराखंड में बैठकर कर रहे हैं। उत्तर प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी से तो कई ऐसे नेता निकाले गए जिन्होंने बाद में अपनी नई पार्टी बनाकर बसपा को खत्म कर देने का ऐलान किया। इसमें एक डॉ.मसूद थे जिन्होंने नेशनल लोकत्रांत्रिक पार्टी बनायी थी और एक श्री आर. के. चौधरी जिन्होंने पहले बी.एस.फोर. नामक एक मंच तत्पश्चात राष्ट्रीय स्वाभिमान पार्टी बनायी है और उसके बैनर तले चुनाव लड़ते हुए स्वयं को ही दलितों का एकमात्र खैरख्वाह साबित करने में लगे हुए हैं। यह बात और है कि उनके लिए अपनी सीट निकालना भी मुश्किल बना हुआ है।    यह भारतीय मतदाताओं का एक स्थापित मिजाज है कि अपनी जमीन तलाशने वाले नेता तो यहॉ सफल हो जाते है लेकिन दूसरों की जमीन खोदने वालों को यहॉ नहीं बख्शा जातां। यही कारण है कि सुश्री ममता बनर्जी, शरद पवार, रामबिलास पासवान, लालू प्रसाद यादव, मुलायम सिंह यादव आदि तमाम ऐसे नेता हैं जिन्होंने अपनी मूल पार्टी को छोड़ा लेकिन खुद की पार्टी खड़ी कर ली ।

? सुनील अमर