संस्करण: 27 फरवरी- 2012

भारत में हिन्दुत्व आतंक

सुपारी किलर्स अन्दर, मगर सुपारी देनेवाले कब तक बाहर !

?      सुभाष गाताड़े

                'दिल्ली हाईकोर्ट में बम फटा या बम्बई, बंगलौर में कहीं बम फटा ; ऐसे विस्फोटों के कुछ घण्टों बाद ही टीवी चैनल इस बात को दिखाने लगते हैं कि इण्डियन मुजाहिदीन,जैश ए मोहम्मद या हरकत जिहाद ए इस्लाम ने ई मेल या एसएमएस के जरिए बम विस्फोट की जिम्मेदारी कबूल की है। इन संगठनों के नाम हमेशा ही मुस्लिम नाम होते हैं। अब ईमेल को किसी भी शरारती व्यक्ति द्वारा भेजा जा सकता है,इसी को टीवी चैनलों पर दिखा कर या अगले दिन अख़बारों में दिखा कर सभी मुसलमानों को आतंकी साबित करने की कोशिश चलती रहती है। ... क्या मीडिया को बांटो और राज करो की इस नीति का हिस्सा बनना चाहिए।''

- प्रेस कौन्सिल के चेअरमैन मार्कण्डेय काटजू ने (अक्तूबर 2011)

               इन्द्रेश कुमार, संघ के वरिष्ठ नेताओं में से एक, इन दिनों आत्मविश्वास से लबरेज दिखते हैं।

                आज उन्हें देख कर शायद ही कोई यकीन करेगा कि कुछ माह पहले ही यह ख़बरें सुनाई दे रही थीं कि इस मुल्क में बहुसंख्यकवादी आतंक का जो सिलसिला चला है उसमें संलिप्तता को लेकर जनाब इन्द्रेश कुमार को हिरासत में लिया जाएगा। दरअसल मक्का मस्जिद बम धमाके,अजमेर शरीफ बम ब्लास्ट,समझौता एक्स्प्रेस बम धमाके आदि विभिन्न आतंकी गतिविधियों को अंजाम देने वाले कई अतिवादियों ने -पुलिस को जनाब इन्द्रेश की भूमिका से अवगत कराया था ;यहां तक कि असीमानन्द के कबूलनामे में भी हिन्दुत्व आतंक को फैलाने में इन्द्रेश कुमार की भूमिका का जिक्र था।

               ऐसा प्रतीत हो रहा है कि अब कमसे कम उनके लिए खतरा टल गया है और शायद यह मौन सहमति सी बनी दिखती है कि उन्हें छुआ नहीं जाएगा। यह अकारण नहीं कि खुद भाजपा की तरफ से भी उन्हें मीडिया के सामने लाने की पुरजोर कोशिश चलती रहती है। पिछले साल जब भूटान नरेश भारत आए थे,तब भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी के प्रतिनिधि के तौर पर वही उनसे मिलने गए थे।

               हिन्दुत्व आतंक के देशव्यापी फैलाव का मसला पिछले दिनों नए सिरेसे सूर्खियों में आया जब समझौता एक्स्प्रेस बम धमाके को अंजाम देने वाले एक और आतंकी कमल चौहान को राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) ने इंदौर से लगभग 35 किलोमीटर दूर देपालपुर क्षेत्र के मूरखेड़ा गांव से गिरफ्तार किया। फरवरी 2007 में समझौता एक्स्प्रेस में हुए बम धमाके में -जिसमें 68 मुख्यत: पाकिस्तानी नागरिक मारे गए थे - इस कार्यकर्ता की जांच एजेंसी को लम्बे समय से तलाश थी। पिछले दिनों पंचकुला, हरियाणा की अदालत में उसे पेश किया गया जहां उसे 10 दिन की रिमांड पर भेजा गया। गौरतलब है कि कमल चौहान की गिरतारी के बाद उसके पिता राधेश्याम ने अदालत के बाहर पत्रकारों को बताया कि वह नियमित संघ की शाखा में जाता था। देपालपुर इलाके के लोग भी इसी बात की ताईद करते मिले।

               यह अलग बात है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने उसे अपना कार्यकर्ता मानने से इन्कार कर दिया। दरअसल विगत पांच सालों में जब जब ऐसी आतंकी घटनाओं में शामिल रहे संघ प्रचारक या अन्य साधारण हिन्दू जन पकड़े गए हैं, तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रवक्ताओं की तरफ से यही बात कही जाती रही है : आरोपियों का संघ से कोई सम्बन्ध नहीं रहा है।

                   अगर इस बात को थोड़ी देर के लिए सही भी मान लें तो संघ के सामने कुछ अन्य सवाल खड़े हो जाते हैं। एक, 10 जनवरी 2011 को सुरत में आयोजित सभा में संघ सुप्रीमो मोहन भागवत ने इस बात को क्यों स्वीकारा था कि ' संघ के अन्दर अतिवादी गतिविधियों में संलग्न रहे लोग या तो छोड़ कर चले गए हैं या उन्हें जाने के लिए कहा गया है तथा उन पर आवश्यक कार्रवाई की गयी है।'क्या संघ का यह कर्तव्य नहीं बनता कि वह इस सूची को सार्वजनिक करे ताकि आए दिन उसे ही फजीहत का सामना न करना पड़े कि फलां व्यक्ति पहले संघ में था और अब नहीं है। दो, मई 2010 में जोधपुर में आयोजित संघ के पांच दिनी चिन्तन शिविर के बाद संघ की तरफ से आधिकारिक तौर पर क्यों कहा गया था कि ऐसी घटना में शामिल 'परिवार'के लोगों पर कानूनी कार्रवाई में संघ बाधक नहीं बनेगा, उनके साथ कोई रिश्ता नहीं रखेगा।

               दूसरी तरफ कमल चौहान का पत्रकारों के सामने यह दावा कि 'मैंने जो किया अपनी इच्छा से किया। मुझे कोई पछतावा नहीं है।'एक तरह से इस बात की कोशिश प्रतीत होती है कि पुलिस उससे अब और पूछताछ न करे कि करनी शूटिंग रेंज, फरीदाबाद एवं मध्य प्रदेश के एक जंगल क्षेत्र में उसने जो हथियारों की ट्रेनिंग हासिल की, मध्यप्रदेश के देवास के बागली से विस्फोटकों एव हथियारों का जो प्रशिक्षण हासिल किया, इसमें उसके साथ अन्य कौन लोग शामिल थे। उन्हें प्रशिक्षण देने के लिए कहां से लोग आए थे। इसके बारे में या उसके पैतृक संगठन के बारे में उससे कोई सवाल न करे। निश्चित ही यह बयान इस साजिश के असली मास्टरमाइंडों को बचाने का एक प्रयास जान पड़ता है।

                 याद रहे कि समझौता एक्स्प्रेस के इस आतंकी काण्ड में इसके पहले स्वामी असीमानन्द एव लोकेश शर्मा (महू) गिरफ्तार हो चुके हैं और दो अन्य आरोपी रामजी कलासांगरा, संदीप डांगे फरार चल रहे हैं जबकि एक अन्य आरोपी सुनिल जोशी की हत्या कर दी गयी है। हत्या की साजिश रचने का आरोप मालेगांव 2008बम धमाके की आरोपी प्रज्ञा ठाकुर एवं उसके सहयोगियों पर लगा है।

                अगर हम इस बम धमाके की अब तक चली जांच को देखें तो पता चलता है कि यह कोई पहली बार नहीं कि पश्चिमी मध्य प्रदेश से जुड़े, लोगों का नाम जांच एजेंसियों के सामने आया या उनकी संलिप्तता को लेकर जांच एजेंसियों को भरोसेमन्द सूत्र मिले। दरअसल धमाके के तत्काल बाद ही गवर्मेण्ट रेलवे पुलिस,हरियाणा के जांच अधिकारी इन्दौर पहुंचे थे क्योंकि उन्हें यह अहम सबूत मिला था कि समझौता एक्स्प्रेस धमाके में न विस्फोट की गयी एक सूटकेस इन्दौर के कोठारी मार्केट से खरीदी गयी थी, उन्होंने उस दुकान को भी ढूंढा था, जहां से सूटकेस खरीदी गयी थी। मगर फिर जांच ठण्डी पड़ गयी। हरियाणा पुलिस ने उस वक्त आरोप लगाया था कि 'मध्यप्रदेश पुलिस ने आवश्यक सहयोग नहीं किया।'

               कमल चौहान की गिरतारी के चन्द रोज पहले राष्ट्रीय जांच एजेंसी की तरफ से उसके लिए सबसे वांछित 28 आतंकियों की जो सूची जारी की गयी इनमें फरार चल रहे रामजी कलासांगरा, संदीप डांगे, भवेश पटेल, मफत भाई उर्फ महेश भाई, सुरेश नायर, भवेश पटेल जैसे हिन्दुत्व आतंकियों के नाम भी शामिल थें, जिनकी गिरतारी के लिए 2 लाख से 10 लाख रूपए के ईनाम भी रखे गए हैं। मालूम हो कि इन सभी के लिए 'इण्टरपोल' की तरफ से रेड कार्नर नोटिस भी जारी हो चुका है।

                राष्ट्रीय जांच एजेंसी के सूत्रों के मुताबिक कमल पटेल की गिरफ्तारी तमाम बिखरी कड़ियों को जोड़ने में एक हद तक ही सहायता प्रदान करेगी , मगर जब तक संदीप डांगे पकड़ा नहीं जाता तब तक आतंक के मास्टरमाइंडों को पकड़ना मुश्किल होगा। गृह मंत्रालय के स्त्रोतों के मुताबिक (मेल टुडे 14 फरवरी 2012) 'अभी तक पकड़े गए लोग दरअसल ऐसे लोग हैं जिन्होंने बम रखे या जो परदे के पीछे रह कर काम रहे थे'  मगर उनके लिए मास्टरमाइंड को बताना मुश्किल होगा।'

                  मई 2010 में जब अजमेर बम धमाके के सिलसिले में संघ प्रचारक देवेन्द्र गुप्ता की गिरतारी हुई तब फिर जांच आगे बढ़ी थी। जांच एजेंसियों को यह प्रमाण मिले थे कि सुनिल जोशी, लोकेश शर्मा, रामजी कलासांगरा, संदीप डांगे आदि की संलिप्तता वाले आतंकी मोडयूल ने ही 2007 में सामने आए अजमेर दर्गा बम धामाके, हैद्राबाद के मक्का मस्जिद बम धमाके, मोदासा बम धमाके आदि में हिस्सेदारी की थी। जुलाई 2010 में जब अलग अलग राज्यों की पुलिस या आतंकवाद विरोधी दस्तों को अलग करते हुए, राष्ट्रीय जांच एजेंसी ने जब सारे सूत्र हाथ में लिए , उसके बाद जांच में अधिक तेजी आयी। नवम्बर 19, 2010 को असीमानन्द उर्फ नबा सरकार की गिरफ्तारी हुई और मामला और आगे बढ़ा, जिसने दिल्ली में न्यायाधीश के सामने कलमबन्द बयान दिया कि इन आतंकी घटनाओं में कौन कौन शामिल था और कहां कहां बैठकें चलीं। उसने यह भी बताया कि इस काम के लिए फण्ड का इन्तजाम में किसका हाथ था। प्रस्तुत बयान को अदालत में सबूत के तौर पर भी पेश किया जा सकता है। यह अलग बात है कि बाद में असीमानन्द ने कहा कि उसने यह बयान 'दबाव में आकर दिया था।'

                ध्यान रहे कि भारत में हिन्दुत्व आतंक का पहला खुलासा 6 अप्रैल 2006 को नांदेड में लक्ष्मण राजकोंडवार नामक व्यक्ति के घर में रात में हुए बम विस्फोट के बाद हुआ था जिसमें उसका बेटा नरेश तथा उसका साथी हिमांशु पानसे की ठौर मौत हुई थी। इस गिरोह में शामिल पांच अन्य लोग पकड़े गए थे, जिनसे पूछताछ के बाद यह बात उजागर हुई थी कि इस घटना के पहले परभणी, प्रवरा आदि स्थानों पर 2004-2005 के दौरान जो आतंकी वारदातें हुई थीं, उसमें भी हिन्दुत्ववादी संगठनों से जुड़े इसी समूह का हाथ था। हिमांशु के घर पर छापे के बाद पुलिस के हाथ वह सबूत मिले थे, जिसने साजिश के इस हिस्से का भी खुलासा किया था कि वहां एकत्रित किए जा रहे बम नांदेड तथा आसपास के इलाके की मस्जिदों में दूसरे दिन शुक्रवार को रखे जाने थे। इलाके के मुसलमानों द्वारा पहने जानेवाली टोपी, कपड़े तथा नकली दाढ़ी भी वहां से बरामद हुई थी। उसके कुछ माह बाद महाराष्ट्र के मालेगांव में शबे बारात के दिन दूसरा बम विस्फोट हुआ था जिसमें चालीस से अधिक लोग मारे गए थे। उस वक्त भी इस घटना में हिन्दुत्व आतंकियों की संलिप्तता के सबूत मिले थे, मगर पुलिस ने पूर्वाग्रहपूर्ण जांच करके उन्हें बचा लिया और कुछ निरपराध मुसलमानों को जेल में ठूंसा था। असीमानन्द की गिरतारी एवं उसके कबूलनामे के बाद ही इन निरपराधों की रिहाई मुमकिन हो सकी थी।

                अन्त में, छपते छपते यह समाचार आया है कि हरियाणा में 2009-2010 में जिन्द एवं मेवात इलाकों में मस्जिदों, मजारों पर हुए बम धामाके के पीछे किसी 'आजाद संगठन' से जुड़े आतंकियों का हाथ था। सागर उर्फ आजाद, राजेश कुमार, शाम निवास, प्रवीण सिंह, गुरूनाम सिंह इन छह आतंकियों को पिछले दिनों पटियाला से गिरफ्तार किया गया। इनसे पूछताछ में यह भी पता चला कि इस आतंकी मोडयूल के अन्य सदस्य भी हैं जिन्होंने मस्जिदों पर बम धामाके करने में इनका साथ दिया। इन आतंकियों ने यहभी स्वीकार किया कि हरियाणा के मेवात तथा अन्य इलाको में गोशालाओं का संचालन करनेवाले कुछ स्वामियों ने उन्हें ऐसा करने के लिए उकसाया था। ('प्रोब इन्टू हरियाणा बाम्बिग्जस्...इण्डियन एक्स्प्रेस, 22 फरवरी 2012)।

? सुभाष गाताड़े