संस्करण: 27 दिसम्बर-2010  

युवा शक्ति और सोनिया गांधी का आह्वान
 

? सुनील अमर

       

        

         काँग्रेस पार्टी के 83वें अधिवेशन को सम्बोधित करते हुए पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गाँधी ने कहा है कि भले ही काँग्रेस शानदार पुरानी पार्टी हो, लेकिन उसे उम्र और अनुभव के अलावा युवा-शक्ति और जीवन के उत्साह से भरी पार्टी भी होनी चाहिए। सोनिया गाँधी ने काँग्रेस के इस महत्त्वपूर्ण अधिवेशन में युवा-शक्ति को रेखांकित कर प्रकारान्तर से अपने पुत्र और पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव राहुल गाँधी के उन प्रयासों को पार्टी की स्वीकृति प्रदान कर दी है, जिसके तहत वे पिछले कुछ समय से ज्यादा से ज्यादा युवाओं को काँग्रेस से जुड़ने का आह्वान कर रहे हैं। युवा-शक्ति को आकर्षित करने और उसे पार्टी से जोड़ने का काँग्रेस का यह अभियान निश्चित ही दूरगामी परिणाम देने वाला हो सकता है। विशेषकर उन परिस्थितियों में जिसमें आज देश की यह सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी तमाम तरह के राजनीतिक झंझावातों को झेल रही है।
          अभी गत सप्ताह दिल्ली में सम्पन्न काँग्रेस के तीन दिवसीय अधिवेशन में आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक और संगठनात्मक मुद्दों पर जिस तरह पार्टीजनों और वरिष्ठ नेताओं में बहसें हुईं, उससे यह आभास हुआ है कि इस समय यह पार्टी एक बार फिर पूरे देश में अपने को स्थापित करने की विकट जद्दो-जहद में है। बिहार के काँग्रेसियों ने वहाँ के हालिया विधान सभा चुनाव में काँग्रेस की पराजय पर जिस प्रकार से अपना प्रतिरोध दर्ज कराया वह आम कॉग्रेसियों की व्यथा और बेचैनी को प्रकट करता है। ऐसी स्थिति में पार्टी प्रमुख सोनिया गाँधी ने दो महत्वपूर्ण कारक पार्टी में कार्यकर्ताओं की बात को बड़े नेताओं व मंत्रियों द्वारा अवश्य ही सुना जाय तथा पार्टी में युवा शक्ति को न सिर्फ तरज़ीह दिया जाय बल्कि ज्यादा से ज्यादा उन्हें जोड़ने का उपक्रम भी किया जाय, पर जोर देकर एक नयी दिशा तय कर दी है।
          युवा-शक्ति को काँग्रेस से अधिकाधिक जोड़ने को लेकर राहुल गाँधी पिछले कुछ वर्षों से सक्रिय हैं। राहुल की गंभीरता का अनुमान इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि उनकी सक्रियता के चलते ही अभी पिछले महीने केन्द्रीय विश्वविद्यालयों में छात्र-संघ चुनाव की प्रक्रिया को बहाल किया गया है, जबकि राज्य के विश्वविद्यालयों में छात्र-संघ चुनाव का निलम्बन आज भी एक गंभीर मुद्दा बना हुआ है। इस पहल का नतीजा यह होने वाला है कि अब राज्यों को भी देर-सबेर छात्र-संघ चुनाव बहाल करने ही होंगें। दरअसल, छात्र संघ चुनावों में व्याप्त हो गये भ्रष्टाचारों को दूर करने के लिए अध्ययन कर सुझाव देने हेतु सर्वोच्च न्यायालय के आदेश पर मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने जनवरी 2006 को पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त जे.एम. लिंगदोह की अध्यक्षता में एक समिति गठित की थी जिसने 23 मई 2006 को 83 पृष्ठीय अपनी रिपोर्ट सौंपी थी और इसकी अनुषंशाओं को लागू करने को लेकर देष के सभी विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों में यह चुनाव ही स्थगित कर दिये गये हैं। इससे स्वाभाविक ही छात्रों में बहुत रोष है। यह ध्यान देने योग्य तथ्य है कि महाविद्यालयों के छात्र युवा मतदाता होते हैं।
         विश्व के किसी भी देश के मुकाबले भारत में सबसे ज्यादा युवा-शक्ति है। यह वह पूँजी है जिससे किसी भी कार्य को किया जा सकता है। दुनिया में जितनी भी क्रांतियाँ हुई हैं, वे सभी युवा-शक्ति से ही हुई हैं। देश के कई सेक्टर में हुए तीव्र गति विकास में इन्हीं युवाओं का योगदान है। ऐसे में सोनिया-राहुल ने अगर इस युवा-शक्ति को कॉग्रेस से जोड़ने की रणनीति बनाई है, तो इस पर अमल निश्चय ही पार्टी को विस्तार और मजबूती प्रदान कर सकता है। हालाँकि एक दूसरे मुद्दे की तरफ इशारा करके सोनिया गाँधी ने यह साफ कर दिया है कि इसकी राह में अड़चनें बड़े नेताओं और मंत्रियों की तरफ से ही आती हैं। देश में प्रमुख विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी के अलावा और भी जितने राजनीतिक दल हैं, उन सबके मुकाबले कॉग्रेस में न सिर्फ युवा नेता सबसे ज्यादा हैं, बल्कि केन्द्र सरकार में युवा मंत्री भी इस वक्त बड़ी संख्या में हैं। पूर्व लोक सभाध्यक्ष पी.ए. संगमा की पुत्री अगाथा संगमा को केन्द्रीय मंत्री बनने से तो सबसे कम उम्र युवा के मंत्री बनने का रिकार्ड ही कायम हो गया है!
         राहुल गाँधी युवाओं में लोकप्रिय हैं। पिछले तीन-चार वर्षों से वे जिस भी क्षेत्र में अपने भ्रमण कार्यक्रम पर जाते हैं, वहाँ वे युवाओं से अवश्य ही मिलते हैं। इसके अलावा उन्होंने पार्टी के संगठनात्मक चुनाव कराने में युवक काँग्रेस व एन.एस.यू.आई. का इस्तेमाल कर उक्त संदेश को दोहराया ही है। सोनिया गाँधी का युवा-शक्ति का आह्वान उन किशोरों व नौजवानों से है, जो अपनी शिक्षा-दीक्षा पूरी कर अपनी जिम्मेदारियाँ संभालने या अपनी पारी खेलने समाज के मैदान में उतरने ही वाले होते हैं। यह एक स्थापित सत्य है कि देश व समाज के लिए कुछ कर गुजरने का जज्बा नौजवानों में ही होता है। आखिर बीते दिनों में हमने देखा ही है कि चाहे वह स्वर्णिम चतुर्भुज सड़क योजना में बिहार में व्याप्त भ्रष्टाचार का विरोध व खुलासा करने वाले स्व.सत्येन्द्र दूबे रहे हों, या इंडियन ऑयल में हो रही धांधली का पर्दाफाश करने वाले स्व. मजुनाथ, ये दोनों अपनी शिक्षा पूरी कर कर्मक्षेत्र में ताजा-ताजा उतरे नौजवान ही थे। उन्हें अच्छी तरह पता था कि जिन लोगों के खिलाफ उन्होंने लड़ाई छेड़ रखी है, वे अपराधी तथा शासन-सत्ता में पहुँच रखने वाले हैं तथा उन्हें क्षति भी पहुंचा सकते हैं, फिर भी वे अपने आदर्र्श व सिध्दान्तों से नहीं डिगे। बदले में उन्हें अपनी जान देकर इसकी कीमत चुकानी पड़ी। राहुल गाँधी के पिता स्व. राजीव गाँधी, देश के पहले सबसे युवा प्रधानमंत्री थे और उन्होंने नौजवानों की एक पूरी टीम को ही उस वक्त सत्ता संभालने में उतारा था, जिनमें से कई आज भी सक्रिय हैं। राजीव गाँधी ने अपने समय में न सिर्फ युवाओं को आकर्र्षित किया था, बल्कि उस वक्त वे उनके रोल मॉडल भी थे। तमाम नौजवानों ने उनकी वेष-भूषा तक अपनाया था। वे असमय काल-कवलित हुए, अन्यथा देश की लयबध्द हो चुकी राजनीति को उन्होंने नये तौर-तरीकों से चलाना शुरू किया था। अपने मित्र और तकनीशियन सैम पित्रोदा के सहयोग से उन्होंने जो संचार क्रांति शुरु की थी, आज वह अपने विराट रुप में देश में मौजूद है, और भारत आज विश्व में सबसे तेजी से संचार क्षेत्र में आगे बढ़ने वाला देश बन गया है। केन्द्र की संप्रग सरकार ने अपने दोनों कार्यकाल में युवाओं के लिए कई योजनाऐं चलाई हैं। इसमें शिक्षा में सुधार, रेल-यात्रा, शिक्षा ऋण, स्वास्थ्य, रोजगार के अवसर तथा रोजगार में स्थिरता के कई उपक्रम शामिल हैं। अल्पसंख्यक युवाओं के लिए भी संप्रग सरकार ने कल्याणकारी योजनाऐं चलाई हैं। दरअसल, आवश्यकता इस बात की है कि उक्त योजनां को न सिर्फ बेहतर ढ़ंग से क्रियान्'वित किया जाय, बल्कि युवकों की ठोस भागीदारी भी इसमें निधर्रित हो, ताकि उन्हें अपनी उपयोगिता भी महसूस हो सके। सोनिया और राहुल का युवाओं को जोड़ने का यह अभियान अगर परवान चढ़ा तो यह 'बूढ़ी' कही जाने वाली पार्टी को निश्चित ही युवा कर देगा।
 

 

? सुनील अमर