संस्करण:  27 दिसम्बर-2010  

किसान आंदोलन से उठे सवाल

 ? महेश बाग़ी

  

                   

           

               किसानों ने दो दिनों तक राजधानी को बंधाक बनाए रखा। छात्रों-मरीजों से लेकर आम जनता भी हलाकान हो गईं। ऐसा लगा मानो शासन-प्रशासन नाम का कोई तंत्र ही नहीं है। अंतत: सरकार को किसानों के आगे घुटने टेकना पड़े और उनकी सभी प्रमुख मांगे मान ली गईं। इस समूचे घटनाक्रम ने कुछ ऐसे सवाल खड़े कर दिए हैं, जो सरकार की विश्वसनीयता पर ही प्रश्नचिन्ह लगाते हैं। सबसे अहम सवाल यह है कि जब भारतीय किसान संघ छह-छह बार ज्ञापन देकर अपनी मांगे पूरी करने का आग्रह कर रहा था, तब सरकार ने उस पर धयान क्यों नहीं दिया ? दूसरा अहम सवाल यह है कि जब संघ ने जिला प्रशासन से प्रदर्शन करने की बाक़ायदा अनुमति ली थी, तो प्रशासन ने कोई व्यवस्था क्यों नहीं की ? 9 दिसंबर की रात से ही किसान टेरक्टर ट्रालियों में आने लगे थे, तब इंटेलीजेंस विभाग क्या कर रहा था ? सरकार की खुफ़िया एजेंसी के जब राजधानी में यह हाल हैं, तो उससे प्रदेशभर की निगरानी की उम्मीद कैसे की जा सकती है ? क्या यह प्रशासन तंत्र की विफलता का प्रमाण नहीं है ?
        यह स्थिति उस प्रदेश में आई, जिसका मुखिया खुद को किसान का बेटा कहता है। इस बेटे ने किसानों के कल्याण के नाम पर एक नहीं चार-चार कार्यक्रम आयोजित कर सरकारी धन फूंका। हर आयोजन में किसानों के लिए लच्छेदार भाषण के साथ लुभावनी घोषणाएं भी की गईं, किंतु उनमें से एक पर भी अमल नहीं किया गया। सवाल यह है कि जब सरकार कुछ कर सकने में अक्षम है तो ऐसे कार्यक्रमों की नौटंकी करने की क्या ज़रूरत है। गत विधानसभा चुनाव में भाजपा ने अपने घोषणापत्र में किसानों को सस्ती ब्याज़ दर पर कर्ज उपलब्ध कराने का वादा किया था, किंतु चुनाव जीतते ही सरकार इस घोषणा पर अमल करने से मुकर गई। क्या यह किसानों से धोखाधाड़ी नहीं है ?
       आज किसान चारों ओर परेशानियों से जूझ रहे हैं। बाजार में घटिया बीज मिल रहे हैं, जो पर्याप्त उपज नहीं देते हैं। इल्ली-कीटों का हमला हो तो किसान कीटनाशक दवाओं का इस्तेमाल करता है, लेकिन हज़ारों रुपए ख़र्च करने के बाद उसे पता चलता है कि दवाएं नकली थीं। हालांकि कृषि विभाग ने घटिया बीज और नकली दवाओं की धरपकड़ के लिए दस्ते गठित कर रखे हैं, किंतु वे अपने दायित्व के विपरीत चौथ वसूली करने में ही लगे हुए हैं। इसका खामियाज़ा किसानों को भुगतना पड़ रहा है। कर्ज पर कर्ज़ लेने के बाद जब वे अपनी उपज लेकर मंडी पहुंचते हैं तो वहां मंडीकर्मियों और व्यापारियों का गठजोड़ उनका शोषण करता है। किसानों को अपनी उपज औने-पोने दाम में बेचने को विवश किया जाता है। अपनी दिन-रात की कड़ी मेहनत के बाद भी जब किसान को अपेक्षित लाभ नहीं मिलता है और कर्ज़ का बोझ उसे सताने लगता है, तो उसके सामने एक ही रास्ता बचता है-आत्महत्या। राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो की रिपोर्ट के अनुसार मध्यप्रदेश में रोज़ाना चार किसान आत्महत्या कर रहे हैं। बीते छह सालों में आठ हज़ार से अधिक किसान आत्महत्या कर चुके हैं। इसके बावजूद सरकार ने उनकी सुध लेने की कोई कोशिश करने की बजाय उन्हें झूठे आश्वासन ही दिए हैं। इसी कारण किसानों का आक्रोश फट पड़ा और राजधानी हलाकान हो गई।
    ख़ास बात यह है कि किसानों का यह प्रदर्शन विपक्ष द्वारा नहीं किया गया, बल्कि भाजपा जिस राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की इकाई है, उसी संघ की एक इकाई भारतीय किसान संघ द्वारा किया गया था। हालांकि यह भी सच है कि इस आंदोलन में शरीक सभी किसान भाजपा समर्थित नहीं थे। सरकार की नाकामियों से खफ़ा किसानों को कोई बैनर चाहिए था, जो संघ ने उपलब्ध करवा दिया और किसान उसमें शरीक हो गए। सवाल यह है कि संघ की ही एक इकाई को अपनी ही सरकार के खिलाफ़ सड़कों पर क्यों उतरना पड़ा ? इसका सीधा-सा जवाब है सरकार की वादाखिलाफ़ी। किसानों की सबसे बड़ी समस्या है बिजली। उन्हें चार-छह घंटे भी बिजली नहीं मिल पाती है। भोपाल में प्रदर्शन के लिए जमा किसान नेताओं का आक्रोश उस वक्त फट पड़ा, जब उन्होंने देखा कि राजधानी में रात के समय भी होर्डिंग्स पर बिजली दमक रही थी। एक किसान नेता ने तो कहा था कि हमारे बच्चों को पढ़ने के लिए बिजली नसीब नहीं है और यहां होर्डिंग जगमगा रहे हैं।
      बहरहाल, अब सरकार ने किसानों की पचास मांगों को पूरा करने पर सहमति जताई है, लेकिन अहम सवाल यह है कि बिजली की आपूर्ति कैसे होगी ? प्रदेश में विद्युत उत्पादन की स्थिति अच्छी नहीं है और बिजली कंपनियों को भ्रष्टाचार का रोग लग गया है। ऐसे में सरकार किसानों की अपेक्षाओं पर खरी उतर सकेगी, इसमें संदेह है। ज़ाहिर है कि निबट भविष्य में किसान खुद को फिर ठगा महसूस करेंगे और आंदोलन को मजबूर होंगे। यदि ऐसा होता है तो यह ना सिर्फ शिवराज सरकार बल्कि भाजपा के लिए भी घातक होगा।

 

 

? महेश बाग़ी