संस्करण: 27 दिसम्बर-2010  

शब्दों के अर्थ न बदले मीडिया

 ? दिव्या शर्मा

           

          हाल ही में मीडिया ने कांग्रेस महासचिव श्री दिग्विजय सिंह के हेमंत करकरे संबन्धी बयान को समाचार की तरह जस का तस जनता तक पंहुचाने की बजाय संपादकीय और समाचार विश्लेषण के माध्यम से जनता को भ्रमित करने का जो कार्य किया है वह प्रेस की आजादी का दुरूपयोग प्रतीत होता है। मेरी नजर में जूलियन असांज ऐसे भारतीय मीडिया की तुलना में ज्यादा सम्मान के पात्र है जिन्होने अपनी वेबसाइट विकीलीक्स के माध्यम से लाखों गुप्त सूचनाओं को बिना किसी विश्लेषण के ज्यों का त्यों अपनी वेबसाइट विकीलीक्स पर डाल दिया और उन सूचनाओं ने न सिर्फ अमेरिका बल्कि दुनिया के कई ताकतवर देशों को हिलाकर रख दिया। यह जूलियन असांज का पेशा है और उसने अपने पेशे में नैतिकता को प्राथमिकता देकर उसके साथ न्याय किया। असांज सरकारों को ब्लेकमेल कर कई मिलियन डॉलर आसानी से प्राप्त कर सकता था और वह भारतीय मीडिया के ऐसे तत्वों की तरह अमेरिका में अपनी कार्पोरेट कंपनियॉ/मॉल्स और कई होटल्स खोल लेता और इन्हे न्यूयॉर्क स्टॉक एक्सचेंज में सूचीबध्द करवा लेता, लेकिन उसने जेल जाना ज्यादा बेहतर समझा। व्यवसाय में नैतिकता सदैव सम्मानजनक रही है।
              कांग्रेस महासचिव द्वारा हेमंत करकरे संबन्धी बयान के तथ्यों तथा उसके प्रभावों का विश्लेषण और विपक्षी दलों की चिन्ता पर भी विचार कर लेते है। दिग्विजय सिंह पर आरोप है कि उन्होने 2 साल बाद यह कहकर कि उनकी मुंबई हमले से चंद घंटों पूर्व ए.टी.एस. प्रमुख हेमंत करकरे से फोन पर बात हुई थी तथा श्री करकरे ने उन्हे हिन्दू चरमपंथियों से खतरा होने की बात कही थी, श्री करकरे की शहादत पर प्रश्नचिन्ह लगाया है, मुंबई हमलों के गुनहगारों का बचाव किया है तथा जब सरकार पाकिस्तानी आतंक के विरूध्द अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर वातावरण बना रही है उसको धक्का पंहुचाया है। आर.एस.एस. के विरूध्द बयान देकर राष्ट्रद्रोह का काम किया है तथा करोड़ों हिन्दुओं को अपमानित किया है।
              हम बात की शुरूआत पहले आरोप से ही करते है कि उन्होने 2 साल बाद यह बात क्यों कही। वास्तविकता यह है कि मुंबई हमलों के पूर्व श्री दिग्विजय सिंह की श्री करकरे से हुई बात का उन्होने कई बार जिक्र किया था। दिनांक 28.12.2008 को इन्दौर प्रेस क्लब में श्री सिंह ने पत्रकारों से यह बात स्पष्ट रूप से कही थी जो समाचार पत्रों में प्रमुखता से प्रकाशित भी हुई थी। उनका यह वक्तव्य घटना के 1 माह बाद ही सार्वजनिक हो गया था। उस वक्त यदि मीडिया ने इसे आज की भॉति उठाया होता तो ज्यादा अच्छा होता क्योंकि तब बातचीत के रिकार्ड भी आसानी से उपलब्ध हो सकते थे। यह सर्वविदित है कि श्री हेमंत करकरे मालेगाँव ब्लास्ट की जाँच कर रहे थे जिसमें हिन्दू चरमपंथियों का हाथ था और पुलिस ने इस मामले में कई लोगों को पकड़ा था जो आर.एस.एस. से जुड़े पाये गये थे। यह भी सभी जानते है कि जब मालेगाँव की घटना में आर.एस.एस. से जुड़े लोगों को पकड़ा गया तो संघ एवं संघ से प्रत्यक्ष एवं परोक्ष रूप से जुड़े व्यक्ति बुरी तरह बौखला गये तथा उन्होने ऐन-केन प्रकारेण ए.टी.एस. प्रमुख पर दबाव बनाना प्रारंभ कर दिया। यह एक महज संयोग ही था कि श्री करकरे ने जिस दिन श्री सिंह से फोन पर यह बात की उससे कुछ घंटों के बाद ही वे शहीद हो गये। श्री करकरे को हिन्दू कट्टरपंथी व्यक्तियों से धमकियॉ मिल रही थी, इस तथ्य के श्री सिंह द्वारा बताने पर यह तात्पर्य कैसे लगाया जा सकता है कि श्री सिंह ने हिन्दू आतंकवादियों द्वारा श्री करकरे की हत्या किये जाने का कथन दिया है।
             जहॉ तक बात श्री करकरे की शहादत पर प्रश्नचिन्ह लगाने का है तो यह बात भी उचित प्रतीत नही होती। इसमें कोई भी शक नही है कि वे पाकिस्तानी आतंकियों की गोली का शिकार हुये। चूकि वे देश को स्थिरता और शांति देने के महान कार्य में संलग्न थे, यदि वे देश के अंदर की चरमपंथी ताकतों की हिंसा के शिकार होते तो भी इससे उनकी शहादत कम नही हो जाती। जहॉ तक श्रीमती करकरे को ठेस पंहुचने की बात है तो यह कहना ज्यादा तर्कसंगत होगा कि या तो वे इस तथ्य को समझ नही सकी या फिर जिन लोगों ने उन्हे यह बयान देने को प्रेरित किया उन्होने श्री दिग्विजय सिंह के वक्तव्य को अलग अर्थ देकर अपना स्वार्थ सिध्द किया।
            श्री दिग्विजय सिंह पर उक्त बयान देकर विदेशी आतंक के विरूध्द भारत सरकार द्वारा बनाये गये वातावरण को नुकसान पंहुचाने तथा आतंकियों का पक्ष मजबूत करने के आरोप का भी कोई आधार नही दिखता। श्री सिंह सदैव शांति और विकास के पैरोकार रहे है और उनके इस बयान से कि श्री करकरे को हिन्दू चरमपंथियों से खतरा था, इसका आशय यह नही कि उन्होने पाकिस्तान समर्थित आतंकवाद का समर्थन किया है या आतंक के विरूध्द भारत की लड़ाई को कमजोर किया है। अभी तक श्री दिग्विजय सिंह के किसी भी वक्तव्य से यह नही लगता है कि उन्होने कभी भी 26 नवंबर की घटना में पाकिस्तानी आतंकवादियों का हाथ होने पर कोई संदेह किया है। यह सही है कि श्री दिग्विजय सिंह समय-समय पर आर.एस.एस. तथा उसके जैसे अन्य कट्टरपंथी संगठनों को अपने निशाने पर लेते रहे है। वे कट्टरपंथी ताकतों के सदैव विरोधी रहे है चाहे वह बहुसंख्यक कट्टपंथ हो या अल्पसंख्यक। अजमेर ब्लास्ट, मालेगाँव ब्लास्ट और मक्का मस्जिद के धमाकों के बाद यह किसी से नही छुपा हुआ है कि उन साजिशों के पीछे हिन्दू कट्टरपंथियों का ही हाथ था। जब कट्टरपंथी ताकतों ने देश के वातावरण को साम्प्रदायिकता का रंग देना प्रारंभ किया तो उसके विरोध में खुलकर सामने आने वाले दिग्विजय सिंह उनकी ऑंखों में खटकने लगे। यह विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि दिग्विजय सिंह की आजमगढ़ यात्रा के दौरान आर. एस.एस. और मुस्लिम उलेमाओं दोनों ने ही उनका विरोध किया था। यदि उन्होने आर.एस.एस. द्वारा राष्ट्रवाद के नाम पर कट्टरपंथ को बढ़ावा देने और दूसरे सम्प्रदाय की भावनाओं को सदैव आहत करने के प्रयास का विरोध किया तो उन्हे इन ताकतों द्वारा राष्ट्रद्रोही की संज्ञा दी जाने लगी।
          क्या इसका आशय यह नही है कि जो व्यक्ति आर.एस.एस. के साथ है वह राष्ट्रवादी है और जो आर.एस.एस. के साथ नही है वह राष्ट्रद्रोही है? यह ठीक उसी प्रकार है जिस तरह से जर्मनी में हिटलर ने उन सभी लोगों को राष्ट्रवादी कहा जो उसकी नाजी पार्टी के समर्थक थे तथा उन लोगों को राष्ट्रद्रोही करार देकर उनकी हत्या कर दी गई जो नाजी पार्टी के विचारों से सहमत नही थे। क्या भारत में भी हम ऐसा ही नाजीवाद स्वीकार कर सकते है? जो व्यक्ति आर.एस.एस. के समर्थक नही है क्या ऐसा हर व्यक्ति देशद्रोही हैं ? संघ की यह फिलासफी देश को बाँटने का कार्य कर रही है और दिग्विजय सिंह राष्ट्रवाद के नाम पर देश में ऐसे नाजीवाद के विरोधी दिखते हैं।

 

 

? दिव्या शर्मा