संस्करण: 27अक्टूबर-2008

मंदी की चपेट में दुनिया

इतिहास की पुनरावृत्ति

 

डॉ. राजश्री रावत 'राज'

मरीका इस समय गंभीर आर्थिक संकट से गुजर रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव तक इस संकट के हल होने के आसार कम हैं। अमरीका से शुरू हुए मंदी के दौर ने सितम्बर में आगे बढ़कर अपना निशाना बनाया युरोप को। ब्रिटेन के बड़े बैंको को राष्ट्रीयकरण हुआ। न्यूजीलैंड, आयरलैंड और सिंगापुर को मंदी को स्वीकार कर चुके है। अब तो दुनिया की नंबर दो और तीन नंबर अर्थव्यवस्था जापान और जर्मनी ने भी स्वीकार कर लिया है कि डाउनफाल शुरू हो गया है।

वैश्विक आर्थिक संकट की चपेट में आ चुके पश्चिमी देशों के लोगों को अब नौकरी टूटने का खतरा नज़र आ रहा है। हालांकि उन देशों में नेताओं ने यह आश्वासन दिया है कि नौकरियों तथा आर्थिक स्थिरता को बढ़ावा देने के लिए वे हर संभव कदम उठायेंगे।

राष्ट्रपति बुश की नीतियों का परिणाम अमेरिका एवं विश्व के अन्य देश भुगत रहे हैं। वैश्विक अर्थव्यवस्था की वजह से भारत भी चपेट में आ गया है। भारतीय शेयर बाज़ार में विश्वास की कमी पैदा हो गई है जिसे लौटाने में न तो सरकार सक्षम है और न ही इलेक्ट्रॉनिक मीडिया या प्रिंट मीडिया। इस आर्थिक मंदी के पूर्व शेयर बाज़ार बहुत तेज़ी पर था तथा निवेशकों मे हर तरह के शेयर खरीदने की होड़ लगी हुई थी। शेयर बाज़ार में मौजूद-इस तेज़ी के कारण निवेशकों ने अपनी जेब के साथ-साथ उधार लेकर भी छोटे-बड़े शेयरों में अपना पैसा लगा डाला। ज्यादा से ज्यादा पैसा शेयरों में लग जाने से मुद्रा संकुचन या मुद्रा की कमी की स्थिति बन गई। पैसा वापस पाने के लिए तेज़ी से शेयरों की बिक्री भी प्रारम्भ हो गई। इस जोरदारी बिकवाली से शेयरों के दामों में गिरावट आई जिसने निवेशकों में घबराहट पैदा कर दी।

दूसरी ओर बैंकों और वित्तीय संस्थानों में आया संकट उनके स्वयं की नीतियों में गलतियाँ और उचित लेखा प्रणाली का पालन नहीं करने से आया। सामान्य ऋण प्रक्रिया के तहत बैंक या वित्तीय संस्थान आमदनी की पुष्टि के दस्तावेज़ मांगते हैं, किश्त चुकाने की क्षमता देखते है। पुरानी उधारियों का इतिहास देखा जाता है। परन्तु प्रतिस्पर्धा के प्रभाव में आकर बैंकों के शेयरों के भाव धाड़ाधाड़ गिरते गये। ऋण देने वाले बैंक असुरक्षित हो गए।

दुनियाभर में मचे हाहाकार ने कई राष्ट्राधयक्षों, उद्योगपतियों व आम जनता की नींद उड़ा दी है। कहा जाता है कि इतिहास अपने आप को दुहराता है। यह सच्चाई बनकर इस समय सन् 2008 में सामने आया। सन् 1929 में प्रथम विश्वयुध्द के बाद भी इसी तरह का भयावह वित्तीय संकट आया था। इस संकट का कारण भी बाज़ार की बढ़ी हुई तरलता ही थी। युध्द के बाद इस प्रकार का संकट का सामना करने लायक कोई भी नहीं था। अमरीकी अर्थ व्यवस्था में गिरावट उस समय भी सबसे पहले आई थी। अमरीकी सरकार ने उस संकट ने बचाव के लिए कुछ प्रयास किये थे जिसने स्थिति को सुधारने के बजाय और अधिक बिगाड़ दिया। इस मंदी के पहले भी (एक दशक पहले) हाउसिंग और मॉर्टगेज के क्षेत्र में जबर्दस्त तेज़ी का दौर दिखाई दिया था। बैंकों और वित्तीय संस्थानों के खजानों में भरपूर पैसा था जिसे भविष्य में आने वाली समस्याओं, जोखिम और बिना सुरक्षा की नीतियों को ध्यान में रखे जोर-शोर से ऋण के रूप में बांटा गया। औपचारिकता के लिए क्रेडिट स्वेप का इस्तेमाल किया गया। अंतत: परिणाम बाजार में बहुत अधिाक तरलता आ गई। बैंकों की आमदनी और लाभों को कृत्रिम रूप से बढ़ा दिया। जिससे बैंकों की वित्तीय स्थिति और प्रबंधान क्षमता पर सवालिया निशान लगने शुरू हो गए और ग्राहकों का विश्वास डगमगा गया। वैश्विक मंदी के इस दौर के बीच सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों पर 1 लाख 45000 करोड़ रुपए की बारिश करने के बाद रिजर्व बैंक ने अपनी मुख्य अल्पकालीन ब्याज दर (रेपो) में एक प्रतिशत की कटौती करते हुए सस्ते होम लोन, कंज्यूमर, कारपोरेट और पर्सनल लोन का रास्ता साफ कर दिया।

                               इस कटौती के बाद रिजर्व बैंक अन्य बैंकों को 9% के बजाय 8 % की दर अल्पकालीन ऋण उपलब्ध करायेगा। सरकारी क्षेत्र के बैंकों ने इस निर्णय का स्वागत किया है। इस क़दम से बैंकों की लड़खड़ाती स्थितियों को संबल मिलेगा। विकास प्रक्रिया को बढ़ावा मिलेगा, तथा निवेशकों की रूचि बनी रहेगी। सब मिलाकर आर्थिक वृध्दि के लिहाज से यह अच्छा कदम है। इन प्रयासों को देखते हुए प्रधानमंत्री जी के बयान कि यह दौर चन्द दिनों का मेहमान है, मंदी का तात्कालिक दौर शीघ्र ही समाप्त होगा सच साबित होगा। यह विश्वास ने दिखा दिया गया कि बाजार पुन: संभलने की राह पर जा रहा है।

इतिहास में 1929 में हुई वैश्विक मंदी भी इसी तरह संभल कर उठ खड़ी हुई थी। पर इस बार की आर्थिक मंदी के बाद भारत विश्व की नं. एक शक्ति बन कर उभरेगा यह विश्वास बार-बार करने का मन चाहता है।

 

डॉ. राजश्री रावत 'राज'