संस्करण: 27अक्टूबर-2008

आर्थिक मंदी के लाभ

 

प्रमोद भार्गव

म नागरिक किसान और मजदूर को मौजूदा आर्थिक मंदी से चिंतित होने की जरूरत नहीं है। सरकार यदि इस मंदी के चलते डूबने वाली कंपनियों को उबारे जाने वाले उपयों के तहत करोड़ों -अरबों रूपयों के राहत पैकेज नहीं देती है तो बहुसंख्यक आबादी के हित इन कंपनियों के डूबने में ही निहित है। क्योंकि ये कंपनियां  निजी पूंजी और कंपनियों को हो रहे मुनाफे पर इतराने की बजाय राष्ट्रीयकृत बैंकों से ऋण पर उठाये धन, शेयरों के जरिये आम जनता द्वारा किए गए पूंजी निवेश और बाजारबाद की देन आवारा धन पर इतरा रही थीं। खोल में पोल की इस हकीकत के उजागर होने का सिलसिला अब शुरू हुआ है, इसलिए इन कंपनियों का डूबना ही देश व जनता के हित में है।

       जिस जेट ऐअरवेज ने घाटे के बहाने के चलते उन्नीस सौ कर्मचारियों को निकाले जाने की शुरूआत आठ सौ कर्मचारियों की बर्खास्तगी के साथ की थी, ऐन दीवाली के वक्त यह नाटक एक सोची समझी योजना थी, जिसके क्रियान्वयन में कंपनी कामयाब रही। दरअसल जेट एअरवेज पर सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी इंडियन ऑयल द्वारा दिए ईंधान के देयकों के 259 करोड़ रूपये अर्से से बकाया चले आ रहे हैं। कुछ समय पूर्व एक समझौते के तहत साठ दिन के भीतर इस धन राशि को चुका देने का वादा नरेश गोयल ने इंडियन ऑयल के अध्यक्ष सार्थक बेहुरिया से किया भी था, लेकिन धन चुकाया नहीं गया। इस रहस्य का खुलासा खुद पेट्रोलियम मंत्री मुरली देवड़ा ने किया। देवड़ा ने कई मर्तबा नरेश गोयल की मदद करने की दलील भी दी।

       इंडियन ऑयल का दबाव धान वसूली के लिए जेट पर बढ़ा तो कंपनी ने प्रोबेशनरी और प्रशिक्षु आठ सौ कर्मचारियों को एक साथ बर्खास्त कर दिया। हडकंप मचना लाजिमी था। मचा भी। पांच राज्यों में               विधानसभा चुनाव की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है और अगले साल आम चुनाव हैं। इसलिए केन्द्र में सत्तारूढ़ कांग्रेस और उसके घटक दलों के हाथ पैर फूलना स्वभाविक थे। लिहाजा रातों रात फौरी उपाय तलाशे गए। इंडियन ऑयल का दबाव कम हुआ और छंटनी की कार्यवाई फिलहाल टाल दी गई। अब यहां सवाल यह उठता है कि 259 करोड़ रूपये की इस देनदारी का क्या हुआ ? यदि यह राशि जेट से नहीं वसूली गई तो डीजल- पेट्रोल के दाम बढ़ाकर इस रकम की भरपाई आम जनता से ही की जाएगी ? जब कंपनी घाटे में है, विमानों को ग्राहक नहीं मिल रहे हैं तो ईंधन फूंकने की जरूरत ही क्या है ? क्या यह संसाधन और धान का दुरूपयोग नहीं है ? प्राकृतिक संपदा और सरकारी संपत्ती को इस तरह से डुबोना ही मंहगाई के बड़े कारण बनते हैं। आखिर में जिसकी मार जनता पर पड़ती है ?

       जेट एअरवेज के डूबने का खुलासा होने के बाद अब एअर इंडिया की बारी है। वित्तीय संकट का सामना कर रहे विमानन उद्योग में सार्वजनिक क्षेत्र की एअर इंडिया ने 15 हजार कर्मचारियों को तीन से पांच साल के लिए वेतनरहित अवकाश (लीव विद आउट पे) पर भेजने की योजना बना ली है। अन्यथा बद्तर हालातों से उबरने के दृष्टिगत  सरकार 4750 करोड़ रूपये का राहत पैकेज विमानन उद्योग में लगी कंपनियों को दे।

       दरअसल विमानन कंपनियां हों या अन्य कंपनियां एक डेढ़ दशक के भीतर इन कंपनियों में आर्थिक समृध्दि का जो उछाल देखा गया वह सरकारी धान व संसाधानों की अंधाधुंध लूट और पूंजी निवेश के बहाने आम जनता से ही उगाहा गया था। समृध्दि के इस उछाल को महिमामंडित करने में प्रबंधान-कौशल की कुटिल भागीदारी भी रही। मीडिया ने भी हकीकत पर पर्दा डाले रखा। लेकिन वास्तविकता को तो एक न एक दिन धारातल पर आकर उछाल के इस बुलबुले को फोड़ना ही था, सो फूट गया। अब विमानन कंपनियां अपनी इस बदहाली के लिए र्इंधान की बढ़ती कीमतों को दोषी ठहराते हुए तेल के मूल्य में कमी व करों में छूट की तत्काल मदद चाहती हैं। 4750 करोड़ रूपये के राहत पैकेज की मांग तो लंबित है ही। इसी साल अगस्त में 16 फीसदी और सितंबर में पांच फीसदी एअर टरबाईन फ्यूल (एटीएफ) की कीमतें घटाई जा चुकी हैं। इन कंपनियों का कारण विश्व बाजार में लगातार बढ़ती तेल कीमतों की बजाय एक तो इनकी नीतियां फिजूलखर्ची और नेताओं के प्रति कृतज्ञता जताने की भावना है, दूसरे उड़ानों में मांग से ज्यादा आपूर्ति है।

       यहां मैं नेताओं के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने के सिलसिले में एक उदाहरण देना चाहूंगा। 2005 में डेक्कन एअरवेज ने दिल्ली-ग्वालियर-भोपाल के लिए नई उड़ान सेवा शुरू की थी। यह सेवा वर्तमान में संचार एवं प्रौद्योगिकी मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया के प्रयास से शुरू की गई थी। सिंधिाया ने ग्वलियर अंचल के प्रमुख पत्रकारों को हवाई उड़ान का मुफ्त में आनंद दिलाने के नजरिये से ग्वालियर से भोपाल तक की कई उड़ाने भरवाईं। इस लेख का लेखक भी इस उड़ान में शामिल था। परस्पर उपकृत करने के सिलसिले में यह फिजूलखर्ची नहीं तो और क्या है ? अब डेक्कन एअरवेज लगभग डूब चुकी है। गोया कंपनियों के डूबने के कारणों में विश्व बाजार में आई आर्थिक मंदी एक कारण हो सकता है लेकिन इससे भी प्रमुख कारण फिजूलखर्ची और आवश्यकता से अधिक कर्मचारियों की भर्ती रहा है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है।

       यहां गौरतलब यह भी है कि वाणिज्यिक अखबार, आर्थिक सुधारों के पैरोकार और कार्पोरेट जगत का एक बड़ा गुट विमानन कंपनियों को घाटे से उबारने के लिए तो बड़े से बड़े राहत पैकेज की वकालात कर रहा है। लेकिन जब यही पैकेज गलत आर्थिक नीतियों के कारण आत्महत्या कर रहे किसानों को कर्ज से उबारने के लिए दिया जा रहा था तो इसकी उक्त कार्पोरेट जगत के रहनुमा मुखर आलोचना कर रहे थे। यहां तक की बैंकों के दिवालिया हो जाने तक का दावा किया गया था। जबकि बड़े कॉरपोरेट समूहों और औद्योगिक घरानों का बाकी कर्ज नॉन पर्फार्मिंग एसेट (एनपीए) बताकर माफ कर दिया जाता है। रिजर्ब बैंक की सूची के मुताबिक केवल राष्ट्रीयकृत बैंकों को दस लाख करोड़ से ज्यादा का चूना देश के उद्योगपति अब तक लगा चुके हैं। इस पर लब्बोलुआव यह है कि अब तक कार्पोरेट जगत के एक भी व्यक्ति को आत्महत्या करने की नौबत का सामना नहीं करना पड़ा जबकि लाचान बना दिए गए दो लाख से ज्यादा किसान आत्महत्या कर चुके हैं।

इसलिए सरकारी धान और प्राकृतिक संपदा के दोहन के बूते पैर पसारने वाली कंपनियां डूब रही हैं तो उन्हें डूब जाने दें। आम नागरिक तो इनके डूबने से अप्रत्यक्ष लाभ में ही रहेगा। शहरीकरण का दबाव कम होगा। शिक्षा के व्यवसायीकरण पर अंकुश लगेगा। प्राकृतिक संपदा का दोहन थमेगा। नतीजतन औद्योगिक विकास के बहाने जो आर्थिक विषमताएं और सामाजिक असमानताएं बढ़ रही हैं वह भी थमेगीं। इसलिए आर्थिक मंदी पर न तो विचलित होने की जरूरत है और न ही घड़ियाली आंसू बहाने की ?

 

प्रमोद भार्गव