संस्करण: 27अक्टूबर-2008

क्षेत्रीयता, धर्म, भाषा और जातियों के नाम पर एकता के देश में अनेकता की राजनीति

 

 

राजेन्द्र जोशी

'म सब एक हैं' का नारा क्या सिर्फ दिखावा बनकर रह गया है ? यह प्रश्न सचमुच भारत की एकता और अखंडता के लिए एक बहुत बड़ी चुनौती पैदा कर रहा है। धर्म, जाति, संप्रदाय और भाषा के नाम पर 'अनेकता में एकता' की पहचान वाला हमारा देश दासता की बेड़ियों से मुक्त होकर विश्व के एक विशाल प्रजातांत्रिक देश के रूप में अस्तित्व में आया है। यह एक वास्तविकता है, कि-'सारे जहाँ से अच्छा/हिन्दुस्तां हमारा/ हम बुलबुले हैं इसकी/ यह गुलिस्तां हमारा/ भांति-भांति के खूबसूरत, रंगीन और खुशबूदार फूलों की महंक की क्यारियों के इस देश का एक गरिमापूर्ण सांस्कृतिक इतिहास रहा है। अनेक बोलियों और भाषाओं से समृध्द यहाँ के जनजीवन की अपनी एक अलग ही मिठास है। धार्म, संप्रदाय और जातियों के रश्मों, रिवाजों, रहन-सहन और परम्पराओं तथा पर्व, उत्सव और त्यौहारों के सामूहिक जश्नों के दृश्य 'हम सब एक हैं' नारे की सार्थकता के ज्वलंत उदाहरण माने जाते हैं। यह तो हैं भारत की सकारात्मक पहचान के उदाहरण। किंतु प्रजातांत्रिक प्रणाली के तहत जन-जन को मिले अधिकारों के अवसरों के गलत फायदे उठाने के रास्ते भी निहित राजनैतिक स्वार्थपूर्ति के कारण बनते देखे जाने लगे हैं।

देशभर में जगह-जगह होर्डिंग्स पर या राजमार्गों के किनारे लगे बोर्डों पर हमें यह पढ़ने को मिलता है, कि 'कश्मीर से कन्याकुमारी तक, भारत एक है'। इसका आशय यह है कि देश के एक छोर से दूसरे छोर तक, धर्म, संप्रदाय, जाति, भाषा और सांस्कृतिक परम्पराओं के निर्वहन के मामले में पूरा भारत अनेक संस्कृति और धर्म होते हुए एक सूत्र में बंधा है। सांस्कृतिक एकता की दृष्टि से लिखा गया यह एक वाक्य कभी-कभी देश के किसी भी भाग में उठी निहित राजनैतिक स्वार्थपूर्ति की ज्वाला के कारण अपने अर्थ और उसकी मूल-भावना पर प्रश्न चिन्ह लगा देता है। धार्मनिरपेक्षता संविधान की मूल भावना है किंतु विभिन्न धार्मों और धर्मावलंबियों के बीच खाइयां बढ़ाने के कृत्यों से उत्पन्न परिस्थितियों के दुष्परिणामों से भी समाज को खामियाजा भुगतना पड़ रहा है। अमन-शांति, सत्य, अहिंसा, सहिष्णुता और भाईचारे की भावनाऐं तब व्यापक रूप से आहत होने लगती है जब समाज में धर्म, जाति और भाषा के नाम पर कतिपय विघ्न-संतोषियों द्वारा बस्तियों में आग लगाई जाती है और उसकी आंच में अपनी राजनैतिक रोटियां सेंकी जाने लगती है।

संपूर्ण भारत की सात्विक परिभाषा है- हिन्दु, मुस्लिम, सिख, ईसाई आपस में हैं भाई-भाई, यह परिभाषा तब कलंकित हो जाती है, जब एक धर्मावलंबी वर्ग दूसरे धर्मावलंबी वर्ग के प्रति घृणा और हिंसा फैलाकर भाईचारे और सद्भाव की भावना को आघात पहुँचाने के कुचक्र चलाता है। कतिपय राजनैतिक और कुछ तथाकथित सामाजिक संगठन दहशत, आतंक, हिंसा और अराजकता फैलाकर समाज में अपना दबदबा और राजनैतिक वर्चस्व स्थापित करने के खेलों का प्रदर्शन करते रहते हैं। देश में ऐसी अनेक घटनाओं का शिकार होता आया है जब हिंदु, मुस्लिम, सिख, और इसाई भाइयों के बीच के सौहार्दपूर्ण रिश्तों की मिठास को खटास में परिवर्तित करने के दुष्कृत्य हुए हैं।

उड़ीसा, कर्नाटक, मध्यप्रदेश के कुछ क्षेत्रों और देश के कुछ हिस्सों में विगत समय में इकाई भाइयों के प्रति बहुसंख्यक वर्ग के कतिपय धार्मिक और जातिवादी संगठनों ने आग उगलते हुए जिस तरह की घटनाओं को अंजाम दिया उससे दुनिया की नज़र में भारत की एकता और अखंडता के मूल-स्वरूप का ग्राफ नीचे आया है। धर्म के नाम पर इस तरह के कुचक्र किसी एक धर्म की ही तरफ से नहीं, बल्कि विभिन्न धर्मों की कट्टरपंथी मानसिकता से जुड़ी असामाजिक प्रवृत्तियों की ओर से ही चलाए जाते हैं। धार्मिक संगठनों और धार्मिक संस्थाओं की निश्चित ही समाज में एकता, भाईचारे और सद्भाव की भावना को मज़बूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका है किंतु इन्हीं धार्मों के बीच पनप रही कट्टरवादी प्रवृत्तियां सदैव ही अलगाव की भाषा बोलकर हिंसा, नफरत और आतंक का सहारा लेकर धर्मनिरपेक्षता के हमारे सिध्दांत की धज्जियां उड़ाने में भी पीछे नहीं रहती हैं। जाति संघर्ष भी भारत में विकास और कल्याण के मार्ग में अवरोधा के रूप में सिध्द हुए हैं। वर्ग और जातियों के नाम पर राजनैतिक पार्टियाँ अपने वर्चस्व को जमाने के लिए जनभावना को गुमराह करती रहती है और छद्म हितैषी बनकर उनके कांधों पर पाँव रखकर सिंहासन की ऊंचाई पर पहुँचने में पीछे नहीं रहना चाहती हैं। भारत को हासिल हुई स्वतंत्रता के बाद धर्म और भाषा की एकता को मज़बूत बनाने का हमारे रहनुमाओं का एक आवश्यक अनिवार्य उत्तरदायित्व था। इस दिशा में बड़ी ही गंभीरता और सक्रियता से काम भी हुए। दक्षिण में भाषा की विविध के बावज़ूद देश में एक राष्ट्रभाषा 'हिन्दी' के प्रति जनजागरण का सफल परिणाम मिला। हालांकि स्वतंत्रता के पश्चात् दक्षिण में हिन्दी भाषा को राष्ट्रभाषा के रूप में स्वीकार किए जाने पर वहाँ कई तरह के उग्र आंदोलन हुए किंतु राष्ट्र की अस्मिता के खातिर वर्तमान में वहाँ हिन्दी भाषा को लेकर कहीं भी विपरीत स्थितियां नहीं हो रही है। संपूर्ण देश एक गणराज्य है और उसके प्रत्येक नागरिक की, चाहे वह उत्तर, दक्षिण, पूर्व पश्चिम कहीं भी रह रहा है उसकी नागरिकता भारतीय के रूप में अंकित है।

 

हाल ही में मुंबई जैसे 'कास्मोपालिटिन' नगर में हिन्दी भाषी और गैर हिन्दी भाषियों के बीच क्षेत्रीयता की दरार पैदा करने की साजिश के जो बीच बोये गये हैं वह निश्चित ही भारत के राष्ट्रीय गौरव तथा उसके एकता और अखंडता के स्वरूप के लिए घातक बनती जा रही है। गुदड़ी के धागों की तरह पूरा देश आपस में जुड़ा हुआ है। खान-पान, रहन-सहन, रीति-रिवाज या बोल-चाल के तरीकों में ज़रूर विविधता है किंतु धर्म, भाषा और संस्कृति के इस मिले जुले स्वरूप में देश के किसी भी कोने या क्षेत्र का नागरिक किसी भी हिस्से में रहकर अपने जीवन-यापन के लिए अपनी सेवाएँ देने का हकदार है। ऐसे में कतिपय राजनैतिक स्वार्थों की पूर्ति के लिए समाज को विघटित कर उसमें विभिन्न धर्मावलंबियों और भाषा-भाषियों के बीच क्षेत्रीय भावना की वैमन्यसता के बीज बोने से हमारी राष्ट्रीय अस्मिता शर्मसार होती है। भाषा और धर्म के नाम पर अपने राजनैतिक इरादों की पूर्ति करना और जनभावनाओं के साथ खिलवाड़ कर आतंक, नफरत और हिंसा फैलाने से देश में विकास के चल रहे प्रयासों पर बुरा असर पड़ता है। 'अनेकता में एकता' की पहचान वाले इस देश को 'एकता में अनेकता' के विपरीत अर्थ की ओर धकेलने के कृत्य निश्चित ही निंदनीय और भर्त्सना करने के योग्य हैं चाहे वे किसी भी राजनैतिक दलों के हो, सामाजिक संगठनों के हो या कतिपय कट्टरपंथी प्रवृत्तियों के हों ?

 

 

राजेन्द्र जोशी