संस्करण: 27अक्टूबर-2008

राष्ट्र की सम्प्रभुता को राज ठाकरे की चुनौती

 

डॉ.गीता गुप्त

भारत एक धर्मनिरपेक्ष लोकतान्त्रिक देश है। यहाँ के संविधान ने अपने नागरिकों को अनेक मौलिक अधिकार प्रदान किये हैं। तदनुसार कोई भारतीय नागरिक अपने देश में कहीं भी निवास कर सकता है। सन् 1947 में देश का बंटवारा मुस्लिम लीग की इस मांग पर हुआ था कि मुसलमानों को अलग देश चाहिए। तथापि बंटवारे के बाद भारत में रहने वाले मुसलमानों को कांग्रेस ने अल्पसंख्यक का दर्ज़ा देकर विशेष अधिकार-सम्पन्न बनाया। भारतीय राजनेताओं ने कभी भी क्षेत्रीय, जातीय या साम्प्रदायिक आधार पर भेदभाव नहीं किया इसीलिए इस देश में साम्प्रदायिक सद्भाव स्थापित हो सका। अद्यपर्यन्त यह बात कही जाती है-हिन्दु-मुस्लिम-सिख-ईसाई, आपस में है भाई-भाई।

सचमुच, यह विशाल देश और इसके निवासी एक संयुक्त परिवार के सदस्य की भाँति हैं जिनके सुख: दुख, आशा-निराशा, हर्ष-विषाद, अपेक्षाएँ-आकांक्षाएँ एक होनी चाहिए। यह 'वसुधौव कुटुम्बकम्' की धारणा रखने वाला देश है। यहाँ की संस्कृति गंगा-जमुनी तहजीब की हिमायती है। अनेकता में एकता इस संस्कृति की विशेषता है। फिर कुछ लोग क्यों क्षेत्रीयता की संकीर्ण मनोवृत्ति से ग्रस्त होकर ऐसा विष-वमन कर रहे हैं जो राष्ट्र के लिए घातक है ? यह चिन्ताजनक है।

आज़ादी के साथ, पहले ही भारत के टुकड़े हो चुके हैं। पाकिस्तान बना। फिर बंगला देश भी बना। पाकिस्तान ने आतंकवादियों की घुसपैठ करवाकर कश्मीर को हिन्दू-मुक्त क्षेत्र बना दिया है। बांग्ला देशी घुसपैठियों ने असम का धार्मिक व जातीय सन्तुलन बदलकर रख दिया है। अब असम में वहाँ के मूल निवासियों की अपेक्षा बांग्लादेशी घुसपैठियों की संख्या अधिक है। यूपीए सरकार के कार्यकाल में सन् 2005 में ही असम के तत्कालीन राज्यपाल लेफ्टिनेंट कर्नल अजय सिंह ने अपनी रपट पेश करते हुए कहा कि प्रतिदिन छ: हजार बांग्लादेशी घुसपैठ कर रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट ने भी केन्द्र सरकार से घुसपैठिया निकाला नहीं गया और सन् 1971 से अब तक भारतीय इलाकों में उनकी संख्या इतनी हो गयी है कि अब तो मतदाता सूची में स्थान पाकर वे यहाँ की सरकार चुन रहे हैं। अब उन्हें बाहर निकालना तो दूर, उल्टे भारतीय नागरिकता देने की वकालत केन्द्रीय मंत्री रामविलास पासवान ने हाल ही में की है।

ऐसी दुर्भाग्यपूर्ण वास्तविकता पर राज ठाकरे चिन्तित क्यों नहीं होते ? वे कश्मीर और असम के हालात सुधारने के लिए कोई क़दम क्यों नहीं उठाते ? महाराष्ट्र क्या उनकी निज़ी सम्पत्ति है, जो अन्य प्रदेशवासियों को वे वहाँ से बेदखल करके रहेंगे ? क्या वे महाराष्ट्र के छत्रपति हैं जिनका निरंकुश स्वेच्छाचार सहन करने के लिए लोकतन्त्र के नागरिक विवश हो ? क्या भारत के संविधान और लोकतान्त्रिक व्यवस्था से राज ठाकरे ऊपर हैं ? गैर मराठियों के प्रति उनका आचरण घोर निन्दनीय है। वे लगातार भड़काऊ भाषण देने, देश की शांति भंग करने, दंगा भड़काने और हिंसक वारदात को अंजाम देने में लिप्त हैं। उन्होंने अमिताभ बच्चन पर वाक् प्रहार किया, रेलमंत्री लालू जी को चुनौतियाँ दीं, बिहारियों ने महाराष्ट्र से पलायन हेतु बाध्य किया और अब उनके नेतृत्व वाली महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना और शिवसेना के कार्यकर्ताओं ने रेलवे की परीक्षा में स्थानीय लोगों के अपर्याप्त प्रतिनिधित्व को मुद्दा बनाकर मुम्बई के उपनगरों में आयोजित उक्त परीक्षा के 13 केन्द्रों पर हमला करके उत्पात मचाया। उत्तर भारतीय परीक्षार्थियों को परीक्षा देने से रोकने हेतु तड़के ही ठाणे, कल्याण, वाशी और मुम्बई के उपनगरीय स्टेशन सायन पर उनके उतरते ही हमले किये गये। परीक्षा-केन्द्रों में घुसकर परीक्षार्थियों की पिटाई की गयी, जिससे बिहार के नालन्दा ज़िले के छात्र पवन की मौत हो गयी। यह दु:खद है।

भारत का कोई भी प्रदेश सिर्फ़ वहाँ के स्थानीय लोगों से आबाद नहीं हुआ है। समूचे महाराष्ट्र या केवल मुम्बई का निर्माण भी अकेले मराठियों ने नहीं किया है। इसमें सभी देशवासियों का योगदान है। लोकतान्त्रिक शासन पध्दति में सम्पूर्ण देश का हित सर्वोपरि होता है। राजतन्त्र में ही राजा सिर्फ़ अपने राज्य के बारे में सोच सकता है। राज ठाकरे शायद मुम्बई में राजतन्त्र का स्वप्न देख रहे हैं। वे महाराष्ट्र में हिंसा फैलाकर देश की शान्ति भंग करना चाहते हैं। क्षेत्रीयता का विष उगलकर वे राष्ट्र की सम्प्रभुता को चुनौती दे रहे हैं। क्या वे देश के टुकड़े करना चाहते हैं या अपने मुठ्ठी भर समर्थकों के सहारे महाराष्ट्र को अलग देश बनाना चाहते हैं ? महाराष्ट्र की पूरी जनता उनके साथ कदापि नहीं हो सकती। अपने आचरण से ठाकरे देशवासियों के मन में मराठियों के प्रति घृणा के बीज बो रहे हैं जिसके गम्भीर दुष्परिणाम भावी पीढ़ी को झेलने होंगे। मुम्बई के वातावरण में शान्ति, सद्भाव और सौहार्द का अभाव हो जाएगा। यही नहीं, अन्य प्रदेशों में भी मराठियों का जीवन दूभर हो जाएगा। आखिर देश को हिंसा की आग में झोंककर ठाकरे अपना कौन-सा स्वार्थ साधाना चाहते हैं ?

संवैधाानिक व्यवस्था सोच-समझकर ही लागू की गयी होगी। अब सभी प्रदेश यदि अपनी सेवाओं में सिर्फ़ स्थानीय लोगों को ही अवसर देने का नियम या दुराग्रह अपना लें तो क्या योग्यता को प्रतिनिधित्व या महत्व मिल पाएगा ? क्या व्यावहारिकता की दृष्टि से यह उचित और सम्भव है ? स्वस्थ और खुली स्पर्धा के कारण ही आज देश में योग्यता को स्थान मिल पाता है। क्रीड़ा, मनोरंजन, चिकित्सा, न्याय, शिक्षा, प्रशासन, लेखन, व्यवसाय आदि अनेकानेक क्षेत्रों में  विविधवर्णी, प्रतिभाएँ विश्व में भारत का नाम रौशन कर रही हैं। सचिन तेन्दुलकर, अभिनव बिन्द्रा, सुशील कुमार, विश्वनाथन आनन्द, लता मंगेशकर, किरण बेदी, तीजनबाई आदि अनेक नामचीन हस्तियाँ भारत की शान हैं, किसी प्रदेश मात्र की नहीं। गांधी, नेहरू, सुभाष, सरदार पटेल, इन्दिरा गांधी आदि नेताओं ने अखण्ड भारत के कल्याण का ही स्वप्न देखा और उसी के लिए अपने प्राण न्यौछावर किये। पराधीन भारत के वीर सपूतों ने भी सम्पूर्ण देश की स्वतन्त्रता हेतु संघर्ष किया, किसी प्रान्त विशेष या सिर्फ़ अपनी जन्म-भूमि की स्वतन्त्रता के लिए नहीं।

केन्द्र एवं विभिन्न राज्यों की सभी सेवाओं में पूरे देश की भागीदारी है। राज्यों के लोक सेवा आयोग एवं संघ लोक सेवा आयोग की प्रतिस्पर्धी परीक्षाओं में सम्पूर्ण भारत के अभ्यर्थी शामिल होते हैं। किसी भी राज्य के अस्पताल में दक्षिण भारत की सेवाभावी नर्स को तैनात देखा जा सकता है। हमारी तीनों सेनाओं में समूचे देश के विभिन्न प्रांतों से आये बहादुर जवान तैनात है। हम मराठी, गुजराती, बंगाली, उड़िया या राजस्थानी नहीं, सिर्फ भारतीय हैं और भारतीय कहलाने में ही हमें गर्व का अनुभव होना चाहिए। ध्यान रहे, हमारे कुकृत्य से हमारी जाति या मात्र हमारा नगर ही नहीं अपितु पूरा देश लज्जित होता है। राज ठाकरे के व्यवहार से सारे भारतवासी स्तब्ध और आहत हैं।

बहरहाल, राज ठाकरे उत्तर भारतीय छात्रों से मारपीट के मामले में रत्नागिरी से गिरफ्तार किये गये और उन्हें ज़मानत भी मिल गयी। हालांकि कोर्ट से बाहर आते ही उन्हें डोंबीविली मामले में कल्याण पुलिस ने हिरासत में ले लिया। इस पर महाराष्ट्र के अनेक अंचलों में महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना ने हंगामे किये। अखबारों के अनुसार, 115 बसों में आगजनी और 335 टैक्सियों में तोड़फोड़ की ख़बर है। राज-समर्थकों ने बांद्रा के न्यायालय भवन पर भी पथराव किया और मीडिया के लोगों को भी नहीं बख्शा। रेलमंत्री लालूप्रसाद ने मनसे के उत्पात के कारण रेलवे की परीक्षा से वंचित परीक्षार्थियों के लिए पुन: परीक्षा आयोजित करने की घोषणा की है।

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कहा है- 'देश में संविधान की रक्षा होनी चाहिए क्योंकि यह घटना देश की एकता और अखण्डता के लिए ख़तरा है। राज्य-सरकार को महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के कार्यकर्ताओं के विरुध्द सख्त - से - सख्त कार्रवाई करनी चाहिए।' महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री ने कहा तो है कि 'कोई भी व्यक्ति कानून से ऊपर नहीं है। जो भी हिंसा फैलाएगा, उससे सख्ती से निपटा जाएगा।' फिलहाल गुलाब कोठारी का कथन सही है-'मराठाओं के इतिहास में ठाकरे काले पन्ने जोड़ रहे हैं। केन्द्र सरकार को तुरन्त लगाम लगाने के लिए मुस्तैदी दिखानी चाहिए।' अब देखना है कि राष्ट्र की सम्प्रभुता को चुनौती देने वाले के साथ सरकार कैसा सलूक करती है ?

 

डॉ.गीता गुप्त