संस्करण: 27अक्टूबर-2008

राज ठाकरे तुम्हारी गुंडागर्दी से देश टूट सकता है

 

एल.एस.हरदेनिया

राज ठाकरे और उसके गुंडों ने एक बार फिर उत्तर भारतीयों पर हमला बोल दिया। दिनांक 19 अक्टूबर 2008 को मुंबई में रेलवे में भर्ती के लिए एक परीक्षा आयोजित थी। परीक्षा देने अन्य स्थानों के साथ-साथ उत्तर प्रदेश तथा बिहार से भी उम्मीदवार आये थे। इन उत्तर भारतीय उम्मीदवारों की राज ठाकरे के गुंडों ने पिटाई कर दी। राज ठाकरे का कहना था कि रेलवे द्वारा आयोजित इस परीक्षा में मराठी भाषियों को भाग नहीं लेने दिया गया है। उनका आरोप था कि ऐसा एक योजनाबध्द तरीके से जानबूझकर किया गया है।

राज ठाकरे और उनके समर्थक इसके पहिले भी इस तरह की गुंडागर्दी कर चुके हैं। राज ठाकरे, शिवसेना के संस्थापक बाला साहब ठाकरे के भतीजें हैं। उन्हें पूरा भरोसा था कि बाला साहेब उन्हें अपना राजनीतिक उत्तराधिकारी बनायेंगे। परन्तु सीनियर ठाकरे ने अपने पुत्र उध्दव ठाकरे को अपना राजनीतिक उत्तराधिकारी बनाया। इससे नाराज होकर राज ठाकरे ने एक पृथक संगठन की स्थापना की और इसके बाद अपनी नकारात्मक गतिविधियों का सिलसिला प्रारंभ किया। इस बात की भी सूचना है कि कुछ अन्य राजनीतिक दल भी राज ठाकरे को प्रोत्साहित कर रहे है।

जो राज ठाकरे आज कर रहे हैं वह बरसों पहिले बाला साहेब कर चुके हैं। बाला साहेब ने सर्वप्रथम दक्षिण भारतीयों के विरूध्द अभियान चलाया। उन्होंने मुसलमानों के विरुध्द विषवमन किया। वे गर्व से घोषित करते थे कि मुंबई में दंगा मेरे लोगों ने किया। 1992-93 के दंगों की जांच न्यायाधाीश श्रीकृष्ण ने की थी। उन्होंने मुंबई के दंगों में बाला साहेब ठाकरे की शिवसेना का हाथ होना सिध्द किया।

बाला साहेब ने अनेक बार अपने भाषणों व लेखों में भारतीय संविधान, न्यायपालिका, विधायिका, खबरपालिका सभी के विरुध्द अपमानजनक भाषा का उपयोग किया। उन्होंने अनेक बार कहा कि ''किसके बाप की हिम्मत है मुझे गिरफ्तार करने की।'' परंतु मुंबई की पुलिस, वहाँ का प्रशासन और यहाँ तक कि वहां के मुख्यमंत्री भी उनकी तमाम गैर-कानूनी गतिविधियों के मूक दर्शक बने रहे और शिवसेना के बारे में जनसाधारण में यह धारणा बन गई कि यह संस्था संविधान और कायदे-कानून के ऊपर है। इससे उनके हौसले बढ़ते गए।

राज ठाकरे ने सोचा होगा कि जैसे मेरे चाचा की आपत्तिजनक और गैर-कानूनी गतिविधियों को व्यवस्था सहती रही वैसे ही मेरी भी सही जाएंगी। राज ठाकरे ने उत्तर भारतीयों को अपना निशाना बनाया। उन्होंने नारा दिया कि ''मुंबई सिर्फ मराठी भाषियों की है।'' राज ठाकरे भूल गए कि मुंबई के निर्माण और उसके एक महत्वपूर्ण महानगर बनने में सभी भाषा भाषियों का योगदान है। इनमें पारसी, गुजराती, दक्षिण भारतीय, उत्तर भारतीय, पंजाबी ऐंग्लो इंडियन और यहाँ तक कि अंग्रेजों का योगदान रहा है। मुंबई देश की आर्थिक राजधानी है। यदि अन्य भाषा भाषियों को मुंबई से निष्कासित कर दिया जाता है तो मुंबई का यह दर्जा बरकरार नहीं रह पाएगा।

मुंबई को मराठी भाषा भाषियों से उस समय जोड़ दिया गया जब राज्य पुर्नगठन आयोग ने पृथक महाराष्ट्र प्रांत के गठन की सिफारिश नहीं की। इस कारण महाराष्ट्र में एक जोरदार आंदोलन प्रारंभ हो गया। उस आंदोलन का सर्वाधिक लोकप्रिय नारा था ''मुंबई सह महाराष्ट्र झालाच पाहिजे।''

संयुक्त महाराष्ट्र आंदोलन के कुछ नेता अत्यधिक संकुचित भाषा में अपने तर्क रखते थे। उदाहरणार्थ इस आंदोलन के एक नेता थे प्रोफेसर आत्रेय। एक बार उन्होंने महाराष्ट्र आंदोलन के मंच से कह डाला कि ''भारत में सिर्फ महाराष्ट्र का इतिहास है बाकी सब राज्यों का सिर्फ भूगोल है।'' जैसे ही प्रोफेसर आत्रेय ने यह कहा, कम्यूनिस्ट पार्टी के श्री एस.ए.डांगे ने उनका माइक छीन लिया। आज मराठी भाषियों पर यही चिंतन लादने का प्रयास किया जा रहा है। महाराष्ट्र में अनेक ऐसे नगर हैं जिनका चरित्र कास्मोपोलिटन है। इन शहरों में मुंबई के अतिरिक्त नागपुर व पुणे भी शामिल हैं। बंगलौर एवं हैदराबाद की ही तरह पूणे भी सूचना तकनीक का महत्वपूर्ण केन्द्र बन गया है। यदि राज ठाकरे इस तरह की गतिविधियां करते रहे तो इन नगरों का विकास थम जाएगा। जिन संस्थानों में बड़े पैमाने पर रोजगार मिलता है वे इन शहरों से पलायन कर जाएंगे।

जहाँ राज ठाकरे की इस तरह की गतिविधिायों की भर्त्सना आवश्यक है वहीं यह भी आवश्यक है कि उन कारणों का पता लगाया जाए जिनके चलते नवयुवक इस तरह के संकुचित आंदोलनों से जुड़ जाते हैं। इस तरह के भटके हुए युवकों की मानसिकता  समझकर ही ऐसे गैर-जिम्मेदाराना आंदोलनों से निपटा जा सकता है।

यहाँ एक बात कहना और जरूरी है। दिनांक 21 अक्टूबर के समाचार पत्रों में खबर छपी है कि कानपुर में मराठी भाषियों की कुछ संस्थाओं पर हमला हुआ है। इस तरह की प्रतिक्रिया उचित नहीं है। हिन्दी भाषी क्षेत्र अपने उदार दृष्टिकोण के लिए जाना जाता है। जितने गैर-हिन्दी भाषी, हिन्दी भाषी राज्यों में काम कर रहे हैं उससे कई गुना कम हिन्दी भाषी, गैर हिन्दी भाषी राज्यों में काम कर रहे होंगे। मुट्ठी भर गुंडों की हरकतों से हमें अपना संतुलन नहीं खोना चाहिए।

कानपुर, भोपाल, इंदौर, पटना,लखनऊ और अन्य हिन्दी भाषी राज्यों में रह रहे मराठी भाषियों को मुंबई में की गई निकृष्ट हरकतों के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। संकुचित विचारों और हरकतों का जवाब संकुचित विचारों और संकुचित हरकतों से देना उचित नहीं है। यदि क्रिया-प्रतिक्रिया का यह सिलसिला चलता रहा तो देश टूट जाएगा। राज ठाकरे समेत सभी को इस खतरे को समझना चाहिए।

यहाँ अन्य पार्टियों के साथ-साथ भारतीय जनता पार्टी से विशेष अपेक्षा है क्योंकि महाराष्ट्र की राजनीति में भाजपा और शिवसेना साथ-साथ हैं। दोनों केन्द्र सरकार में भी भागीदार रह चुके हैं। दु:ख की बात है कि भाजपा ने कभी एक भी शब्द शिवसेना व बाला साहेब की हरकतों के विरूध्द नहीं बोला। राज ठाकरे के मामले में भी भाजपा मौन है। इस तरह का मौन देश के साथ भाजपा के लिए भी घातक सिध्द होगा।

 

 

एल.एस.हरदेनिया