संस्करण: 27अक्टूबर-2008

मालेगांव से मोडासा :

अब बेपर्द होते हिन्दू आतंकवादी

 

सुभाष गाताड़े

मजान के महिने में महाराष्ट्र के मुस्लिम बहुल मालेगांव और गुजरात के साबरकांठा जिले के अल्पसंख्यक बहुल मोडासा में लगभग एक ही वक्त एक ही तरीके से बम विस्फोट हुए। एक ऐसे वक्त में जब लोग ईद की तैयारियों के लिए निकले थे, उस वक्त कहीं खड़े किए गए दुपहिया वाहनों ने विस्फोटकों के जरिए मौत को उगला।  अगर मोडासा में अयुब नामुभाई घोरी का 15 साल का शहजादा मारा गया तो मालेगांव में पांचवी कक्षा की छात्रा सबा परवीन और तीन लोग वहीं ठौर मारे गए।

अक्सर जिस तरह समुदायविशेष पर दोषारोपण का सिलसिला चलता है, वही बात इन बम विस्फोटों के बारे में भी उछाली गयी थी, लेकिन कर्तव्यनिष्ठ पुलिस अफसरों द्वारा की गयी निष्पक्ष जांच से यही नतीजा सामने आया है कि इन दोनों बम विस्फोटों में हिन्दु आतंकवादी समूहों का हाथ है। 23 अक्तूबर को 'इण्डिया न्यूज' चैनल ने भी इस मामले में अपनी विशेष प्रस्तुति दी।

इण्डियन एक्स्प्रेस में (23 अक्तूबर 2008) के मुताबिक उसे 'महाराष्ट्र पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों से जो सूचना मिली है वह बताती है कि इन विस्फोटों को कथित तौर पर इन्दौर में सक्रिय हिन्दु अतिवादी समूह 'हिन्दु जागरण् मंच' ने अंजाम दिया था, जिसका करीबी रिश्ता अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से है।' पुलिस के मुताबिक इन आतंकवादियों ने जांच अधिकारियों को गुमराह करने के लिए वहां इस्लामिक स्टीकर्स भी रख दिए थे, लेकिन उन्होंने कुछ ऐसे सूत्र भी छोड़े थे कि वे पकड़ में आ गए। जांच दल ने जब बम विस्फोट के लिए मालेगांव में इस्तेमाल की गयी स्कूटर की जांच की तब उन्होंने पाया कि ' वह एक एलएमएल फ्रीडम ब्राण्ड स्कूटर थी जिसमें अन्य वाहनों से भी पार्ट डाले गए थे और चासिस एवम इंजिन नम्बर भी मिटा दिया गया था। लेकिन स्कूटर की निर्मिति का वर्ष, डीलरों के रेकॉर्ड और अपराधविज्ञान शाखा के विशेषज्ञों की सहायता से इसके सूत्र गुजरात तक भी जाते दिखे। मोडासा के बम विस्फोट में इस्तेमाल मोटरसाइकिल एक ऐसे व्यक्ति की मालकियत की थी जो कथित तौर ''अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद'' की पृष्ठभूमि से था और इस काण्ड को अंजाम दिया था हिन्दू जागरण मंच के कारिन्दों ने जिन्होंने अपना कार्यालय इन्दौर स्थित एक गैरसरकारी संगठन के दफ्तर में बनाया है।''

गौरतलब है कि महाराष्ट्र पुलिस विभाग के उच्चाधिकारियों ने इस मामले की पुष्टि की लेकिन मामले की सम्वेदनशीलता को देखते हुए आधिकारिक तौर पर कुछ वक्तव्य देने से इन्कार किया। उनका कहना था कि केन्द्रीय एजेन्सियों को इसके बारे मे बताया गया है। इस बात को रेखांकित करना यहां जरूरी है महाराष्ट्र के जिस आतंकवाद विरोधी दस्ते ने हेमन्त करकरे की अगुआई में इस मामले की जांच की, उसी ने कुछ माह पहले महाराष्ट्र के ठाणे और वाशी जैसे स्थानों पर हुए रहस्यमय बम विस्फोटों की गुत्थी भी सुलझायी थी। इन बम विस्फोटों में 'सनातन संस्था' और 'हिन्दू जनजागृति समिति' जैसे अतिवादी संगठनों के कार्यकर्ता पकड़े गए थे, जिनके खिलाफ पिछले दिनों 1,020 पन्नों की चार्जशीट भी दायर कर दी गयी है।

वैसे सबा परवीन को अभीभी यह ग़म सालता रहता है कि आखिर उसने क्यों अपनी छोटी बहन फरहीन को उस दिन पकौड़ा लाने के लिए भिक्खु चौक भेजा। उसे क्या पता था कि पांचवी कक्षा में पढ़ रही दस साल की फरहीन के लिए वहां भिक्खु चौक पर मौत दबे पांव खड़ी है ? (29 सितम्बर 2008)

सूबा महाराष्ट्र के मालेगांव में रमज़ान के दिनों में हुए उस बम विस्फोट ने शेख लियाकत वहीउद्दीन के समूचे परिवार को गोया बिखेर दिया है।  फरहीन के पिता लियाकत का घर भिक्खु चौक से महज 100 फीट पर दूरी पर है। तीन बेटियों और दो बेटों के पिता शेख लियाकत आजभी उस दिन को याद करके सिहर उठते हैं। वाडिया अस्पताल में उन्होंने अपनी बड़ी नाज़ से पाली फरहीन के अचेत शरीर को देखा था, तो दोनों बेहोश हो गए थे।

अकेली फरहीन ही नहीं उस दिन विस्फोटकों से लदी उस मोटरसाइकिल ने तीन अन्य लोगों को लील लिया था। 'सिमी' के पुराने दफ्तर के पास घण्टों खड़ी इस मोटरसाइकिल के बारे में इलाके के लोगों ने पुलिस को सूचना भी दी थी, लेकिन पुलिसवाले तभी पहुंचे जब विस्फोटकों ने वहां मौत का खेल खेला था।

मालेगांव में ईद के पहले हुए इन बम विस्फोटों ने दो साल पहले के उन बम विस्फोटों की याद ताज़ा की थी जब शब ए बारात के दिन - शहर के मस्जिदों एवं अन्य मुस्लिम बहुल इलाके में जब वहां लोग भारी संख्या में एकत्रित होते हैं - बम विस्फोट हुए थे, जिसमें 40 अल्पसंख्यक मारे गए थे। इस बम विस्फोट में हिन्दु आतंकवादी समूहों की सहभागिता के प्रमाणों को देखने के बावजूद, जहां एक ऐसी लाश भी बरामद हुई थी जिसने एक नकली दाढ़ी लगायी थी, पुलिस ने एकतरफा गिरफ्तारियां की थीं। आज भी इनमें से कई लोग जेल में बन्द हैं। दो साल पहले सीबीआई जांच की मांग भी मान ली गयी थी, लेकिन वह जांच भी अंधाी गली में पहुंच गयी है।

हर बम विस्फोट के बाद समुदायविशेष को ही निशाने पर रखने के रवैये के खिलाफ मालेगांव के मुसलमानों ने रोष प्रदर्शन किया था। इलाके के मंत्री बाबा सिद्दीकी से बात करते हुए समुदाय के नेताओं ने कहा था 'आप मन्दिरों में बम धमाकों के लिए सिमी को जिम्मेदार मानते हैं, आप बाजार में हुए बम धमाकों के लिए सिमी को जिम्मेदार मानते हैं, आप मस्जिदों में हुए बम धामाकों के लिए सिमी को जिम्मेदार मानते हैं। लेकिन यह हमला तो सिमी के बन्द पड़े दतर के बाहर हुआ है। अब आप किसे दोष देंगे।'( मेल टुडे, 3 अक्तूबर 2008)

यह बात विदित है कि अल्पसंख्यकों की अच्छी खासी आबादी वाले मालेगांव के बम विस्फोट की ही तरह गुजरात के सांबरकांठा जिले मोडासा के अल्पसंख्यक बहुल इलाके में उसी वक्त उसी तरह से बम विस्फोट हुआ था। मोडासा में रात को 9.26 मिनट पर हुए बम विस्फोट में अयूब नामूभाई गोरी का 15 साल को इकलौता बेटा मारा गया था तो चन्द मिनटों बाद मालेगांव में बम विस्फोट हुआ था। ईद के पहले भीड़भाड़वाले इलाके में मोटरसाइकिलों पर रखे गए इन विस्फोटकों के जरिए अधिक से अधिक लोगों को मारने की योजना थी क्योंकि उनका समय ऐसे ही तय किया गया था जब लोग रमज़ान का उपवास खतम करके बाहर निकले हों।

वे सभी जो मुल्क में अंजाम दिए जानेवाले बम विस्फोटों पर नज़र रखे हुए हैं आप को बता सकते हैं कि जहां तक बजरंग दल जैसे अतिवादी हिन्दू संगठन का ताल्लुक है - जिससे सम्बध्द लोग देश के अलग-अलग भागों में अंजाम दिए गए बम विस्फोटों में पकड़े गए हैं या दुर्घटना में मारे गए हैं - उसे अपनी करतूतों को अंजाम देने के लिए मोटरसाइकिल जैसा दुपहिया वाहन मुफीद जान पड़ता है। अप्रैल 2006 में महाराष्ट्र के नांदेड में लक्ष्मण राजकोण्डवार नामक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ता के घर जो बम विस्फोट हुआ था, जिसमें संघ-बजरंग दल का कार्यकर्ता हिमांशु पानसे और राजकोण्डवार का बेटा राजीव मारे गए थे, उसके बाकी अभियुक्तों ने अपने नार्कोटेस्ट में पुलिस को बाकायदा बताया था कि इसके पहले महाराष्ट्र के परभणी (2003), जालना (2004), पूर्णा जैसे स्थानों में जो बम विस्फोट किए गए थे, उसमें उनके ही लोगों का हाथ था। इन 'रहस्यमय बम धामाकों में' मोटरसाइकिल पर सवार आतंकवादियों ने नमाज के लिए एकत्रित मुस्लिम समुदाय पर बम फेंके थे। नांदेड बम धामाकों में मारे गए हिमांशु और राजीव के घर पर जब पुलिस ने छापा मारा था तो उन्हें न केवल नकली दाढ़ी मिली थी बल्कि ऐसे कपड़े भी मिले थे, जो आम तौर पर मुस्लिम समुदाय द्वारा पहने जाते हैं। इलाके में मस्जिदों के नक्शे भी वहां से बरामद हुए थे।

इस बात को मद्देनज़र रखते हुए कि पुलिस एवम मीडिया के संचालन में साम्प्रदायिक सहजबोधा बहुत हावी रहता है, इस बात का आकलन करना बहुत मुश्किल है कि आगे क्या होगा ? मालेगांव और मोडासा के बम धामाकों को अंजाम देनेवाले हिन्दू आतंकवादी भले पकड़े गए हों, लेकिन चाहे नांदेड बम विस्फोट हों या अगस्त के आखरी सप्ताह में सामने आया कानपुर बम धामाका हो - जिसमें बजरंग दल - संघ के दो कार्यकर्ता राजीव मिश्रा और भूपेन्द्र सिंह मारे गए थे, ऐसे कई मामलों में पुलिस एवम जांच एजेन्सियों की लिपापोती जगजाहिर है। कानपुर बम धामाकों में राजीव मिश्रा एवम भूपेन्द्र सिंह के जिन दो सहयोगियों का नार्को टेस्ट कराया गया था, जिसमें उन्होंने कानपुर आई आई टी के एक प्रोफेसर एवम विश्व हिन्दू परिषद के एक स्थानीय नेता का नाम लिया था। उन्होंने पुलिस को यहभी बताया था कि फिरोजाबाद जैसे मुस्लिम बहुल इलाकों में बम धमाकों को अंजाम देने की जो साजिश इन आतंकवादियों ने रची थी, उसके असली मास्टरमाइंड वहीं थे। यह जुदा बात है कि पुलिस दल इनसे सामान्य पूछताछ करने भी नहीं गया।

अगर हम देश भर में 2006 के बाद हुए बम विस्फोटों पर नज़र डालें तो यह बात साफ दिखाई देती है कि कमसे कम पांच ऐसे बम धमाके हैं जिनमें अल्पसंख्यकों को निशाना बनाया गया, उनके धाार्मिक स्थानों को नुकसान हुआ और आज भी उन्हें सुलझाया नहीं जा सका है। पिछले दिनों 'मेल टुडे' में प्रकाशित अमन शर्मा की रिपोर्ट ने इसका खुलासा किया था (3 अक्तूबर 2008) दिल्ली का जामा मस्जिद बम विस्फोट (14 घायल, अप्रैल 2006) जहां निम्न तीव्रता वाले बम पालिथिन के पैकटों में रखे थे। यह मामला आज भी लम्बित है। मालेगांव (40 मौतें, 8 सितम्बर 2006) जिसमें शब-ए-बारात के दिन मस्जिदों के बाहर बम रखे गए थे - जिनमें आरडीएक्स एवम अमोनियम नाइट्रेट का इस्तेमाल किया गया था, यह मामला आजभी अनसुलझा है। समझौता एक्स्प्रेस में बम विस्फोट (66 मौतें, 18 मई 2007) जिसमें छह बमों का प्रयोग हुआ था, इसमें भी कोई प्रगति नहीं हुई है और न ही किसी संगठन को दोषी बताया गया है। मक्का मस्जिद बम विस्फोट (11 मौतें, 18 मई 2007) जिसमें मक्का मस्जिद के अन्दर दो बक्सों में बम रखे गए थे, ये मामले भी फिलवक्त सीबीआई के पास पड़े हैं। अजमेर शरीफ बम धमाकों      (3 मौतें, 11 अक्तूबर 2007) की जांच भी अभी किसी नतीजे तक नहीं पहुंची है, इसमें दो टिफिन बक्सों में अमोनियम नाइट्रेट का प्रयोग किया गया था और मोबाइल फोन से बम धामाके किए गए थे।

 

सुभाष गाताड़े