संस्करण: 27जूलाई-2009

क्या करचोरी का मॉरिशस रास्ता बन्द होगा ?

 सुभाष गाताड़े

पिछले दिनों राज्यसभा में चली बहस में वित्तामंत्री प्रणव मुखर्जी ने मॉरिशस का विशेष उल्लेख किया। उनका कहना था कि 'काले धान का स्त्रोत यहां की कम्पनियों' से निर्मित स्थिति को ठीक करने के लिए सरकार मॉरिशस के साथ किए अपने करार में उचित संशोधन करना चाह रही है। इतना ही नहीं उन्होंने यह भी जोड़ा कि ऐसे संशोधन की वजह से अगर मॉरिशस सरकार को अगर वित्तीय नुकसान उठाना पड़े तो द्विपक्षीय सहयोग के जरिए सरकार अपना हाथ भी बंटा सकती है। (टाईम्स आफ इण्डिया, 15 जुलाई 2009) बहुत कम लोग इस तथ्य से भी वाकीफ हैं कि यह छोटा सा मुल्क सौ करोड़ से अधिक आबादी वाले भारत में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश का लगभग आधा हिस्सा भेजने के लिए जिम्मेदार है। गौरतलब है कि अप्रैल 2000 से आज तक हिन्दोस्तां में जो लगभग 81 बिलियन डॉलर का प्रत्यक्ष विदेशी पूंजी निवेश हुआ उसका 43 फीसदी (35.18 बिलियन डॉलर) इस नन्हे से देश से आया तो इसी दौरान अमेरिका से 7.59 बिलियन डॉलर, ब्रिटेन से 7.72 बिलियन डॉलर और जर्मनी में 2.14 बिलियन डॉलर का पूंजी निवेश हुआ।

प्रश्न उठता है कि कैसी बनी हैं यहां की महाकाय कम्पनियां जिन्होंने 12 लाख आबादी के छोटेसे मुल्क में को वैश्विक वित्ता का महत्वपूर्ण केन्द्र बनाया है। मॉरिशस की राजधानी पोर्ट लुइस की कैथेड्रल स्क्वेअर तथा चन्द अन्य बिल्डिगों के छोटे छोटे कमरों में इस द्वीप की तमाम प्रबन्धान कम्पनियों के दतर हैं, जो अपने स्तर पर सैकड़ों 'ग्लोबल बिजनेस कम्पनियों' को नियंत्रित करती हैं। हर रोज इन छोटे छोटे कमरों से अरबों डालरों का आदानप्रदान चलता रहता है। इन दिनों मॉरिशस में ऐसी 700 ग्लोबल बिजनेस कम्पनियां संचालित हो रही हैं जिनमें से 200 कम्पनियों का फोकस भारत में पूंजीनिवेश ही है।

वर्ष 2003 की बात है जब कर चोरी के 'मॉरिशस रास्ते' को लेकर पूरे मुल्क में जबरदस्त हल्ला हंगामा हुआ था। लोग यह जानकर आश्चर्यचकित थे कि वर्ष 1983 में भारत एवम मॉरिशस के बीच सम्पन्न 'डबल टैक्सेशन अवायडन्स ट्रिटी' अर्थात दोनों देशों की कम्पनियों को एक-दूसरे के यहा कर चुकाने से मुक्ति मिले, का फायदा उठा कर तथा नब्बे की शुरूआत में खुद मॉरिशस सरकार ने वैश्विक कम्पनियों को अपने यहां पहुंचने का रास्ता सुगम करने के लिए बनाए नियमों का फायदा उठा कर मॉरिशस में पंजीकृत देशी-विदेशी बड़ी बड़ी कम्पनियां अरबों रूपयों के टैक्स बचाने में सफल हुई हैं। यह देखने में आया था कि तमाम विदेशी कम्पनियों ने अपनी कागजी कम्पनियां मॉरिशस में बनायी हैं तथा अपने आप को मौरिशस का नागरिक घोषित किया है। इन कम्पनियों ने अपने आप को मॉरिशस की कम्पनी घोषित कर हिन्दोस्तां में निवेश किया है और इस करार का फायदा उठाते हुए वे कर देने से यहां बचती हैं और वहां भी कर नहीं देती हैं।

उन्हीं दिनों विश्लेषकों ने इस बात की भी विवेचना की थी कि इसकी वजह से आखिर विगत दशक में - जब भारत सरकार ने आर्थिक सुधारों की शुरूआत की - सरकार को कितना घाटा हुआ होगा। विश्लेषण के मुताबिक कमसे कम 28,913 करोड़ रूपये का नुकसान उस दशक में हुआ होगा। अर्थात प्रतिवर्ष 2300 करोड़ रूपए का घाटा। अगर भारत के बजट के साथ इस घाटे की तुलना करें तो पता चलेगा कि 2003-2004 के दरमियान सरकार ने कर संग्रहणा के जो अनुमान पेश किए थे, उसका लगभग 10 फीसदी भाग इस घाटे के बराबर था। लोगों को याद होगा कि सरकार ने वित्ता की कमी का रोना रोते हुए उन दिनों बाल्को, वीएसएनएल, आईपीसीएल और कई अन्य सरकारी कम्पनियों को निजी हाथों में बेचा था। अगर घाटे को बचाया जा सकता तो इन सभी कम्पनियों के निजीकरण की कोई आवश्यकता नहीं पड़ती।

सोचने का मसला है टैक्स नियोजन करनेवाली ऐसी देशी और विदेशी कम्पनियां - जो इस तरह संचालित होती हैं ताकि हिन्दोस्तां में टैक्स न देना पड़े - इन पर किस किस्म के नए अंकुश लग सकते हैं ? इस सन्दर्भ में प्रस्ताव यह है कि सरकार कनाडा मॉडल अपनाएगी अर्थात द्विपक्षीय समझौतों के ऐसे दुरूपयोग को रोकने के लिए वह आयकर अधिनियम में ही तब्दीली करेगी तथा इनमें 'जनरल एण्टी एब्युज रूल्स' शामिल करेंगी। यूं तो सरकार ने 1983 के द्विपक्षीय समझौते की समीक्षा एवम संशोधन के लिए मॉरिशस सरकार के साथ भी वार्ता शुरू की है, लेकिन उसमें विशेष प्रगति नहीं हो सकी है। इस मामले में सरकार को अन्य पेचीदगियों का भी सामना करना पड़ रहा है,क्योकि सरकार इस आशंका से भी चिन्तित है कि अगर अधिक तेजी से अंकुश लगाया जाएगा तो हो सकता है विदेशी वित्ता निवेशक - जो मॉरिशस रूट से यहां पहुंच रहे हैं - अचानक हाथ खींच ले जो कही शेअर बाज़ार के नए संकट को न जन्म दे। वित्ता मंत्रालय के अधिकारियों के मुताबिक कर बचाने के मॉरिशस रास्ते जैसे विभिन्न कदमों का फायदा महज वैश्विक निवेशक ही नहीं बल्कि भारतीय पूंजीपति भी उठाते है ताकि तमाम तरह की वित्ताीय अनियमितताओं को अंजाम दिया जा सके।

इतना ही नहीं कर संग्रहण में सुधार के एक नए चरण में सरकार का ऐसे नियम बनाने पर जोर रहनेवाला है ताकि दुरूपयोग को रोका जा सके, कार्पोरेट कारोबार पर से परदा हटाकर वे किस तरह कर बचाने की कवायद करते हैं इसे जांचने का कर अधिकारियों को अधिकार मिले आदि। ऐसी कम्पनियों को टैक्स में सुविधाओं से इन्कार किया जाएगा जिनके बारे में यह स्पष्ट हो कि वे ऐसे व्यवहार में मुब्तिला हैं ताकि कर न देना पड़े। इसमें न केवल पारदेशीय आदानप्रदान (crossborder transactions) शामिल होंगे बल्कि देश के अन्दर सम्पन्न व्यवहार भी शामिल होगा। कन्ट्रोल्ड फारेन कार्पोरेशन नियमनों के मार्फत सरकार उन देशी कम्पनियों की भी नकेल कस सकेगी जो उन देशों से कारोबार का संचालन करते हैं, जहां कर की दर कम है।

कर चोरी के इस 'मॉरिशस रास्ते' के अलावा वित्तामंत्री ने स्विस बैंक तथा उसी किस्म की यूरोप की अन्य बैंकों में जमा भारतीयों के काले पैसे के सवाल का भी विशेष उल्लेख किया। उनका कहना था कि उन्होंने इस मसले को स्विस सरकार के प्रतिनिधियों के साथ उठाया है और उम्मीद जाहिर की कि इस सन्दर्भ में भी कुछ सार्थक कदम उठाए जाएंगे ।क्या हम उम्मीद करें कि मौजूदा सरकार काले धन के इन रास्तों को वाकई बद करनेवाली हैं या यह मसला अब अगले लोकसभा चुनावों तक के लिए स्थगित हो गया है ?
 

सुभाष गाताड़े