संस्करण: 27जूलाई-2009

 

आतंकवाद की जिन्न को करें बाहर

 

 अंजनी कुमार झा

तंकवाद की आग में झुलस रहे भारत के लिए सुखद खबर है कि 26/11 को मुंबई बम कांड के मुख्य आरोपी कसाब ने अपराध स्वीकार करने के साथ स्वयं को पाक का नागरिक भी बताया। गुटनिरपेक्ष देशों के सम्मेलन के अतिरिक्त अन्य अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर पाकिस्तान की कभी ना कभी हां जैसी ढुलमुल नीति की पोल खुल गई। भारतीय खुफिया एजेंसी व मीडिया द्वारा बार-बार सबूत पेश करने के बावजूद पाक सरकार के आतंक समर्थित रवैये से अमेरिकी प्रशासन भी स्तब्धा है।

हालांकि अब इसका ज्यादा खामियाजा पाकिस्तान को भुगतना पड़ रहा है। आतंकियों के खूनी खेल ने जनता को बेचैन कर दिया है। पाक सेना के तालिबान, लश्कर समेत अन्य आतंकी संगठनों के साथ सांठगांठ जगजाहिद है। 9/11 और 26/11 में भेद करना अनुचित है। ओबामा के शपथ ग्रहण के बाद जगी उम्मीद स्याह नहीं हुई है। विदेश मंत्री हिलेरी के कदमों ने तो यही संदेश दिया है। दिसंबर, 1999 में कंधार विमान कांड से आतंकी हिम्मत और राजग सरकार की बेवकूफी सामने आयी थी। तीन खूंखार आतंकियों अजहर, शेख और झरगर की मुक्ति से सरकार की बड़ी किरकिरी हुई थी। लगातार जन दबाव और मीडिया की सक्रियता से संसद कांड, कारगिल जैसी स्थिति न आने देने के लिए सरकार अब ज्यादा कटिबध्द दिखती हैं। अन्य देशों की भांति प्रत्येक नागरिक के लिए सैन्य प्रशिक्षण से लेकर रक्षा बजट में अप्रत्याशित बढ़ोत्तरी भी एजेंडे में शामिल है। फरवरी, 1999 में वाजपेयी की लाहौर बस यात्रा, जुलाई, 2000 में आगर शिखर सम्मेलन के बावजूद वहीं ढाक के तीन पात जैसी स्थिति बनी रही। वादाखिलाफी का लंबा दौर आज भी जारी है। शर्म अल शेख में गुटनिरपेक्ष देशों के हाल में संपन्न सम्मेलन में पाक ने भारत को फिर आतंकियों के विरुध्द कार्रवाई का आश्वासन दिया। हालांकि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की कूटनीति के कारण कश्मीर का मुद्दा इस बार चर्चा में शामिल नहीं हुआ। 118 मुल्कों की भागीदारी वाले गुट-निरपेक्ष आंदोलन के 15वें शिखर सम्मेलन में डॉ. सिंह ने दो टूक कहा आतंकवाद के खिलाफ स्पष्ट रूप से सख्त रूख नहीं अपनाया गया तो विकासशील देशों के इस समूह की प्रासंगिकता घटनी शुरू हो जाएगी।

आतंकवाद के ढांचे को ढहाये बिना समस्या का अंत मुश्किल है। हर बार की तरह इस बार भी पाक ने आपसी विश्वास और आतंकवाद के सफाये पर कंधो से कंधा मिलाकर चलने की बात जरूर कहीं। हालांकि इस बार लंबे, उबाऊ और बोझिल भाषण नहीं हुए। सभी संबोधन विश्व शांति और समता मूलक विकास पर केंद्रित रहे। आर्थिक और पर्यावरणीय मसलों पर भी चर्चा हुई। इससे पूर्व जी-8 और जी-5 के देशों के सम्मेलन में भी आतंकवाद पर सिंह ने चिंता जताई। वैश्विक मंदी और आतंकवाद पर भारत की भांति अमेरिका समेत अन्य देश भी काफी चिंतित हैं। हिलेरी क्लिंटन ने स्पष्ट तौर पर कहा कि उनका देश आतंकवाद के खिलाफ की जा रही पाकिस्तानी कार्रवाईयों पर नज़र रख रहा है। आतंकियों का नेटवर्क सभी के लिए खतरा है। इससे निपटने की जिम्मेदारी हर देश की है। लगातार हो रही किरकिरी के बाद पाकिस्तान ने शायद पहली बार छत्तीस पृष्ठों के अपने जवाब में कसाब और मुंबई कांड के दूसरे आरोपियों के पाकिस्तानी होने की बात कबूली। हूजी, लश्कर-ए-तैयबा समेत कई अन्य इस्लामी आतंकी संगठनों के भयावह रूप के लिए पाक सरकार को विश्व बिरादरी में अपमान सहना पड़ा है। भारत कभी नहीं चाहेगा कि आतंकवाद की मूल वजह में कश्मीर छुपा हो। बलूचिस्तान की गड़बड़ियों में भारत को घसीटने की चाल को विफल कर दिया गया। इसके बावजूद पाकिस्तान के शासक जरदारी, गिलानी भी जिया-उल-हक, भुट्टों, याह्या खां, मुशर्रफ की तरह दोहरी चालें चल रहे हैं। मुशर्रफ ने कहा कि लश्कर और जैश-ए-मोहम्मद सब कश्मीर के कारण हैं। डेविल्स एडवोकेट, कार्यक्रम में पूर्व राष्ट्रपति के ये बयान सदमें पूर्ण हैं। बार-बार तालिबान आतंकी को मजबूत करने की बात कहकर भारत-अमेरिका को ब्लैकमेल किया जा रहा है। आतंकवाद और कश्मीर से मुंह चुराते पाकिस्तानी शासक अब ब्लूचिस्तान के असंतोष और अलगाववाद के लिए भारत को दोषी ठहरा रहे हैं।

पूरी दुनिया में कुख्यात हो चुके पाकिस्तानी शासक को शायद यही विकल्प दिखलाई पड़ रहा है। हवाना में मनमोहन सिंह जब मुशर्रफ से मिले तो उन्होंने पाकिस्तान को भी आतंकवाद से पीड़ित देश घोषित करने की बात कहीं, तो जनरल पीछे हट गये। उस समय आतंकवाद से लड़ने के लिए एक साझा तंत्र बनाने पर सहमति बनी थी। किंतु कुछ हफ्तों बाद ही पाकिस्तान ने आतंकवाद और स्वतंत्रता संघर्ष में अंतर करने की बात कहकर जता दिया था कि कश्मीर में होने वाली आतंकी घटनाओं के प्रति उसका क्या रूख है। जरदारी-गिलानी की सरकार ने पाक की सुरक्षा और विदेश नीति में जो सूक्ष्म परिवर्तन किया है, उसे भी ध्यान में रखने की आवश्यकता है। भारत का हौव्वा खड़ा कर लश्कर-ए-तैयबा के संरक्षक संगठन जमात-उद-दावा के प्रमुख हाफिज सईद की रिहाई ने पाक की न्यायपालिका में आतंकी संगठनों की सेंध को जग जाहिर कर दिया। उत्तर सीमा प्रांत और वजीरिस्तान में आतंकी संगठनों के खिलाफ लड़ाई केवल दिखावा है। शंघाई सहयोग संगठन को शिखर बैठक के दौरान येकातेरिनबर्ग में मनमोहन सिंह ने जरदारी से भरोसा दिलाने की बात कहीं थी। जिसे नहीं खूले तौर पर कहा गया। गिलानी भी मुशर्रफ के ही अनुगामी हैं। वर्षों गुजरे, हजारों करोड़ पानी में बहें किंतु आतंकवाद का जिन्न हाथ नहीं लगा। एक ध्रवीय, बहुधुरवीय, द्विध्रवीय विश्व, गुटनिरपेट (निर्गुट) देश, जी-8 आदि के सम्मेलनों का निष्कर्ष शून्य ही निकलता रहा। आत्मसम्मान, आत्मनिर्भरता को बनाये रखे बिना भला आतंकवाद को कैसे कुचला जा सकता है। इच्छाशक्ति की कमी और लाशों पर चल रही राजनीति से निर्भीक और प्रभुता संपन्न देश की कल्पना करना आकाश कुसुम है।

  

अंजनी कुमार झा