संस्करण: 27जूलाई-2009

 

खामोश परिंदों का व्यापार

 

 

  डॉ. महेश परिमल

क्या आप जानते है कि विश्व में जो गैरकानूनी व्यापार धांधो हैं, उसमें ड्रग और शस्त्र के बाद किसका नम्बर आता है? जी हाँ, खामोश पक्षियों का। विश्व में पक्षियों की संख्या लगातार घटती जा रही है। आखिर कम कैसे न हो, करीब 25 अरब रुपए का अवैधा कारोबार पक्षियों के नाम ही होता है। पक्षियों के नाम पर होने वाले इस विश्व स्तरीय गोरखधांधो में हजारों लोग लगे हुए हैं। ये न तो परिंदों की जबान समझतें हैं, न ही उनकी संवेदनाओं से ही इनका वास्ता है। खामोश परिंदों की तस्करी भी अजीबो-गरीब तरीके से होती है। असम में तो पक्षियों का हाट लगता है। आश्चर्य की बात यह है कि सरकार ने अभी तक इस दिशा में कोई गंभीर कदम नहीं उठाया है। जिस देश में मानव तस्करी नहीं रोकी जा सकती, वहाँ जानवरों और पक्षियों की क्या बिसात?

हाल ही में मुंबई के सहारा अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट पर इथियोपियन एयरलाइंस से एक बड़ा पार्सल आया। यह पार्सल किसी ने एडीस अबाबा से बुक कराया था। दो फीट लंबे इस बेग से दुर्गंध आ रही थी। इससे एयरपोर्ट कर्मचारियों को शंका हुई। तुरंत ही सोसायटी फॉर प्रिवेंशन ऑफ फेकल्टी टू एनिमल (एसपीसी) को फोन किया गया। वहाँ से कुछ अनुभवी कर्मचारी आए, बेग खोला गया। बेग खुलते ही सबकी ऑंखें चौंधिया गई। बेग से दस खूबसूरत भूरे रंग के अफ्रीकन तोते निकले। इन दस तोतों में से 5 की मौत हो चुकी थी। बाकी की हालत गंभीर थी। इन तोतों को परेल की वेटनरी हास्पिटल ले जाया गया। कई दिनों तक खुराक न मिलने और घुटन के कारण इन मूक पक्षियों की हालत बहुत ही खराब थी। इलाज के दौरान 5 में से तीन तो अस्पताल में ही मर गए। दो तोतों को बड़ी मुश्किल से बचा लिया गया। अंतरराष्ट्रीय बाजार में इन तोतों की कीमत 25 से 40 हजार रुपए है। हमारे देश से हर साल इस तरह से डेढ़ लाख पक्षियों की तस्करी की जाती है। मुंबई इस तस्करी का मुख्य अव है।

विश्व में पक्षियों की कुल 12 हजार प्रजातियाँ पाई जाती हैं। इनमें से 300 प्रजातियाँ ऐसी हैं, जिनका गैरकानूनी रूप से व्यापार किया जाता है। इसके पीछे अनेक कारण है। विश्वभर के हजारों शौकीन पक्षी पालते हैं। केवल इसी शौक के कारण हजारों पक्षी शिकारियों के जाल में फँस जाते हैं। कई लोग अपनी जीभ के स्वाद के कारण पक्षियों का भक्षण करते हैं। अब इन लाशाहारियों को मुर्गे और बतख के मांस में उतना मजा नहीं आता, इसलिए ये लोग अब सारस और मोर का मांस खाने लगे हैं। ऐसे लोगों की भूख शांत करने के लिए हर वर्ष करोड़ों पक्षियों को मारा जाता है। यूरोप और अमेरिकी देशों में एशिया और अफ्रीका के दुर्लभ पक्षियों का बड़ा बाजार है। ब्रिटेन हर वर्ष हजारों पक्षियों का आयाता करता है। ब्रिटेन का कानून ऐसा है कि जिन पक्षियों को पिंजरे में कैद कर पाला जा सकता है, उन पक्षियों का आयात किया जा सकता है। अब यह कहना मुश्किल हे कि किस पक्षी को जंगल से पकड़कर लाया गया है और किसे पिंजरे में पालकर लाया गया है। ब्रिटेन ने 1995 से 2000 के बीच 23 जार 930 पक्षियों का आयात किया था। ब्रिटेन से जिन देशों में पक्षियों का आयात किया जाता है, उसमें भारत, चीन और अफ्रीकन देश हैं। एक अंदाज के मुताबिक ब्रिटेन जितने पक्षियों का आयात करता है, उसमें से 88 प्रतिशत जंगल से शिकारियों द्वारा पकड़ा जाता है। पूरे यूरोप में जितने पक्षियों का आयात किया जाता है, उससे ब्रिटेन का आयात बढ़ जाता है।

पक्षियों का शिकार करने के लिए शिकारियों द्वारा विभिन्न तरीके इस्तेमाल में लाए जाते हैं। इसमें से कई तरीके तो बहुत ही ज्यादा कूरर हैं। कई शिकारी अपनी आजिविका के लिए जंगल में पक्षियों को फँसाने के लिए पेड़ों पर जाल बिछा देते हैं। बड़े पक्षियों के लिए पिंजरा छोड़ देते हैं। इन पिंजरों में पक्षियों की प्रिय खुराक रख देते हें। कई शिकारी पेड़ों के ऊपर डालियों पर बर्ड लाइम के रूप में जाना जाने वाला गोंद जैसा चिकना पदार्थ लगा देते हैं। इस डाली पर बैठने वाला पक्षी बाद में उड़ नहीं पाता। वह जितनी कोशिश करता है,उतना ही उसमें चिपकता जाता है। पक्षियों को इतने कू्रर तरीके से पकड़ा भी जाता होगा, इसका अहसास भी पक्षी पालकों और पक्षीभक्षियों को नहीं होगा।

हमारे देश में हजारों पक्षी तो केवल पिंजरे की कैद में ही दम तोड़ देते हैं। यही नहीं कई बार शिकारी जाल बिछाकर भूल जाते हैं, पक्षी उसमें फँसकर ही अपना दम तोड़ देते हैं। यदि शिकारी पक्षियों को जंगल से ले भी आएं, तो तुरंत ही उन्हें ग्राहक नहीं मिलते। शिकारियों के पास पक्षियों को खुराक भी ठीक से नहीं मिलती, इसलिए यहाँ भी पक्षी अपनी जान नहीं बचा पाते। एक ही पिंजरे में आवश्यकता से अधिक पक्षियों को कैद कर दिया जाता है। पिंजरे में पक्षी आपस में झगड़ते भी हैं। यहाँ भी बलशाली पक्षी अपने से कमतर पक्षी को मार डालता है। इस तरह से जितने पक्षी विमान या स्टीमर से बाहर भेजे जाते हैं, उससे अधिक पक्षियों की मौतें तो इस तरह से हो जाती हैं।

भारत से पक्षी विदेशों में निर्यात करने की प्रवृत्ति सिकंदर के समय से चली आ रही है। भारत के एक महाराजा ने सिकंदर को बोलता हुआ तोता भेंट में दिया था। सिकंदर को यह तोता इतना भाया कि वह उसे ग्रीस ले गया। इस तोते को सिकंदर ने अपने गुरु एरिस्टोटल (अरस्तू) को भेंट में दिया। जो तोता सिकंदर भारत से ले गया था, आज उसे एलेक्जांड्रियन पेराकीट के रूप में जाना जाता है। आज भी अरब के शेख इस प्रजाति के तोतों को भारत से ले जाते हैं। अरब शेखों का दूसरा शौक बाज पक्षी है, जिसे वे अन्य पक्षियों के साथ लड़ाने के लिए ले जाते हें। उनके इस मनोरंजन में लाखों पक्षियों की जान चली जाती है।

विश्व बाजार में जिन पक्षियों का निर्यात किया जाता है, उसमें मुख्य हैं, बुलबुल, मैना, तोता, बाज आदि। पालतू पक्षियों में लव बर्ल्ड की भी विदेशों में काफी माँग है। यह कहा जाता है कि जो पक्षी जितना सुंदर होता है, उसकी हत्या की संभावना उतनी ही अधिक होती है। उत्तार भारत में हंस, बतख, लेङ्क्षमगो का बाजार लगता है। एक बाजार में चार महीनों में करीब 2 हजार पक्षियों को खरीदा-बेचा जाता है। भारत में पक्षी पकडने का सीजन जनवरी से जून तक माना जाता है। असम के गुवाहाटी में ब्रह्मपुत्र नदी के किनारे पक्षियों का बहुत बड़ा बाजार लगता है। यहाँ से बेचे गए पक्षी सुदूर मुंबई तक पहुँचाए जाते हैं।

भारत में पक्षियों केअवैधा व्यापार के संबंधा में अब तक का सबसे बड़ा शोध शायद बाम्बे नेचरल हिस्ट्री सोसायटी से जुडे अबरार अहमद ने किया है। शिकारियों को उनके काम की गंधा तक न मिले, इस तरीके से इस काम को अंजाम दिया गया। देश के अनेक जंगलों की खाक छानने के बाद उन्होंने जो रिपोर्ट दी, वह चौंकाने वाली है। अबरार ने अपनी ऑंखों के सामने दो लाख पक्षियों को पकड़कर बेचते देखा है। अपने इस रिसर्च को अबरार अब पी-एच.डी के रूप में प्रस्तुत करने की योजना बना रहे हैं।

पक्षियों की तस्करी रोकने के लिए 1973 में अमेरिका के वाशिंगटन में विश्व के 80 देशों के प्रतिनिधियों की एक बैठक हुई थी। इस बैठक में पक्षियों की तस्करी रोकने के लिए कई नियम-कायदे बनाए गए। भारत ने भी इस समझौते पर हस्ताक्षर किए है। इस समझौते को कन्वेशन ऑफ इंटरनेशनल ट्रेंड इन एंडेंजर्ड स्पीसीज (सीआईटीईएस) के नाम से जाना जाता है। इसके द्वारा 6 पक्षियों की जातियों को रेड डेटा लिस्ट में रखा है। रेड डेटा लिस्ट का मतलब होता है कि ये जातियाँ अब कभी भी विलुप्त हो सकती हैं। एक शोधा में यह बात सामने आई है कि पूरे विश्व में दो करोड़ पक्षी पकड़े जाते हैं, इसमें से केवल 35 लाख पक्षी ही बाजार तक पहुँच पाते हैं, शेष 65 प्रतिशत पक्षियों की मौत हो जाती है। पक्षियों के इस गैरकानूनी व्यापार का ऑंकड़ा 25 अरब अमेरिकन डॉलर तक पहुँचता है।

इस तरह से देखा जाए तो कई बार पक्षियों की मौत हमारी नासमझी के कारण होती है। अंधविश्वास है कि कौओं की टांग पर धागा बाँधाकर उन्हें छोड़ दिया जाए, तो शगुन होता है। इसीलिए लखनऊ में एक निश्चित दिन कौओं का बाजार लगता है। दूसरी ओर तांत्रिक विद्या में भी पक्षियों की खून की आवश्यकता पड़ती है। कहीं कबूतर लड़ाने का शौक हे, तो कहीं मुर्गे। तांत्रिक उल्लुओं का शिकार कर उनका उपयोग तंत्र विद्या के लिए करते हैं। इस तरह से खामोश परिंदों का गलत इस्तेमाल विभिन्न तरीके से हमारे देश में हो रहा है। लेकिन इस दिशा में ऐसा कुछ भी नहीं हो रहा है, जिससे लगे कि हमारा देश पक्षियों के लिए भी चिंतित है।
 


  डॉ. महेश परिमल