संस्करण: 27जूलाई-2009

 

पर्यावरण पर्यटन-पर्यटन का नया स्वरूप
 

 

 स्वाति शर्मा

   ज की भागती दौड़ती जिंदगी में जहाँ मानव मशीन की तरह सुबह से शाम तक लगा रहता है, उसे अपने व अपनों के लिए समय ही नहीं रहता, मनोरंजन के नाम पर उसके जीवन में कुछ नहीं रहता, अत: उसे जीवन एकरस व तनावों से परिपूर्ण लगने लगता है। बच्चे भी इस प्रतियोगिता के युग में पढ़ाई में बुरी तरह व्यस्त रहते हैं। इस भागती दौड़ती जिंदगी में विश्राम के क्षणों का इंतजार बच्चों और बड़ों दोनों को होता है और यदि इस समय पर्यटन का कार्यक्रम बनाया जाए तो सोने पे सुहागा हो जाता है। पर्यटन से बहुत से सकारात्मक परिणाम दृष्टिगोचर होते हैं। इससे सामान्य ज्ञान में तो वृध्दि होती है, खान-पान, पहनावा आदि के विशेष में भी बहुत कुछ जानने को मिलता है। हमें पता लगता है कि बाहर भी एक रंगीन दुनिया है। यदि हम पर्यटन के लिए ऐसी जगहों पर न जाते तो हमें कैसे ज्ञान होता इन सब बातों का ?

पर्यटन से मन आल्हादित होकर रोमांच से भर उठता है और हम प्रकृति के और अधिक निकट आ जाते हैं। जिस परिवार में पति-पत्नी दोनों कामकाजी हों तो पर्यटन पर जाने के समयांतराल में वे बच्चों के साथ पूरा-पूरा समय व्यतीत करते हैं, जिससे वे एक दूसरे को भावनात्मक स्तर पर अधिक निकट पाते हैं, इससे संबंधों में प्रगाढ़ता आती है तथा पारिवारिक वातवरण सुखमय हो जाता है। पर्यटन से स्वास्थ्य भी अच्छा बना रहता है।

यह तो हुआ पर्यटन का धनात्मक पहलू परंतु पर्यटन का एक अत्यंत दुखद व ऋणात्मक पहलू और भी है। हम अपने घूमने-फिरने व मौज-मस्ती में अपने पर्यावरण की पूर्णत: अवहेलना कर बैठते हैं। हम प्राकृतिक स्थानों का आनंद तो लेते हैं,परंतु उनकी सुरक्षा व संतुलन के लिए खतरा उत्पन्न कर देते हैं। इस समस्या के समाधन के लिए पर्यटन से जुड़ा एक नया शब्द व्यवहार में आया है-पर्यावरण पर्यटन।

पर्यावरण पर्यटन का आशय है पर्यटन का प्रबंधन तथा प्रकृति का संरक्षण इस तरीके से करना कि एक तरफ पर्यटन व पारिस्थितिकी की आवश्यकताओं के रोजगार की जरूरतों की भी पूर्ति होती रहे। हम सभी जानते हैं कि पर्यटन आज विश्व का सबसे बड़ा उद्योग बन चुका है जिसका वार्षिक कारोबार 34 लाख डॉलर का है। कुछ देशों में तो यह विदेशी मुद्रा का सबसे बड़ा स्त्रोत है। पर्यटन की सुविधओं, स्थानीय समुदाओं के आर्थिक विकास व प्राकृतिक संसाधनों एवं जैव विविधता के संरक्षण के मध्य संतुलन बनाए रखना वास्तव में संरक्षण के मध्य संतुलन बनाए रखना वास्तव में संघर्ष का काम है। इस दिशा में पर्यावरण पर्यटन एक प्रभावशाली तरीका हो सकता है। पर्यावरण पर्यटन की कोई मान्य परिभाषा नहीं है। यह प्रकृति आधरित पर्यटन है जिसमें पर्यटक का मुख्य उद्देश्य प्रकृति के साथ-साथ प्राकृतिक क्षेत्रों की परंपरागत संस्कृति का अवलोकन व मूल्यांकन करना होता है। यह प्राकृतिक व सामाजिक-सांस्कृतिक पर्यावरण पर पड़ने वाले नकारात्मक प्रभावों को कम करता है। इसके अलावा पर्यावरण पर्यटन द्वारा स्थानीय समुदायों को आर्थिक लाभ होता है। उनके लिए वैकल्पिक रोजगार तथा आय के अवसरों की उत्पत्ति होती है। सबसे बड़ी बात यह है कि इसके द्वारा स्थानीय नागरिकों तथा पर्यटकों दोनों के बीच प्राकृतिक व सांस्कृतिक संसाधनों के संरक्षण के लिए जागरूकता बढ़ती है।

पर्यावरण पर्यटन के बढ़ते महत्व का प्रमाण यह है कि यह एक ऐसा क्षेत्र हैं जिसमें आर्थिक विकास की प्रचुर संभावनाएं तो हैं ही साथ ही यदि इसे उचित तरीके से नियोजित, विकसित व प्रबंधित किया जाये तो यह प्राकृतिक पर्यावरण के संरक्षण का शक्तिशाली उपकरण साबित हो सकता है। संयुक्त राष्ट्र संघ ने वर्ष 2002 को अंतर्राष्ट्रीय पर्यावरण पर्यटन वर्ष घोषित किया था। भारत में चल रहे पर्यावरण पर्यटन अभियान में अधिक से अधिक पर्यटन संगठन शामिल हो रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र घोषणा पत्र से प्रभावित होकर भारत सरकार ने भी एक नई पर्यटन नीति तैयार की है।

पर्यावरण पर्यटन को प्रभावी बनाने के लिए सरकार के साथ-साथ पर्यटकों की भी कुछ नैतिक जिम्मेदारी बनती है। पर्यटकों को नष्ट न होने वाली सभी वस्तुओं जैसी खाली बोतलें, टिन, प्लास्टिक बैग इत्यादि को अपने साथ वापस ले आना चाहिए। इन्हें यहाँ-वहाँ न फेंक कर नियत कूड़ा पात्रों में ही फेंकना चाहिए। इन्हें अनियंत्रित रूप से कहीं भी फेंक देने से ये उस स्थान की सुंदरता नष्ट करने के साथ-साथ मृदा प्रदूषण को बढ़ावा देते हैं। इसके साथ ही पवित्र स्थलों, मंदिरों व स्थानीय संस्कृति की पवित्रता का ध्यान रखना चाहिए। धवनि-प्रदूषण फैलाने से बचना चाहिए। फोटोग्राफ लेते समय लोगों की निजता का सम्मान करना चाहिए। फोटोग्राफ लेने से पूर्व उचित व्यक्ति से अनुमति प्राप्त कर लेना चाहिए। इसके साथ ही बहुत महत्वपूर्ण बात यह है कि स्थानीय वनस्पति या जंतु विविधता को काट कर बीज रूप में या जड़ सहित लाने का प्रयास नहीं करना चाहिए। झीलों या नदियों में नहाते समय या कपड़ा धोने के लिए डिटर्जेंट जैसे प्रदूषणों का प्रयोग नहीं करना चाहिए।

आर्थिक विकास एवं पर्यावरण संरक्षण के एक उपकरण के रूप में पर्यावरण पर्यटन की क्षमता के उपयोग के लिए हमें मालदीव की प्रगति से सीख लेनी चाहिए। पर्यटन मालदीव का प्रधन उद्योग है और वहाँ के लोगों ने अपनी प्रवाल भित्तियों के संरक्षण के लिए उचित साधन व तरीका अपनाया है। सभी रिसॉर्टों एवं होटलों के लिए यह अनिवार्य बना दिया गया है कि वे अपने कचरे का निस्तरण करें, जल संरक्षण करें तथा अपशिष्ट पदार्थों का पुनर्चक्रण करें। उम्मीद है कि भारत सरकार भी देश के बेहतर भविष्य के लिए पर्यटन व पर्यावरण संबंधी सभी समस्याओं को दूर करेगी।


 स्वाति शर्मा