संस्करण: 27अप्रेल-2009

 

न टला संकट, न जगी उम्मीद

 

 


अंजनी कुमार झा

      जबूरन पाकिस्तान के राष्ट्रपति जरदारी ने अपनी ताकत को कम कर नवाज शरीफ के आगे भले ही आत्मसमर्पण कर दिया हो, लेकिन अंदर ही अंदर कई तरह के उबाल ने सियासी हलकों में कई मायने में गरमाहट पैदा कर रखी है।

मुख्य न्यायाधीश इफ्तिखार चौधारी की बहाली के बाद टला संकट अब दूसरे प्रकार के संकट के रूप में पैदा हो रहा है। स्वात में शरीयत कानून लागू कर पाक सरकार ने कट्टरपंथी तालिबान के सामने घुटने टेक दिये। तालिबानियों की गुर्राहट और धामाकों की लंबी फेहरिस्त ने अमन चैन को आग की लपटों में कैद कर दिया है। धू-धू कर जल रहे पाकिस्तान तालिबानियों के आगे विवश है। अमेरिकी धामकी और आर्थिक मद्द बंद करने की चेतावनी से पूर्व ही पाकिस्तान अनाथ व विकलांग हो गया है। इसे लागू करने पर हालात दयनीय हो जाएंगे। दूर से भले ही हमेशा लगता हो कि लोकतंत्र की पदचाप से सुकून भरा माहौल मिल गया लेकिन यह वैसा ही प्रतीत होता रहा जैसे विवाह के मौके पर छिड़के इत्र का असर थोड़े समय के लिए केवल उसी जगह पर रहता है। 16 महीने बाद चौधारी की वापसी हुई। गुलाब की पंखुड़ियों से उनका स्वागत हुआ। मुशर्रफ ने 3 नवंबर 2007 को आपातकाल लागू कर उन्हें बर्खास्त कर दिया था। उनके इस कदम का विरोधा करने पर वे नायक बन गये थे। नवाज शरीफ की यह पहली और बड़ी मांग थी कि जस्टिस चौधारी की बहाली हो। पूर्व के सियासतदारों की तरह हश्र से बचने के लिए आसिफ अली जरदारी ने घुटने टेके। विशाल रैली की धामकी देकर शरीफ ने जनता को गोलबंद किया और अब उनकी लोकप्रियता का ग्राफ आसमान को छू रहा है। जनता का समर्थन प्राप्त चौधारी से भी कई उम्मीदें हैं। न्यायपालिका में अव्यवस्था, भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद को दूर करना एक बड़ी चुनौती हैं।

चौधारी को अदालत के फैसले लागू करने वाली एजेंसियों के समर्थन के लिए भी नाजुक संतुलन बनाकर चलना होगा। लंबित मामलों को निपटाना भी टेढ़ी खीर हो गयी है। मुशर्रफ पर देशद्रोह का मुकदमा और जरदारी पर लगे भ्रष्टाचार के आरोप का निपटारा किस तरह से होगा इस पर पूरे देश की नज़र रहेगी। पेट्रोल की कीमत कम करने से लेकर मुद्रा के अवमूल्यन में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेने वाले चौधारी के लिए दूसरी पारी खेलना ज्यादा कंटक भरा है। 2013 के अंत तक के कार्यकाल का लंबा और घुमावदार रास्ते को बिना आरोप के पूरा करना काफी कठिन है तब जब आतंकवाद और अमेरिका की जबड़ों में पाक कराह रहा है। बुरी तरह इस्लामी कट्टरपंथियों के चंगुल में फंसे होने के कारण सत्ताधीशों पर काफी दबाव है। पायलट रहित अमेरिकी विमानों द्वारा अंधाधुंधा गोलाबारी और इस्लामी कट्टरपंथियों द्वारा दहशत के लिए विस्फोट कराने की श्रृंखलाबध्द साजिश में सैकड़ों लोगों की जानें जा रही है। ऐसे में पाक की सत्ता केवल नाम की रह गयी है। मुल्लाओं का दबाव है कि सत्ता में बड़े लोग अमेरिका की खिलाफत करें। जरदारी-शरीफ को भय है कि मुशर्रफ की तरह वे भी बाहर हो जाएंगे या बेनजीर की तरह मारे जाएंगे। स्थिति इतनी नाजुक हो गयी है कि पाक की उत्तर-पश्चिमी सीमा क्षेत्रों में तालिबानियों की सत्ता है और वह इसे विस्तारित करने के फिराक में है। अमेरिका उसी मार्ग से अफगानिस्तान जाने का रास्ता बनाने के लिए बम वर्षा कर रहा है। अमेरिका की बौखलाहट का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि सीएनएन से बातचीत में अमेरिकी उपराष्ट्रपति विडेन ने कहा कि ओबामा प्रशासन इस बात पर चिंतित है कि बुश प्रशासन के दौरान अल-कायदा पाकिस्तान और अफगानिस्तान की सीमा पर स्थित पहाड़ी इलाकों में खुद को संगठित करने में कामयाब रहा। उन्होंने कहा कि हम अफगानिस्तान में अल-कायदा और तालिबान को परास्त करने के लिए अफगानिस्तान में और अमेरिकी सैनिक भेजे जाएंगे।

मीडिया पर लगातार तालिबानियों के हमले के बावजूद आतंक व अत्याचार की खबरों से यह साफ हो रहा है कि वहां की सियासत आईएसआई और सेना का इस्तेमाल कर आतंकियों को मज़बूत कर रही है। भारत को समस्याग्रस्त करना उनका मूल मुद्दों से भटकाना ही बड़ा उद्देश्य है। टूट के कगार पर पाकिस्तान में अब सेना व आईएसआई के साथ न्यायपालिकों को भी अपनी तरफ करने की होड़ चल पड़ी है। इस्लामाबाद और लाहौर की सड़कों पर शरीफ के समर्थन में और जरदारी और फौज के विरोधा में उतरे लोगों ने यही संदेश प्रसारित कराया कि जस्टिस चौधारी की बहाली शरीफ की जीत का द्योतक है, आर्थिक दिवालियापन और सत्ता और रूग्ण हो रहे समाज को दुरूस्त करने की चिंता किसी को नहीं है। दर्द बढ़ने पर भारत का भूत दिखाकर सभी को एकजुट कर अपनी-अपनी राजनीति जारी रखी जाती है। पर अमेरिका के खौफ को रोकना इनके बुते से बाहर है। जेहाद के नाम पर कट्टरपंथी हिंसक तत्व पाकिस्तान की संप्रभुता को निगल रहे हैं। इसे भी रोक पाना तो दूर विरोधा करना भी सियासी दलों की बस की बात नहीं। जेहाद के नाम पर खूनी खेल और अमेरिका की साम्राज्यवादी नीति इराक, अफगानिस्तान के बाद पाकिस्तान को भी खोखला और नंगा कर देगा। पाकिस्तान की सरकार और आवाम को भारत सहित दक्षिण-एशियाई देशों के साथ बेहतर संबंधा बनाने चाहिए, ताकि नासूर होती समस्याओं का सामूहिक हल निकाला जा सके। पूरी दुनिया में इस्लामिक आतंकवाद बनाम अमेरिकी साम्राज्यवाद का संघर्ष जारी है। ऐसे में विकासशील देशों को विशेष रूप से एकजुट होकर अपनी संप्रभुता को बनाते हुए विकास की डगर पर चलने की आवश्यकता है। उन्माद के साथ हथियार और मादक द्रव्यों का व्यापार व तस्करी ने सामरिक संकट खड़ा कर दिया है। किसी भी देश का तीन चौथाई धान इसी की रक्षा में व्यय हो रहा है। जो फिजूल है।

 


अंजनी कुमार झा