संस्करण: 27अप्रेल-2009

 

संदर्भ:- मई दिवस 1 मई 2009
वैश्वीकरण,मंदी और श्रमिक आंदोलन


 

 

डॉ. सुनील शर्मा

वैश्विक मंदी का दौर है, बहुराष्ट्रीय निगमों और कंपनियों पर मंदी का शिकंजा कसता जा रहा है। जैसे-जैसे आर्थिक मंदी बढ़ रही है, वैसे ही कर्मचारियों की छंटनी की रफतार भी बढ़ रही है,सारी दुनियॉ में अब तक करोड़ो लोग बेरोजगार हो चुकें है। निगमों और कंपनियों में कार्यरत कर्मचारियों को हर वक्त यह भय हावी है कि वे किसी भी समय बेरोजगारों की कतार में शामिल किए जा सकते हैं।

छंटनी के भय से कर्मचारियों में अवसाद और आत्महत्या की प्रवृति बढ़ रही है।लेकिन दुनियॉ भर में कामगारों पर यह संकट पहली बार आया हो ऐसा भी नहीं है, क्योंकि सच तो यह है कि कामगार अपने अस्तित्व से हमेशा जूझते रहें है, बेकारी गरीबी और शोषण का साया इन पर सदैव रहा है। शायद वैश्विक उदारीकरण की शुरूआत ही कामगारों के हितों के पर संकटजनक रही। उदारीकरण ने कर्मचारियों को मशीन में तब्दील कर दिया,आर्थिक बिषमता को बढ़ाया और सारी विश्व व्यवस्था को परिवर्तित कर दिया है। इससे गरीबी का सागर फैल रहा है, कुछेक अमीरों से विश्व व्यवस्था संचालित हो रही है। एक तरफ पूँजीपतियों की कंपनियों, कारखानों और निगमों को चलाने वाले प्रशासकों अर्थात सी.ई.ओ. को भारी भरकम राशि और सुविधाओं का पैकेज है, सोचने की बात है कि वैश्विक मंदी भी इनका पैकेज कम नहीं कर पाई। तो दूसरी ओर इनमें काम करने वाला यांत्रिक बन चुका विशाल मानव समूह है जो सिर्फ काम करता है, कमाई करता है, गंदगी में रहता है और अपनी इस अल्प कमाई से रोटी खाकर बचा हिस्सा देश के सुदूर हिस्से में रह रहे परिवारों को मनीऑर्डर कर देता है। यह मानव समूह सिर्फ काम ही नहीं करता बल्कि उसे कल की भी चिंता है कि कल उसे कंपनी में काम मिलेगा कि नहीं? क्योंकि कहीं उसकी कंपनी का दिमागदार और चतुर सी.ई.ओ. अपने उत्पादन को आउटसोर्सिंग के माधयम से कम मजदूरी पर कराने का तरीका सोच लेगा तो उसकी छुट्टी और वह फिर बेरोजगार,क्योंकि चतुर सी.ई.ओ को मंदी का असर कम करना है ।

वास्तव में आज मजदूर के मायने में सिर्फ हथौड़ा उटाने वाला या गेंती से मिट्टी खोदने वाला अनपढ़ आदमी ही शामिल नहीं है बल्कि पढ़े-लिखे तकनीशियन, इंजीनियर, कलाकार और शिक्षक सभी शामिल हैं।

सारे लोग काम की तलाश में हैं। वो अपने बायोडाटा तैयार कर कंपनियों एवं संस्थाओं के दरवाजों पर कतार लगाये खड़े हैं। ये उम्र के किसी भी पड़ाव मे बेरोजगार होकर काम की तलाश में चौराहे पर खड़ा होने मजबूर हैं। वास्तव में यह भूमंडलीकरण का यथार्थ है, जिसने बड़े सुनियोजित ढ़ंग से काम करने वालों के बीच वर्ग भेद पैदा किये, मजदूर की परिभाषा ही बदल डाली। दिनों और घंटों के आधार पर काम करने के लिए लोगों को तैयार किया, वास्तव में इस व्यवस्था ने दुनिया के मजदूर एक हों का पवित्र नारा बड़े ही सुनियोजित ढ़ंग से निस्तेज करने का कुत्सित प्रयास किया है,सरकारी संस्थानों ने भी इसका बेजा फायदा उठाया है,यहाँ भी शोषण के नये रास्ते तलाशें है,समान कार्य समान वेतन की बात अब पुरानी हो गई है इसलिये लोककल्याण का दावा करने वाली सरकारें इसे भूलना चाहती है,मसलन पद नाम बदलो काम कराओ और बेकारों की जमात में छोड़ दो का सूत्र सरकारी संस्थानों ने भी रट लिया है। कहीं दैनिक वेतनभोगी कामगार हैं तो कहीं संविदा आधारित घंटों के हिसाब से काम करने वाले लोग, शिक्षा जैसे पवित्र क्षेत्र में गेस्ट फैकल्टी जैसा शिगूफा खोजा गया है।सेवाशर्तो को पुर्नपरिभाषित किया जा रहा हैं

हमारे देश में भी आर्थिक उदारीकरण को आरंभ हुए डेढ़ दशक पूर्ण हो चुका है, जिससे देश का श्रमिक वर्ग गंभीर चुनौतियों का सामना कर रहा है। वैश्विक मंदी का भी असर पड़ने लगा है, जिससे बेकारी बढ़ रही है। नई नीतियों की वजह से रोजगार के अवसरों में बड़े पैमानों पर कमी आई है, काम करने की परिस्थितियां पहले से बिगड़ गई है, श्रमिकों के मूलभूत अधिकारों पर विपरीत असर पड़ा है।लेकिन वैश्वीकर के इस दौर में जब काम करने वालों की संख्या बढ़ी है।ऐंसे में अब श्रमिक वर्ग एक सीमित दायरे में नहीं रह गया है बल्कि देश की काम करने योग्य अधिकांश जनता अब श्रमिक है। अत: इनके हितों की रक्षा देश के लोकतंत्रात्मक ढांचे को सुरक्षित रखना जरूरी है। आज जब श्रमिकों के कार्य की रूप रेखा में बदलाव आ रहा है। उनकी निपुणता को नये ढंग से प्रस्तुत किया जा रहा है। तब श्रम संगठनों को अपनी संरचना और रणनीति में परिवर्तन लाने की जरूरत है, जिससे इस नये परिवेंश में श्रमिकों के हितो की रक्षा हो सके, उनके मौलिक अधिकार सुरक्षित रह सकें। आज का श्रमिक वर्ग जीविका के प्रति सजग और व्यक्तिवादी है, उसमें वर्गचेतना का अभाव है एवं एकाकीपन की प्रवृत्तियां उभर कर सामने आ रही हैं। उदारीकरण ने संगठित क्षेत्रों को प्रभावहीन किया है। क्योंकि संगठित क्षेत्रों के मजदूर अपने हितों के प्रति ज्यादा संवेदनशील रहते हैं। हालांकि उदारीकरण के पहले भी श्रमिक संघों का विस्तार सिर्फ संगठित क्षेत्रों तक ही सीमित रहा है। आज देश के कुल कार्य बल का महज 20 प्रतिशत श्रमबल संगठित क्षेत्र से संबध्द है शेष 80 प्रतिशत असंगठित क्षेत्र में कार्य कर रहा है। आज जरूरत इस बात की है कि संगठित एवं असंगठित क्षेत्र के मजदूरों को एकसाथ लाने के प्रयास किये जायें। श्रम संघ आंदोलनों का प्रसार कारखानों की सीमा से मुक्त होकर सेवाक्षेत्र और खेतों तक पहुँचना आज की जरूरत बन गई हैं। वास्तव में आज मजदूर की परिभाषा ही पुर्नपरिभाषित करने की जरूरत है। सिर्फ शारीरिक मेहनत को मजदूरी ना मानकर मानसिक और प्रबंधान कार्य करने को भी इसमें शामिल करना होगा। शायद हमने मजदूर शब्द को हेय समझा और दुनिया के मजदूर एक हो की बात भूल गए। आज इन गल्तियों को सुधारने की जरूरत है नही तो खूनचुसबा उदारीकरण अपने पंजे फैला रहा है, जो हमारी, अस्मिता और मानव अधिकारों को खत्म कर देगा। आज श्रमिक आंदोलन इस भावना से होना चाहिए कि उनके द्वारा समाज का कल्याण हो। लोगों को रोजगार के अवसर मिलें। काम करने वालों को सामाजिक सुरक्षा की गारंटी मिले। आर्थिक मंदी का डंक भी कामगारों को आत्महत्या को मजबूर न कर पाये।

 




डॉ. सुनील शर्मा