संस्करण: 27अप्रेल-2009

 

लोकतंत्र के महापर्व में नक्सली दखल

 

 

 

एम.के.सिंह

       पंद्रहवीं लोकसभा के लिए हो रहे चुनाव के पहले चरण के मतदान में भारी सुरक्षा व्यवस्था के बीच एक साथ छह राज्यों में अपनी उपस्थित दर्ज कराकर नक्सलियों ने केंद्र और राज्यों सरकारों के सामने बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है। चाक-चौबंद सुरक्षा घेरे को तोड़कर छत्तीसगढ़, उड़ीसा, झारखंड, बिहार और महाराष्ट्र में नक्सली अपने उद्देश्य में काफी हद तक कामयाब रहे और जवानों समेत 20 लोगों की हत्याकर लोकतंत्र के महापर्व में दखल देने की भरपूर कोशिश की। नक्सलियों की बढ़ती ताकत से केंद्र सरकार, राज्य सरकारों और पुलिस-प्रशासन के होश उड़ गए हैं। पिछले दिनों रोहतास जिले में बीएसएफ केप पर किए हमले में नक्सलियों ने पहली बार रॉकेट लांचरों का उपयोग । नक्सलियों ने अब रूस, अमरीका और यहां तक कि चीन में बने हथियारों का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है। नक्सलियों ने द्वितीय विश्व युध्द के समय की 303 राइफलों से लेकर पूरी तरह स्वचालित राइफलों तक की व्यापक शृंखला का इस्तेमाल शुरू कर दिया है। अनेक नक्सल दलम अमरीका निर्मित एसएमजी थामसन बंदूकें, एके-47 राइफलें और बड़ी संख्या में रूसी और चीनी राइफल एवं पिस्तौल सहित घातक हथियारों का इस्तेमाल कर रहे हैं। नक्सली समस्या से निपटने के लिए तैनात सीआरपीएफ ने वित्तीय वर्ष 2008-09 में 1714 हथियार जब्त किए थे। सर्वाधिक 1040 हथियार उड़ीसा से बरामद किए गए थे, जहां पिछले हते 200 नक्सलियों ने सीआईएसएफ के संरक्षण वाली नाल्को खदान पर हमला कर 11 जवानों की हत्या कर दी थी।

नक्सलियों की ताकत से सहमे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का कहना है कि लोकसभा चुनाव के प्रथम चरण में एक साथ छह राज्यों में नक्सलवादियों के प्रहार से सारा देश भौचक्का रह गया। नक्सलवाद को वैश्विक खतरा बताते हुए मनमोहन ने कहा कि हमें इसे हर हाल में उखाड़ फेंकना होगा। कहा जा रहा है कि नेपाल में हथियार छोड़कर संसदीय लोकतंत्र में शामिल हुए माओवादियों के प्रमुख नेता पुष्प कमल दहल उर्फ प्रंचड से नाराज माओवादी भारत को अपना ठिकाना बनाने लगे हैं। माओवादियों ने उड़ीसा के मलकागिरी जिले को अपने लिए सबसे सुरक्षित माना है। बताया जा रहा है कि पिछले दिनों जिले के नागरिकों ने नेपाली माओवादियों को देखा भी था। खुफिया अधिकारियों का भी घुसपैठ का अंदेशा हो गया है। उनका कहना है कि हमें नेपाली माओवादियों की घुसपैठ की सूचना मिली है, लेकिन जब तक वे पकड़े नहीं जाते कुछ भी कहना उचित नहीं होगा। कुछ समय पहले नेपाल ने भी भारत को आगाह किया था कि माओवादियों का एक हिस्सा भारतीय सीमा में प्रवेश कर सकता है। माओवादी आंदोलन ने नेपाल के पशुपतिनाथ से आंध्रप्रदेश के तिरूपति तक एक लाल गलियारे के निर्माण को अपना लक्ष्य बनाया है। ऐसे में नेपाल में प्रचंड को सत्ता मिलने के बाद माओवादी कार्यकर्ता सीमा लांघ कर भारत में आने की बात को नकारा नहीं जा सकता है।

लंबे अर्से से भारत के माओवादी अपने नेपाली समकक्षों से नैतिक के साथ-साथ साजोसामान का समर्थन हासिल करते रहे हैं। कुछ समय पहले उड़ीसा के गजपति जिले के मंद्राबाजू इलाके से कम से कम छह सीडी बरामद की गई थी। इनसे राज्य में नेपाली माओवादियों की मौजूदगी जाहिर होती है। नेपाली भाषा की सीडी भारतीय माओवादियों और उनके नेपाली समकक्षों के बीच के रिश्तों का एक संकेत हो सकती है। यह सर्वविदित है कि उड़ीसा, आंध्रप्रदेश और छत्तीसगढ़ में सक्रिय माओवादी दूसरे इलाकों के विशेषज्ञों से मदद ले रहे हैं और शायद इन स्थानों में नेपाल भी शामिल है।

उड़ीसा में पिछले कुछ वर्षों से नक्सली हिंसा में तेजी से वृध्दि हुई है। राज्य के अधिकारी इन स्थितियों से निपटने में असमर्थता जाहिर कर रहे हैं। राज्य के दक्षिणी, उत्तारी और उत्तार पश्चिमी इलाके में नक्सली सबसे अधिक सक्रिय हैं। राज्य के कम से कम आठ जिलों मलकानगिरि, कोरापुट, रायगडा, गजपति, संबलपुर, देवगढ़, सुंदरगढ और मयूरभंज में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) का प्रभाव है। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी- माक्र्सवादी लेनिनवादी (जनशक्ति) क्योंझर, जाजपुर और ढेनकेनाल जिले में सक्रिय है। राज्य के तीस जिलों में से 15 जिले नक्सल प्रभावित हैं। वहीं देश के 13 राज्यों आंध्रप्रदेश, बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़, उड़ीसा, पश्चिम बंगाल, उत्तारप्रदेश, हरियाणा, पंजाब, महाराष्ट्र, कर्नाटक और केरल में नक्सली सक्रिय हैं। नक्सल प्रभावित राज्य लंबे अरसे से यह मांग करते आ रहे हैं कि नक्सल समस्या को राज्यों की समस्या न मानकर राष्ट्रीय समस्या माना जाए, क्योंकि लगभग आधा देश इससे ग्रसित है। राज्यों के बीच आपसी समन्वय न हो पाने के कारण यह समस्या बढ़ती ही जा रही है।

प्रभावित राज्यों में अलग-अलग दलों की सरकार होने का लाभ सबसे ज्यादा नक्सली ही उठा रहे हैं। इसलिए मांग उठ रही है कि केंद्र सरकार इस समस्या से निपटने के लिए केंद्रीय रणनीति बनाए। दूसरी ओर, केंद्र सरकार इसके लिए तैयार नहीं है। केंद्र और राज्यों की इसी खींचतान का लाभ नक्सली ले रहे हैं। उनकी गतिविधियां बेखौफ जारी हैं। पीड़ित राज्य सरकारें अपने-अपने ढंग से नक्सलियों से लड़ रहे हैं। संयुक्त रूप से कोई कार्रवाई नहीं हो रही है। धडल्ले से नक्सलियों के प्रशिक्षण शिविर चल रहे हैं। जिनकी जानकारी सबको है। ऐसे में केंद्र और प्रभावित राज्य सरकारों को एक मंच पर आकर कोई कारगर रणनीति बनाकर नक्सलियों के खिलाफ चौतरफा धावा बोल देना चाहिए तब जाकर सफलता मिलेगी। केंद्र और राज्य सरकारें जब तक एकजुट हो कर नक्सली समस्या का समाधान नहीं करेंगे, तब तक समस्या का समाधान एक दिवा स्वप्न ही साबित होगा।

 

 

एम.के.सिंह