संस्करण: 27अप्रेल-2009

 

कौन होगा मजबूत : कौन होगा कमजोर
वोटिंग मशीन के पेट में पल रहा है सच


 राजेंद्र जोशी

   भाषण सुन-सुनकर थक गये, अखबार पढ़-पढ़कर थक गये, टी.वी. चैनलों पर समाचार देख-देखकर उक्ता गये। रिमोट हाथ है। जिस भी चेनल को बदलों सबमें एक ही बात हम मजबूत, वो कमजोर.... वो कमजोर-कहीं भाषणो में कीचड़ उछाला जा रहा है कहीं विज्ञापनों में डींग। चुनाव-प्रचार तौर-तरीकों और उस पर मीडिया की टिप्पणियों से उकता कर सोचा कोई धार्मिक चेनल लगाया जाय और कुछ भजन, भक्तिगीत या संतो, महात्माओं के मुख से कथा-भागवत सुन ली जाय किंतु धान्य हो मार्केटिंग की कला, उन चेनलों पर भी विज्ञापन चल रहे हैं निर्णायक सरकार और मजबूत नेताओं के गुणगान के। आस्था, जागरण, संस्कार और विभिन्न भक्ति चेनलों पर भी देखी जा रही चुनाव-प्रचार में भक्ति चेनलों में लुटाये जा रहे धान के बल पर प्रदर्शिता हो रहे विज्ञापनों की भरमार, चेनलों में ब्रेक के पहले और ब्रेक के बाद समाचार तो निर्वाचन के होते ही हैं साथ ही ब्रेक में भी जितने विज्ञापन आ रहे हैं वे भी भविष्य की मज़बूत सरकार, कमजोर सरकार को लेकर ही छाये हुए हैं।

निर्वाचन के दौरान जितने भी दिन की अवधि प्रचार के लिए मिलती है,वह राजनैतिक दलों और उनके स्टार प्रचारकों की मंडली की मंचीय कला के प्रदर्शन का एक स्वर्णिम अवसर होता है। प्रचार मंचों पर किरदार निभाने वाले कतिपय नेताओं के प्रदर्शन तो बड़े ही अजब और गजब होते हैं। इन मंचों पर गीता हाथ में रखे हुए ऐसे-ऐसे चेहरे दिखते हैं जो कसम तो सच बोलने की खाते हैं किंतु उनकी राजनीति की हकीकत देखी जाय तो वह झूठ से ही शुरू होती है। जनता के बीच पहुंचकर अपनी पहलवानी की ऐसी ताल ठोंकते है जैसे मजबूती का इन्होंने ही कॉपीराइट करा लिया हो। जिस जनता के पैसे से वे बदाम का हलवा खा रहे हैं और दूधा, रबड़ी, खीर और घी पी रहे हैं उसी जनता के सामने वे अपनी मजबूती दिखाकर अपनी बहादुरी प्रदर्शित कर रहे हैं। चुनाव प्रचार के ऐसे तनावयुक्त माहौल पर एक ऐसे ग्रामीण की टिप्पणी, जो कभी गांव के बाहर नहीं गया किंतु उसने कई निर्वाचनों में अपनी अंगुली पर काली बिंदी लगवाई है, बहुत मायने रखती है। वह कहता है-भैया। चुनाव-प्रचार में मज़बूत-मजबूत की बात जो लोग कर रहे हैं वे कहां से मज़बूत हैं ? जरा हमको भी तो समझाओं ? हम सब जानते है कि हमको कौन कितना बुध्दु बना रहा है। हमें तो ऐसा लग रहा है कि जो कमजोर होता है उसको ही जगह-जगह ढोल पीटने की जरूरत पड़ती है, कि हम-मजबूत है, हम मजबूत हैं, जिन्हें महज अशिक्षित या नासमझ माना जाता है, ऐसे मतदाताओं की राय यह है कि जो मजबूत होता है जनता खुद-ब-खुद उसके पीछे आ जाती है, ऐसे नेताओं को चुनाव के वक्त जनता को अपने करतब नेताओं को चुनाव के वक्त जनता को अपने करतब दिखाने की जरूरत नहीं पड़ती है। जोर-जोर से कानफोड़ू लाउडस्पीकर पर चीख-चीखकर मज़बूती का दावा करने से कोई मज़बूत नहीं हो जाता। मज़बूती का सच तो वोटिंग मशीन उगलेगी, कि कौन कितना कमजोर हैं और कौन कितना मज़बूत हैं। कोई कितना ही अपने आपको निर्णायक सरकार बनाने का दावा करे और अपनी मसल्स का प्रदर्शन करे, उसपर तालियों की गड़गड़ाहट तो सुनने को मिल जायगी किंतु दोनों हाथों की ताली की दस अंगुलियों यह फैसला नहीं कर सकती। उसका फैसला तो एक पर्दे की ओर में सिर्फ वह एक अंगुली ही करेगी जो वोटिंग मशीन की बटन को दबायेगी।

यह एक ऐसा दौर चल रहा है जहां केंद्र या राज्यों में यदि किसी की चल रही है तो वह है निर्वाचन-आयोग। देशभर में घूम रहे आयोग के डंडे की चपेट में पूरा परिवेश है। आयोग को शिकार तो मिल जाते हैं, वह खुद भी यहां-वहां दहाड़कर, शिकार को पंजे में जकड़ तो लेता है, किंतु उसके आगे वह बेबस हो जाता है। वह शिकार पकड़ कर घौंस-घपट भी कर देता है, कागज भी थमा देता है किंतु उसकी स्थिति यह होती है कि वह एक ऐसा दहाड़ता हुआ शेर है जिसके पंजे में न तो नाखून है और न ही मुंह में दांत। मजबूरन उसे तिलमिलाकर शिकार को छोड़ देना पड़ता है। दंतविहीन और नाखून विहीन शिकारी की झपकी का डर तो लगता हैं किंतु इससे ज्यादा उससे किसी को कोई खतरा नहीं होता। इसलिए उसकी चेतावनियां भी अधिकतर मामलों में बेअसर हो जाती हैं।

चिलचिलाती धूप में हजारों की संख्या में मंच के समक्ष मौजूद जनसैलाब से तालियां लूटने की कला के प्रदर्शन से वैसे तो कई लोगों का खून बढ़ गया होगा। अब देखना है कि जनता ने अपने घर लौटकर चुनाव-प्रचार की नाटयलीला के प्रदर्शन को किस रूप में लिया है। किसी की प्रतिक्रिया है कि हमें क्या करना है-'कोऊ नृप होय, हमें का हानि,' तो किसी की प्रतिक्रिया है कि 'भैया अपना तो सिनेमा वाले कलाकार को देखने गये थे।' कोई कहता है कि चुनाव सभाओं में बड़ा मजा आता है, ये उसको गाली ठन्नाते हैं वो इनको कोस रहे हैं। एक साधु महात्माजी आये थे-'कह रहे थे विदेशों में बैंक में जमा काला पैसा वापिस लाओ।' सुन-सुनकर हंसी आती है कि लंगोट बांधा के साधु बन गये पर बात करते हैं पैसों की कुर्सी की और सरकार की। साधु बन गये हो तो हिमालय में जा पहुंचों वहां आज भी सैकड़ों वर्षों से साधु-सन्यासी मानव कल्याण के लिए तपस्या कर रहे हैं। कुल मिलाकर इस निर्वाचन के माहौल का यह सत्य सामने आ रहा है कि जिसमें जनता अपने पत्ते नहीं खोल रही है सिर्फ नेतागण ही अपनी विरूदावली गाने में लगे हैं।' सच क्या है तो अब वोटिंग मशीनों के पेट में से ही निकलेगा।
 

 राजेंद्र जोशी