संस्करण: 27अप्रेल-2009

 

विद्यालयीन शिक्षा की चुनौतियां


 

डॉ. गीता गुप्त

   ह दु:खद सत्य है कि आज़ादी के छ: दशक बाद भी भारत में विद्यालयीन शिक्षा का स्वरूप सुनिश्चित नहीं हो सका है और इतनी विसंगतियां उजागर हो रही हैं कि व्यापक परिवर्तन की आवश्यकता अनुभव की जा रही है। शिक्षा पर हावी होते व्यावसायिक दृष्टिकोण ने विद्यालयीन शिक्षा में भेद-भाव की खाई को भी गहरा कर दिया है। केंद्र सरकार शिक्षा की बदहाली से अवगत है। केंद्रीय मंत्रीमंडल ने 11वीं पंचवर्षीय योजना में देश में प्रखण्ड स्तर पर छ: हजार मॉडल स्कूल खोलने की योजना को स्वीकृति दी है और इसके लिए पर्याप्त राशि आबंटित की है। राज्य सरकारें इन विद्यालयों के लिए नि:शुल्क भूमि उपलब्धा करायेंगी। छठी से बारहवीं कक्षा तक संचालित इन विद्यालयों में शिक्षा का माधयम राज्य-सरकारें तय करेंगी पर अंग्रेजी बोलने और पढ़ने पर बल दिया जाएगा। इनका स्तर केंद्रीय विद्यालय के बराबर होगा। इनमें विद्यार्थी और शिक्षकों का प्रतिशत आदर्श होगा तथा नये प्रकार के पाठयक्रम सहित सभी तकनीकी सुविधाएं सुलभ होंगी।

प्रश्न यह है कि केंद्र सरकार के इस क़दम से कितने प्रतिशत बच्चे लाभान्वित होंगे और क्या पूरे देश के बच्चों को ऐसे आदर्श विद्यालयों की आवश्यकता नहीं है ? मुट्ठी भर सम्प्रभुओं के बच्चे तो आरंभ से ही महंगे आदर्श विद्यालयों में पढ़ते आ रहे हैं। समस्या तो जन सामान्य की है, जो सरकारी विद्यालयों की दुर्दशा त्रस्त हैं। देश भर के शासकीय विद्यालय संसाधानों की कमी से जूझ रहे हैं। मधय प्रदेश में 2 प्रतिशत विद्यालय शिक्षकविहीन है, 32 प्रतिशत प्राथमिक विद्यालय एक शिक्षक के भरोसे चल रहे हैं। अकेले सतना जिले के ही 222 विद्यालयों में एक ही शिक्षक से काम चलाया जा रहा है। 5 प्रतिशत से अधिक विद्यालयों में प्रति एक सौ विद्यार्थियों पर एक शिक्षक है। ऐसे में बच्चों के भविष्य और शिक्षा की गुणवत्ता का अनुमान सहज ही लगाया जा सकता है।

यह उल्लेखनीय है कि भारत में अब तक समान स्कूल प्रणाली लागू नहीं की गयी है। बच्चों को पाठयक्रम में क्या, कैसे, कितना और क्यों पढ़ाया जाये ? यह भी तय नहीं हो पा रहा है। अकेले मधय प्रदेश की ही बात करें, तो जानकर हैरानी होगी कि पिछले कुछ महीनों में ही इस संदर्भ में कई अजीबो-गरीब बयान राजनेताओं और नौकरशाह की ओर से प्रकाश में आए हैं। उदाहरणार्थ-'जिले में एक्टिविटी बेस्ट लर्निंग प्रोजेक्ट लागू करने की तैयारी', 'खुलेंगे सेटेलाइट स्कूल', हाईटेक उपकरणों से होगी अब क्लासरूम में पढ़ाई', 'फ़िल्म से सिखाएंगे गणित,' 'स्कूली पाठयक्रम में जोड़ा जाये-'जैव विविधाता संरक्षण', अगले सत्र से शुरू हो जाएगा योग पाठयक्रम' 'सी.बी.एस.ई. स्कूलों में खुलेंगे हेल्थ क्लब', दो घंटे पहले लगेगी रिमेडियल क्लास, 'खूब खेलो खेल-तब भी नहीं होंगे फेल', 'जब तक होंगे फेल, तब तक होगी परीक्षा'-आदि-आदि। इन बयानों/घोषणाओं पर ग़ौर करें तो स्पष्ट हो जाएगा कि सरकार शिक्षा के स्वरूप को लेकर कितनी भ्रमित है ?

दरअसल यहां के राजनेता और नौकरशाह जब विदेश-यात्रा पर जाते हैं तो वहां की जो बात उन्हें भाती है, उसे यहाँ लौटकर लागू करने के स्पप्न देखने लग जाते हैं। वे भूल जाते हैं कि भारत की 80 प्रतिशत जनता गांवों में निवास करती है, जहाँ आज तक बिजली नहीं है। 42,000 विद्यालय ऐसे हैं जिनके पास अपना भवन तक नहीं है। यहाँ बीच में ही पढ़ाई छोड़ देने वाले बच्चों की संख्या निरंतर बढ़ रही है। सन् 2000-01 में 10 प्रतिशत बच्चे विद्यालय छोड़कर चले जाते थे, वर्ष 2006 में यह संख्या 20प्रतिशत हो गयी। यूनीसेफ की एक रपट के अनुसार, भारत में स्कूल जाने वाले 40 प्रतिशत बच्चों का वज़न अस्वाभाविक रूप से कम है और 42 प्रतिशत बच्चे कुपोषण का शिकार हैं। आंगनवाड़ी केंद्रों से लेकर सरकारी विद्यालयों तक पोषण-आहार का प्रबंधा होने के बावजूद कुपोषण की भयानक स्थिति उजागर हुई है तो यह यक्ष प्रश्न उपस्थित होता है कि करोड़ों रुपयों का पोषण-आहार कौन हज़म कर गया ? बाल संजीवनी अभियान के अनुसार 47प्रतिशत बच्चे कुपोषित हैं जबकि राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के अनुसार यह आंकड़ा 60 प्रतिशत है। आंकड़ा कुछ भी हो, यह तो सच है कि बच्चे पोषण-आहार से वंचित किये जा रहे हैं।

ग़ौरतलब है कि नेशनल चाइल्ड लेबर प्रोजेक्ट के अंतर्गत 17 ज़िलों में 59012 बाल मजदूर हैं जिनमें से 19072 बच्चे ही पढ़ते जा रहे हैं। इसी प्रकार इंडस योजना के तहत पांच जिलों के 73119 मजदूरों में से 28184 बाल मजदूर ही नामांकित बताये जा रहे हैं। बाल मजदूरों की शिक्षा के लिए किये जा रहे प्रयासों की वास्तविकता इसी बात से स्पष्ट हो जाती है कि बैतूल में पांच हजार से भी अधिक बाल श्रमिक हैं कितु उनकी शिक्षा के लिए कोई प्रबंधा नहीं है। विस्थापन के कारण शिक्षा से वंचित या विद्यालय छोड़ने वाले बच्चों के संबंधा में कोई आंकड़ा जारी नहीं किया गया, न उनके लिए कोई योजना तैयार की गयी है। नर्मदा घाटी के विस्थापित परिवारों के हज़ारों बच्चे और पालपुर कूनों के विस्थापित 27 गांवों के बच्चे अब तक अनिवार्य प्राथमिक शिक्षा से वंचित हैं। यह भी विडंबना है कि प्रदेश के विद्यालयों में आज भी भेदभाव जैसी बुराई व्याप्त है। होशंगाबाद के निकट रानी पिपरिया के सपेरा समुदाय के किसी भी बच्चे को विद्यालय में प्रवेश नहीं दिया जाता। इसी तरह सागर के ग्राम पथरिया में बेड़नी समुदाय की लड़कियों को इसलिए अपमानित होना पड़ता है कि उनके समाज की महिलाएं वेश्यावृत्ति में लिप्त हैं। पारदी समुदाय को तो समाज ने अपराधी ही मान लिया है इसलिए उनके बच्चों से भी उपेक्षापूर्ण व्यवहार किया जाता है। ऐसे में, प्रारंभिक शिक्षा के बुनियादी अधिकार से वंचित बच्चों का भविष्य क्या होगा ? देश की उन्नति में उनकी क्या भूमिका होगी ? यह चिंता का विषय है।

वर्तमान तकनीकी संचार-युग में वैज्ञानिक पध्दति और तकनीकी संसाधानाें सहित गुणवत्तापूर्ण प्राथमिक शिक्षा देने वाले निजी संस्थानों की भरमार है, जहां प्राथमिक कक्षाओं का वार्षिक शुल्क लाखों में वसूला जाता है। यह ज्वलंत प्रश्न है कि निजी संस्थाओं को पनपने का अवसर किसने दिया ? यदि सरकारें शासकीय विद्यालयों की गुणवत्ता बनाये रखने पर धयान देतीं तो आज उनकी दुर्दशा पर आंसू नहीं बहाने पड़ते। पहले शहरों में इक्के-दुक्के कॉन्वेंट स्कूल खुले जिनके परिणाम उत्साहवर्ध्दक थे, परंतु महंगे होने के कारण उन तक सिर्फ़ एक वर्ग विशेष की पहुंच थी। बाद में तो निजी विद्यालयों की बाढ़-सी आ गयी, तब भी सरकार ने इसे रोकने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखायी इसीलिए उनकी संख्या शासकीय विद्यालयों की तुलना में कहीं अधिक है। यह भी कटु सत्य है कि विगत चार-पांच वर्षों में शिक्षक प्रशिक्षण संस्थानों की संख्या दोगुनी हो गयी है तथापि योग्य शिक्षकों का घोर अभाव है। इसलिए कि उक्त संस्थान सिर्फ प्रमाणपत्र बेच रहे हैं, हकीकत में कहीं प्रशिक्षण नहीं दिया जा रहा है। सरकार को इसे धयान में रखते हुए कड़े क़दम उठाने चाहिए। शिक्षा की नींव मज़बूत करने के लिए शिक्षकों का संवेदनशील, सृजनधार्मी, योग्य, प्रतिभा-संपन्न और प्रशिक्षित होना नितांत आवश्यक है। यदि भारत के सभी बच्चों को सचमुच अच्छा इंसान-अच्छा नागरिक बनाना है तो सर्वप्रथम उनकी प्रारंभिक शिक्षा पर धयान देना होगा और बिना किसी भेदभाव के प्राथमिक स्तर पर समान शिक्षा व्यवस्था लागू करनी होगी। निजी एवं सरकारी विद्यालयों के बीच की गहरी खाई को पाटना होगा। मौजूदा चुनौतियों से निपटने के लिए सरकार को कुछ महत्वपूर्ण निर्णय लेने की आवश्यकता है। जैसे-
1. समान स्कूल पध्दति लागू की जाये।
2. प्राथमिक शिक्षा का माधयम बच्चों की सुविधानुसार क्षेत्रीय भाषा ही हो, इस बात का विशेष धयान रखा जाए। अंग्रेजी का अधययन विषय के रूप में हो, न कि शिक्षा के माधयम के रूप में।
3. बहु कक्षा- शिक्षण की पंरपरा समाप्त कर प्रत्येक विद्यालय में समुचित संख्या में प्रशिक्षित शिक्षक नियुक्त किये जायें। चूंकि बी.एड्-एम.एड् की फर्जी उपाधि प्राप्त करने वालों की भरमार है अत: पदस्थापना हेतु इन्हें आरंभिक दो वर्षों तक सामान्य वृत्ति (वेतन नहीं) देकर योग्यता का परीक्षण किया जाये। तदुपरांत संतोषजनक परिणाम आने पर इनकी सेवा नियमित की जाये।
4. 'मधयान्ह भोजन' वितरण का भार शिक्षकों पर न डाला जाये। एक स्वतंत्र समिति इस दायित्व को वहन करे जो विद्यालय में सिर्फ इसी कार्य के लिए पदस्थ और जवाबदेह हो।
5. शिक्षकों से गैर शिक्षकीय काम लेना बंद किया जाये ताकि वे ईमानदारी से सिर्फ़ अधयापन करके उत्कृष्ट परिणाम दे सके।
6. निजी विद्यालय खोलने पर कुकुरमुत्ते की तरह शासकीय विद्यालय खोलने की बजाय तहसील एवं ज़िला स्तर पर सर्वसुविधायुक्त आवासीय विद्यालय खोले जायें। जहाँ विद्यार्थियों को नि:शुल्क शिक्षा दी जाए और शिक्षकों को भी सुविधाएं प्राप्त हों।
8. जब तक देश के सभी सरकारी विद्यालयों को आवश्यक संसाधान सुलभ न करा दिये जायें, तब तक कोई अन्य विद्यालय न खोला जाये।
9. वैश्विक मानदंडों पर खरा उतरने की दृष्टि से पाठयक्रम का स्वरूप निधर्रण न किया जाए अपितु भारतीय संस्कृति के अनुरूप बच्चों के विकास को धयान में रखते हुए पाठयक्रम तैयार करवाये जाएँ।
10. राजनेताओं, सरकारी अधिकारियों-कर्मचारियों और शिक्षकों के लिए यह नियम अनिवार्य किया जाए कि वे अपने बच्चों को सरकारी विद्यालयों में ही पढ़ायें। इस नियम-पालन की बाधयता से सरकारी शिक्षा-संस्थाओं का निश्चित रूप से काया-कल्प हो सकेगा।

निस्संदेह विद्यालयीन शिक्षा की चुनौतियों पर विजय पाना आसान नहीं है। यदि सरकार ईमानदारी और निष्ठापूर्वक प्रयास करेगी, तभी सफलता मिलेगी। विडंबना यह है कि भारतीय राजनेता और नौकरशाह यह नहीं जानते कि अपने देश की मिट्टी में कैसे और कौन-सी फसल बोयी जानी चाहिए जो हमारे लिए लाभदायक और उपयोगी होगी। वे देशी ज़मीन पर विदेशी फ़सल उगाने के लिए व्याकुल हैं। समस्या की जड़ यही है। यदि भारत को मज़बूत बनाना है तो यहाँ के नौनिहालों को अपनी संस्कृति के अनुरूप शिक्षा और संस्कार देकर समझदार बनाना होगा। तभी आगे चलकर वे स्वयं अपनी राह चुनने में समर्थ होंगे और देश की उन्नति में योगदान कर सकेंगे।

डॉ. गीता गुप्त