संस्करण: 27अप्रेल-2009

 

मनमोहन का उत्तर और चोटिल आडवाणी

 

भवानी शंकर

जिस प्रकार से स्वयं को भावी प्रधानमंत्री के रूप में पेश करने के बाद भारतीय जनता पार्टी के नेता लाल कृष्ण आडवाणी देश में भ्रमण कर रहे हैं। ऐसा पहले कभी नहीं हुआ है. सच तो यह है के 1998 से लेकर 2004 तक के राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधान शासन काल में भी आडवाणी के भीतर प्रधानमंत्री पद को प्राप्त करने की लालसा थी।

यह सभी जानते हैं की तत्कालिन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी यह कभी नहीं चाहते थे के आडवाणी जो उस समय देश के गृह मंत्री थे उन्हें उप प्रधान मंत्री का दर्जा दिया जाये। यूँ भी हकीकत यह है की संविधान के अंतर्गत उप प्रधान मंत्री नाम का कोई पद है भी नहीं। प्रधान मंत्री के पद को लेकर आडवाणी की मनस्थिति का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है के राजग की पराजय के बाद जब उन्हें विपक्ष में बैठना पड़ा तो उन्हें मनमोहन सिंह को प्रधान मंत्री के रूप में स्वीकार करने में बहुत समय लगा। वैसे तो यह परिस्थिति पूरी भारतीय जनता पार्टी की ही थी और यह तो भाजपा को सोनिया गाँधी का न्यवाद् अदा करना चाहिए कि उन्होंने प्रधान मंत्री के पद तो अस्वीकार कर दिया वर्ना सुषमा स्वराज जैसे नेताओं का तो जीवन ही दूभर हो जाता। लोकतंत्र के विषय में जब यह कहा जाता है के यह बिना खून बहाए सत्तापरिवर्तन का मार्ग है तो इसमें प्रमुख भूमिका विपक्ष की होती है। सत्तापक्ष सरकार पर काबिज तो अपने संख्या बल के आधार पर हो जाता है किन्तु उसके सत्ताको मान्यता तो विपक्ष के स्वीकृति से ही आती है। संसद के कार्रवाही के दौरान पिछले पॉँच वर्षों में कई ऐसे अवसर आये हैं जब भाजपा ने विपक्ष के रूप में सत्तापक्ष को यह मायता देने से इंकार कर दिया है।

यह भी विचारनीय बात है की विपक्ष के इस आचरण से सत्तापक्ष कोई नुकसान नहीं होता है, किन्तु इतना अवश्य होता है की लोकतंत्र की मर्यादाओं का पालन नहीं होता है। आडवाणी ने जब मनमोहन सिंह को देश का सबसे कमजोर प्रधानमंत्री कह कर कटघरे में खडा करने का प्रयास किया तो वो अपनी इसी मानसिकता को आगे बढा रहे थे। सच तो यह है की मनमोहन सिंह देश के सबसे कमजोर प्रधानमंत्री हैं या नहीं इसका फैसला या तो इतिहास करेगा या फिर इस देश की जनता। किन्तु अपने इन शब्द बाणों के द्वारा आडवाणी देश के लोकतंत्र को ही कमजोर किया।

भाजपा के प्रधान मंत्री पद के दावेदार अमेरिकी राजनीती से बहुत सारी बातें उधार लेते हैं। मसलन उन्होंने अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के चुनावी अभियान से बहुत सारी बातें अपने प्रचार अभियान में उतारने का प्रयास किया है। इसी बात को आगे बढ़ते उन्हें यह भी विचार करना चाहिए था कि नेता तो किसी दल का होता है किन्तु प्रधान मंत्री पूरे देश का नेता है। और प्रधान मंत्री कमजोर हो फिर देश भी कमजोर हो जाता है। और फिर प्रश्न यह है की क्या भाजपा जैसे राजनैतिक दल को यह करना चाहिए? जब की उसका दावा है की वो एक सुपर देश भक्त पार्टी है? आज जब के आडवाणी ने यह स्वीकार कर लिया है के सत्तामें आने के बाद अमेरिका के साथ हुए परमाणु करार का सम्मान करेंगे तो उनकी मनमोहन सिंह की यह आलोचना निराधार लगती है के इस करार को करते हुए उन्होंने कोई कमजोरी दिखाई है. अपने भाषणों में आडवाणी ने यह तर्क भी दिया है कि क्योंकि मनमोहन सिंह राजनैतिक मसलों पर कांग्रेस अधयक्ष सोनिया गाँधी की सलाह मानते हैं इस लिए भी वो कमजोर हैं। सच तो यह है के आडवाणी का यह तर्क उन्हें शोभा नहीं देता। जो लोग अपने राजनैतिक जन्म से ही स्वघोषित गैर राजनैतिक संघटन -राष्ट्रीय स्वयमसेवक संघ के आदेश से बंधो हुए हैं उनके मुंह से यह तर्क शोभा नहीं देता कोई नेता इस लिए कमजोर क्योंकि वो अपने पार्टी के अधयक्ष की सलाह मानता है। कम से सोनिया गाँधी देश की राजनीती में तो हैं और लोग उन्हें चुन कर संसद में भेजते हैं।

आडवाणी उन नेताओं के बारे में क्या कहेंगे जो संघ के आदेश को मानते हैं? आडवाणी और भाजपा ने मनमोहन की आलोचना का यह कार्यक्रम पूरे पांच वर्ष चलाया और यह प्रधान मंत्री की सहनशीलता का परिचायक है के उन्होंने इन सभी बातों को नजरंदाज किया. किन्तु यह चुनाव का समय है और यह एक निर्णायक घडी है। इसी लिया मनमोहन सिंह ने इन सभी आरोपों के उत्तार दिए हैं तथा अपनी शैली में पलटवार भी किया है. यह सच ही कहा गया है के एक सहनशील व्यक्ति के रोष से बचना चाहिए. क्योंकि मनमोहन के सौम्य बाण ही आडवाणी को यह कहने पर मजबूर कर गए हैं की इनसे चोटिल हुए है। इतना ही नहीं अब भाजपा को भी ये याद आया है की किसी प्रधान मंत्री को इस प्रकार के वाक् युध्द में नहीं पड़ना चाहिए. यह मनमोहन सिंह के चरित्र का परिचायक है के उन्होंने ने भी स्पष्ट कर दिया के न तो उन्हें इस बात का खेद है के उन्होंने आडवाणी के विषय में ऐसी बातें कहीं जिस से वो चोटिल हुए और न उन्हें इस बात की इच्छा है के इस प्रकार के संवाद को आगे बढाया जाये।

 

भवानी शंकर