संस्करण: 26 नवम्बर-2012

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भाजपा को कौन चला रहा है ?

           यूं तो पहले से ही भारतीय जनता पार्टी में प्रधानमंत्री पद और अपने अभिमान को तुष्ट करने के लिए नेताओं में झगड़ा होता रहता था लेकिन तब कुछ बयान शीर्ष स्तर से आते रहते थे जो यह आभास दिलाते थे कि पार्टी का नेतृत्व जिंदा है। किंतु जबसे पार्टी के राष्ट्रीय अयक्ष नितिन गडकरी पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे हैं और जिस तरह से नेताओं के बयान आ रहे हैं या अनबन सामने आ रही है, यह अहसास ही खत्म होता जा रहा हैकि पार्टी में नेतृत्व बचा भी है या नहीं? यदि नेतृत्व नहीं है तो फिर पार्टी चला कौन रहा है? और जब पार्टी चलाने वाला ही कोई नहीं है तो यह बिना राजा की फौज जैसी पार्टी आखिर किसका नेतृत्व कर रही है और बूते विपक्ष होने या एक पार्टी होने का दावा कर रही है?

? विवेकानंद


कब अपनी जिम्मेदारी स्वीकारेगा संघ

        न दिनों संघ परिवार अजब स्थिति में है। यह अजीब स्थिति बनी है, बीजेपी के राष्ट्रीय अयक्ष नितिन गडकरी को लेकर। गडकरी की वजह से संघ परिवार की हालत इस वक्त सांप-छछूंदर की बनी हुई है। न तो उन्हें निगलते बन रहा है और न उगलते। एक के बाद एक नितिन गडकरी पर जिस तरह से भ्रष्टाचार के आरोप लगे हैं,उससे उनका बचाव करना संघ के लिए मुश्किल हो गया है। आदर्श हाउसिंग सोसायटी घोटाला,कॉल ब्लॉक घोटाला, महाराष्ट्र सिंचाई घोटाला आदि हाल ही में आए सभी प्रमुख घोटालों में नितिन गडकरी का नाम शामिल है।

? जाहिद खान


दिवंगत बाला साहब ठाकरे -

जिन्होंने हमेशा भाजपा पर अंकुश रखा

   बाला साहब ठाकरे ने हिन्दुत्व और मराठी जातीयता की राजनीति को आार बनाया था, व इस के आार पर उन्होंने जो संगठन खड़ा किया था उससे देश की आर्थिक राजानी में व्यापार कर रहे कुबेरों की नस दबाने में सफल रहे थे। जिस दौरान मुम्बई में जो बड़े स्मगलर और माफिया गिरोह थे उनके सरगना कुछ मुस्लिम थे इसलिए उन्होंने अपना संगठन बनाने के लिए हिन्दुत्व का सहारा लिया तथा कुछ साउथ इंडियन थे जिनसे टकराने के लिए उन्होंने महाराष्ट्र में मराठी का नारा उछाला। उनके काम से सुरक्षा पाने वाले नपतियों ने उन्हें न और सान दोनों ही उपलब कराये

? वीरेन्द्र जैन


बालासाहब ठाकरे ने आधुनिक भारत की रिढ़ तोड़ने का काम किया

           बाला साहब ठाकरे के बारे में उनके लाखों आशंसक कुछ भी कहें, मेरे अनुसार उन्हें इतिहास में एक ऐसे व्यक्ति के रूप में याद किया जाएगा जिसने आुनिक भारत की रीढ़ को तोड़ने का भरसक प्रयास किया था-उस आुनिक भारत की रीढ़ को जिसकी नींव महात्मा गांी, जवाहरलाल नेहरू, सुभाषचन्द्र बोस और भगतसिंह के विचार और आदर्श हैं। ठाकरे उन सभी मूल्यों के विरोी थे, जिनमें आुनिक भारत की आत्मा बसती है। वे भारत के उस चरित्र के विरोी थे, जिसमें सभी र्मावलंबियों और भाषा-भाषियों को  को समान सम्मान व अिकार प्राप्त हैं।

? एलएसहरदेनिया


गांव तब्दील हो रहे हैं महानगरों के वार्डों में

आवास गृहों के विज्ञापनों में मची होड

       ड़े-बड़े नगरों में इतने अिक आवासगृह बनते जा रहे हैं कि आसपास कई परम्परागत गांवों के नामों निशान तक मिट गये हैं। नगरों के 20-25 किमी क़े आसपास के बचे खुचे गांव भी अब तो बिल्डर्स के चंगुल में फंसते जा रहे हैं। ज्यादा दूर नहीं एक आा दशक पहले तक की यह स्थिति थी कि नगरों के आसपास बसे गांवों में हमारी सांस्कृतिक परम्पराओं, रहन-सहन और रीति-रिवाजों की झलक देखने को मिल जाया करती थी। किंतु अब न तो वे गांव के नामोनिशान बचे और न ही वहां की सांस्कृतिक महक भी महसूस की जा सकती। अमराई, फुलवारी, कुआं, पनिहारिन वहां की पहचान हुआ करती थी। आज विकास के और आुनिकता के आंनुकरण के इस युग में शहर में गांव आकर इस तरह घुल गये हैं जैसे दू में शक्कर घुल जाया करती है।

 ?   राजेन्द्र जोशी


औद्योगिक विकास के नाम पर किसानों का विनाश

                  यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान गाहे-बगाहे खुद को किसान-पुत्र होने का दावा करते रहे हैं, किंतु उन्हीं के राज में किसान सर्वािक प्रताडना के शिकार हुए हैं। हालात इतने बदतर हैं कि किसानों को अपनी कृषि भूमि बचाने के जान देना पड़ रही है। इस सबसे बेखबर सरकार चंद उद्योगपतियों का हित संरक्षण करने में लगी है। इसमें कोई दो राय नहीं कि प्रदेश को औद्योगिक विकास की दरकार है। किंतु इस संदर्भ में इस तथ्य को भी यान में रखा जाना चाहिए कि इससे अन्नदाता यानि किसानों के हित प्रभावित न हों। दुर्भाग्य की बात है कि यह सरकार अन्नदाताओं के हितों की उपेक्षा कर चंद बड़े औद्योगिक घरानों के आगे कालीन की तरह बिछ गई है।

? महेश बाग़ी


शाहीन की गिरफ्तारी के सबक

काले आईटी कानून को रद्द किया जाय

     शिवसेना सुप्रीमो बाल ठाकरे के निन के बाद जो तमाशा देखने को मिल रहा है, वह निश्चय ही बहुत भयावह है। सबसे ज्यादा भयावह 21साल की एक लड़की शाहीन और उसकी एक दोस्त रेणु की पुलिस द्वारा की गई गिरफ्तारी है। वह गिरफ्तारी किस हद तक गलत थी, इसका अंदाज इसीसे लगाया जा सकता है कि खुद आईटी और संचार मंत्री कपिल सिबल ने उसे गलत बता दिया। सबसे पहले तो शाहीन के खिलाफ कोई मामला ही नहीं बनता था,क्योंकि उसने आईटी एक्ट के तहत भी किसी तरह का गलत काम नहीं किया था।

? उपेन्द्र प्रसाद


नेता जी के सरकार की नेकनीयति पर सवाल!

      त्तर प्रदेश की अखिलेश सरकार अपने ही बनाए जाल में उलझती जा रही है। समाजवादी सरकार ने अपने कार्यकाल का छह महीने तो पूरे कर लिए लेकिन इस अव में सरकार की कार्यप्रणाली और प्रशासनिक अमले पर अनगिनत सवाल उठ रहे हैं। सबसे अहम राज्य में अल्पसंख्यकों की सुरक्षा और शांति का सवाल है। चुनाव से पहले अपनी सभाओं में मुलायम सिंह ने वादा भी किया था कि सपा सरकार में मुसलमानों को भयमुक्त और दंगामुक्त शासन-प्रसासन की सेवाएं मुहैया करवाएंगे। दुर्भाग्य से पिछले कुछ महीनों में हुई हिंसा को देखते हुए यह कहने में हर्ज नहीं कि भयमुक्ति का यह सब्जबाग और  नेताजी के कई वायदे भानुमति के पिटारे से निकलते नहीं दिखाई दे रहे हैं।

? अनुज शुक्ला


विस्थापन, पुर्नवास में गुंम

शिक्षा का अधिकार

        केन्द्र और राज्य सरकार शिक्षा का अधिकार अधिनियम का पालन करते हुए हर बच्चे को निशुल्क और अनिवार्य शिक्षा प्रदान करने के लिए संकल्पित है। हमारे देश का प्रत्येक बच्चा स्कूल जाये,शिक्षा ग्रहण करे इसके लिये भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 में संशोधन करते हुए  21     में शिक्षा का अधिकार भी मौलिक अधिकार में जोडा गया । शिक्षा का अधिकार समाज के गरीब कमजोर वर्ग के बच्चों को दूर सूदूर, दुंर्गम इलाकों, गॉवों, मजरों, टोलो, फलियों रहने वाले बच्चों को भी मिले यह जिम्मेदारी अब सरकार की, सरकार के प्रतिनिधियों की है।

? अमिताभ पाण्डेय


संदर्भ :- भारतीय दंतचिकित्सक सविता की मौत से जुड़ा आयरलैंड का मामला।

चर्च से जुड़ा अंधविश्वास

       मतौर से पश्चिमी देश दुनिया को मानवाधिकार और धर्मनिरपेक्षता का पाठ पढ़ाते हैं। इन देशों में भी भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश उनके निशाने पर प्रमुखता से रहते हैं। भारत को तो वे मदारी और सपेरों का ही देश कहकर आत्ममुग होते रहते हैं। वहीं पाकिस्तान और बांग्लादेश में इस्लामी मान्यताओं के चलते महिलाओं को मूलभूत अधिकारों से वंचित रखने की निंदा करते हैं। अब आयरलैंड में भारतीय मूल की दंत चिकित्सक सविता हलप्पनवार की मौत ने तय कर दिया है कि चर्च के बायकारी कानूनों का पालन करने वाला पश्चिमी समाज कितना पाखण्डी है ?    

? प्रमोद भार्गव


सामाजिक नेटवर्क तोड़ रहा है इंटरनेट!

        स बार दीपावली पर हम सबने यह महसूस किया होगा कि अब दिवाली में पहले जैसी उष्मा या ऊर्जा नहीं रही। लोग मिलते भी हैं,तो केवल औपचारिकता की तरह। गले मिलने में भी अब पहले जैसी बात नहीं रही। अब न तो किसी को देखकर भीतर से चरणस्पर्श प्रणाम करने की इच्छा होती है और न ही उनके लिए आदरभाव जाग्रत होता है। सब कुछ मशीनी होने लगा है। आज हमारे पास इतने अधिक संसाधन हैं कि देश-विदेश में पल-पल क्या हो रहा है,इसकी जानकारी रखते हैं।

? डॉ महेश परिमल


स्वागत करें केंद्र सरकार के

ताजा आर्थिक सुधारों का।

       केंन्द्र सरकार के दूसरे दौर के आर्थिक सुधरों पर विपक्षी दलों द्वारा  लगातार विरोध किया जा रहा है। मुख्य विपक्षी दल भाजपा आज डीजल और रिटेल में एफडीआई का पुरजोर विरोध कर रही है लेकिन इसी भाजपा के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार ने ही सबसे पहले पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतों को तय करने वाली प्रशासनिक मूल्य व्यवस्था (एपीएम) को  समाप्त करते हुए पेट्रोल और डीजल की कीमतों को बाजार के हवाले कर दिया था। यही नहीं एनडीए सरकार ने ही खुदरा व्यापार में विदेशी पूॅजी को अनुमति देने को लेकर एक विस्तृत नोट तैयार किया था।     

? डॉ सुनील शर्मा


अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मायने

        भारत जैसे विशाल लोकतांत्रिक देश में नागरिकों को संविधानप्रदत्त अनेक मौलिक अधिकारों में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार अत्यंत महत्वपूर्ण है। परन्तु पिछले कुछ समय से इस अधिकार का कटघरे से जुड़ता नाता चिंताजनक है। वैसे तो किसी भी स्वतंत्रता का दुरुपयोग अनुचित होता है किन्तु अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का उपयोग यदि सावधानीपूर्वक न किया जाए तो सार्वजनिक तौर पर की गई अभिव्यक्ति दुर्भाग्यपूर्ण सिद्ध हो सकती है। इसका खामियाजा जिस तरह भुगतना पड़ सकता है,उसके उदाहरण न केवल चौकाने वाले हैं बल्कि सवाल खड़े करने वाले भी हैं। आखिर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मायने क्या हैं ?

? डॉ ग़ीता गुप्त


  26नवम्बर-2012

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