संस्करण: 26 मई-2014

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हमें अच्छे दिनं का इंतजार है

     बीजेपी के एक पुराने नेता हैं। मौजूदा मोदी सरकार के पहले जब अटल सरकार बनी थी, तब वे उसमें मंत्री बने थे। इन नेताजी ने अटल सरकार के एक वर्ष पूरा होने के उपलक्ष्य में एक खुलासा किया था। इस खुलासे से यह संकेत मिला था कि उस वक्त बीजेपी ने चुनाव में जनता से जो वादे किए थे, वे बस यूं ही किए हैं, उनके पीछे न कोई गभीरता थी न कोई दृष्टिकोण। इन नेताजी का नाम है मोहन गुरू स्वामी।   

? विवेकानंद


इस विजयोत्सव पर

गर्व करने के समानांतर

        म दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र हैं, और सबसे अच्छे लोकतंत्र होने की सम्भावनाओं से भरे हुये हैं। सोलहवीं लोकसभा के लगभग हिंसा रहित चुनावों द्वारा सता के बदलने या कहें उलटने की घटना ने इस विश्वास को और भी बल दिया है। आइए इन परिणामों के उत्सवी माहौल में एक निगाह हाशिये की ओर भी डालें।

              इन चुनावों ने भले ही गत पच्चीस वर्षों से चले आ रहे इस विश्वास को तोड़ दिया है कि बहु राष्ट्रीयताओं, विभिन्न क्षेत्रीयताओं वाले इस देश में कई दलों की गठबन्धन सरकारें ही सम्भव हैं,

?

वीरेन्द्र जैन


बहुत कठिन है डगर मोदी की

     जिस दिन से नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री के पद का उम्मीदवार घोषित किया गया था उसी दिन से इस बात पर चर्चा प्रारंभ हो गई थी कि मोदी किसके एजेण्डे पर अमल करेंगे। यह बात बिल्कुल स्पष्ट है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कारण ही मोदी प्रधानमंत्री के पद को हासिल कर सके हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को पूरा विश्वास है कि मोदी उसके कार्यक्रम को लागू करेगें। इस तरह की खबरें आने लगी हैं कि आरएसएस शीघ्र मोदी के लिये अपने कार्यक्रम का ब्लू प्रिंट तैयार करने वाला है। एक महत्वपूर्ण समाचार पत्र ने यह दावा किया है कि ''मोदी सरकार के लिए संघ का एजेण्डा भोपाल में बनेगा''।

 ? एल.एस.हरदेनिया


'ऐतिहासिक जीत' के वक्त में

आदम अजमेरी का किस्सा

      सोलह साल का शाहवान, जो अहमदाबाद के कालुपुर का रहनेवाला है और अभी भी दसवीं कक्षा के रिजल्ट का इन्तज़ार कर रहा है, वह उस दिन बहुत खुश था जब भारत के मतदाताओं ने अपना फैसला सुनाया। उसने अपनी अम्मी को पकड़ कर हवा में उठाने की कोशिश की और अपने भाई अलमास के साथ मोहल्ले में दौड़ गया। 'हम जीत गए,''हम जीत गए'।

? सुभाष गाताड़े


इन संकेतों को समझें सपा-बसपा-काँग्रेस

             लोकसभा का यह चुनाव परिवर्तनकामी रहा, ऐसा चुनाव नतीजों से साफ हो चुका है। देश के अधिसंख्य मतदाताओं ने परिवारवाद, वंशवाद और राजनीतिक तानाशाही के विरुध्द परिवर्तन को अपनी सहमति दी है। इससे स्पष्ट ही यह संकेत निकले हैं कि हमारा लोकतंत्र और परिपक्व हुआ है तथा आम मतदाता जाति और धर्म की खोल से बाहर निकला है। परिवर्तन लोकतंत्र का स्थायी चरित्र है। पिछले लोकसभा चुनावों के बरक्स यह चुनाव इसलिए भी भिन्न रहा है कि इसमें सर्वाधिक समय तक चुनाव प्रचार किए गए लेकिन आश्चर्य इस बात का है इतने लम्बे समय के दौरान भी दशकों का अनुभव रखने वाले पत्रकार और लम्बे राजनीतिक जीवन वाले राजनेता तक यह समझ नहीं सके कि मतदाता का मिजाज किस तरह बदल रहा है!

 ?  सुनील अमर


चिन्ताजनक है संसद में

बढती अपराधियों की संख्या

           कसर राजनीतिक दल चुनाव से पहले सार्वजनिक मंचों से यह घोषणा करते हैं कि राजनीति का अपराधीकरण लोकतंत्र के लिए अत्यन्त घातक है और  वे इसके खिलाफ कड़े कानून बनायेंगे  और चुनाव में दागियों को टिकट नहीं देंगे, लेकिन जब उम्मीदवार घोषित करने की बारी आती है तो दागी ही उनकी पहली पसंद बनते हैं। दरअसल वे मान बैठे हैं कि दागियों को टिकट देना यानी  चुनाव में जीत को सुनिश्चित करना।

? शशिमान शुक्ला


अब भुगतान करना हुआ और आसान

      मारे देश की गिनती अब उन कुछ गिने-चुने देशों में हो गई है, जिनके अपने पेमेंट गेटवे हैं। यानी काफी मशक्कत के बाद आखिरकार देश ने खुद के द्वारा ईजाद किए गए कार्ड के जरिए पैसे के भुगतान का मार्ग स्थापित कर लिया है। इस पेमेंट गेटवे की शुरूआत के साथ ही वीजा और मास्टरकार्ड की तरह अब ग्राहकों के भुगतान संबंधी सत्यापन का काम रुपे के जरिये किया जा सकेगा। एक तरह से देखें, तो यह वीजा और मास्टकार्ड का भारतीय संस्करण होगा। रुपे कार्ड का इस्तेमाल एटीएम मशीनों से पैसा निकालने, पेट्रोल खरीदने से लेकर तमाम तरह की खरीदारी के लिए किया जा सकेगा।

?  जाहिद खान


संदर्भ-: छोटी बीमारियां भी बन जाएंगी बड़े खतरे की वजह-डब्ल्यूएचओ

शोध में तिकड़म

     एंटी बायोटिक दवाओं को लेकर अर्से से जताई जा रही चिंता ने अब गंभीर रूप ले लिया है। हाल ही में विश्व स्वास्थ्य संगठन ने अपनी एक रिपोर्ट में एंटीबायोटिक दवाओं के विरूध्द पैदा हो रही प्रतिरोधात्मक क्षमता को मानव स्वास्थ के लिए एक वैश्विक खतरे की संबा दी है। इस रिपोर्ट से साफ हुआ है कि चिकित्सा विज्ञान के नए-नए आविष्कार और उपचार के अत्याधुनिक तरीके भी इंसान को खतरनाक बीमारियों से छुटकारा नहीं दिला पा रहे हैं। चिंता की बात यह है कि जिन महामारियों के दुनिया से समाप्त होने का दावा किया गया था,वे फिर आक्रामक हो रही है।

 

? प्रमोद भार्गव


स्वास्थ्य सेवाएं, गरीबों की पहुँच से दूर

        मारे यहां स्वास्थ्य सेवाएं अत्यधिक महंगी हैं जो गरीबों की पहुँच से काफी दूर हो गयी हैं।  स्वास्थ्य, शिक्षा, भोजन, आवास जीवन की मूलभूत आवश्यकताएं हैं। हमारे देश में गरीबों और अमीरों के बीच खाई बेहद चौड़ी हो चुकी है। इसे पटाने का किसी का अभिप्रेत  नहीं है। दरअसल आर्थिक व सामाजिक विषमताएं, स्वास्थ्य की असमान स्थितियों को जन्म देती हैं। कुपोषण तो एक बड़ी समस्या है ही।  हमारे देश की 70 प्रतिशत संपत्ति व स्रोतों पर कुछ हजार से भी कम लोगों ने कब्जा जमा रखा है।       

? शैलेन्द्र चौहान


घातक है-मोबाइल फोन का

बेतहाशा उपयोग ?

      भारत में 31 मार्च 2014 की स्थिति में मोबाइल फोन का इस्तेमाल करने वालों की संख्या 90 करोड़ के ऑकड़े को पार कर चुकी है, और स्मार्टफोन की पहॅुच अब मध्यमवर्गीय नौजवानों तक हो गई हैं। जहॉ एक ओर मोबाइल फोन ने देश की तस्वीर को बदलने में अद्भुत भुमिका निभाई है, इसके जरिए सुचनाओं के आदान प्रदान से आम आदमी की जीवन सहज हुआ है तथा आय में वृद्वि परिलक्षित हुई है वहीं दूसरी ओर इसके हानिकारक पहलू भी सामने आ रहें हैं। गंभीर बात यह है कि हानिकारक पहलू हमारे स्वास्थ्य से जुड़ा हुआ है। वैज्ञानिकों और चिकित्सों के अनुसार मोबाइल फोन मानव जीवन को अनेकानेक गंभीर रोगों की सौगात दे रहें है।

? डॉ. सुनील शर्मा


प्रदूषण की भी राजधानी बनी दिल्ली

        विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक दिल्ली दुनिया का सबसे ज्यादा प्रदूषित शहर है। 91 देशों के 1600 शहरों में कराए गए एक सर्वे में यह बात सामने आई है। 'ऐम्बिएंट एयर पल्यूशन' नामक इस रिपोर्ट के 2014 के संस्करण में 91 देशों के करीब 1600 शहरों में वायु प्रदूषण की स्थिति का ब्योरा दिया गया है। प्रदूषित हवा के मामले में दिल्ली देश का सबसे दूषित राज्य है। एशिया के अन्य सघन आबादी वाले शहरों में भी दिल्ली से कम वायु प्रदूषण है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट से साफ है कि अगर जल्द ही दिल्ली में प्रदूषण को कम करने के उपाय नहीं किए गए तो आने वाले दिनों में बीमारियों में इजाफा हो सकता है। 

? सुनील तिवारी


31 मई : विश्व तम्बाकू निषेध दिवस पर विशेष

क्या तम्बाकू-मुक्त भारतीय समाज की कल्पना साकार हो सकेगी ?

       ज धूम्रपान एवं तम्बाकूयुक्त उत्पादों के सेवन से होने वाली व्याधियों को लेकर पूरी दुनिया चिंतित है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का ध्यान पिछली शताब्दी के नौवें दशक में ही इस ओर केन्द्रित हुआ था। फलत: सन 1987 में विश्व स्वास्थ्य संगठन ने 31मई को विश्व तम्बाकू निषेध दिवस मनाने का निर्णय लिया। ताकि पूरे विश्व में तम्बाकू के सेवन को हतोत्साहित करने के लिए कानून बनाये जाएं और जागरूकता अभियान चलाकर इसके उपयोग को कम किया जा सके।    

? डॉ. गीता गुप्त


  26 मई-2014

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