संस्करण: 26मई-2008

वैश्विक बाजार मे चरखा

प्रमोद भार्गव

 

नाज जिंदा रहने की बुनियादी जरूरत है लेकिन आधुनिक जीवन शैली के लिए जरूरी बना दिए गए औद्योगिक उत्पाद और भोग-विलास के उपकरणों को गतिशील बनाए रखने के लिए ऊर्जा के वैकल्पिक के स्त्रोतों में फसलों के बड़े पैमाने पर इस्तेमाल ने दुनिया भर में खाद्यान्न का संकट पैदा किया हुआ है। लेकिन भारत के कृषि उत्पाद के क्षेत्र में बद्तर हालात जैविक ईंधन के खेतों में उत्पादन की शुरूआत के कारण नहीं हुए, बल्कि घरेलू बाजार व निजी क्षेत्र में बहुराष्ट्रीय कंपनियों को प्रवेश की अनुमति देकर लूट की उन्मुक्तता देने के कारण हुई। वैश्वीकरण के बहाने मुक्त बाजार व्यवस्था के यही गंभीर परिणाम निकलने थे क्योंकि विश्व बैंक, विश्व व्यापार संगठन एवं अंतराष्ट्रीय खाद्य और कृषि संगठनों की चाबी यूरोप के जिन पूंजीपति देशों के हाथ है, उन्हें अपनी शक्ति और वैभव की बरकरारी के लिए गरीबी और भुखमरी का जबरदस्त संकट झेल रहे लोगों की चिंता से कहीं ज्यादा अनाज को जैव ईंधन के लिए कैसे हथियाया जाए इस हसरत पूर्ति में रही।


भू-मण्डलीकरण की आर्थिकी का हश्र एक दिन आशातीत बढ़ती महंगाई और बढ़ते खाद्यान्न संकट में ही निहित था। क्योंकि उदारवाद के बहाने जिन उदारवादी आर्थिक नीतियों को अमल में लाए जाने की शुरूआत डेढ़ दशक पहले हुई थी वे प्रच्छन रूप से आम आदमी, किसान, मजदूर और खेती के अहित के लिए ही एक षडयंत्र के तहत लागू की गई थीं। इन आर्थिक नीतियों के पैरोकार तबके वित्तमंत्री पी चिदंबरम, उनके निष्ठावान अनुयायी अर्थशास्त्री और अदूरदर्शी राजनेताओं ने देश के परंपरागत कृषि प्रधान ढांचे को 1991 में धवस्त करने की जो शुरूआत की वह अब इन्हीं वित्तमंत्री के वर्तमान कार्यकाल में राष्ट्रव्यापी खुदरा व्यापार को चौपट कर लाखों-करोड़ों लोगों को दाने-दाने के लिए मोहताज कर देने के हालात-निर्माण कर देने की स्थिति पर आ टिकी है। साठ हजार करोड़ की कर्जमाफी के प्रावधानों के बावजूद किसानों की आत्महत्या का सिलसिला अभी थमा नहीं है, लेकिन संकेत मिलने लगे हैं कि नई आर्थिकी खुदरा व्यापारियों को भी किसान जैसी भयावह स्थितियों के हवाले करने वाली है।


हमारे देश की आज कृषि की वही दशा है जो फिरंगियों की हुकूमत के दौरान थी। तब किसानों को नील की खेती के लिए विवश किया गया था और अब अमेरिकी दबाव के चलते किसानों को आनुवांशिक रूप से परिवधर्णित बीज बोने और जैविक ईंधन (बायोडीजल) के उत्पादन के लिए मजबूर किया जा रहा है। आनुवांशिक बीजों के बोने से फसल की उत्पादकता घटी, उर्वरा शक्ति प्रभावित हुई और किसान पेटेंट कानून के चलते परंपरागत बीज संग्रह की प्रणाली से वंचित कर दिए गए। अब किसान आत्महत्या न करें तो क्या करें ? जैविक ईंधन की पैदावार को प्रोत्साहित करने से किसान और उपजाऊ भूमि के हालात तो बद्तर होंगे ही खाद्य सुरक्षा का संकट भी बढ़ेगा। जबकि मोनसेंटों और कारगिल जैसी बीज निर्माता कंपनियों का मुनाफा कई गुना बढ़ेगा।
किसान और खेती के दुर्भाग्यजनक परिणाम उस ' कृषि-संधि' के नतीजे हैं जो अमेरिका और भारत के बीच हुई है। इस संधि के तहत अमेरिका ने भारत के खाद्यान्न को एक हथियार के रूप में इस्तेमाल किया है। हेनरी किसिंगर ने बहुत पहले कहा भी था कि अगर अमेरिका तेल को नियंत्रित कर लेता है तो पूरी दुनिया को काबू कर लेगा और खाद्यान्न पर नियंत्रण पा लेते हो तो एक निश्चित जनसंख्या तुम्हारे अधीन होगी। आज अमेरिका के कब्जे में तेल भी है और खाद्यान्न भी ! और इसीलिए वह दुनिया का सिरमौर देश बना बैठा है। इसीलिए विकासशील देशों की अर्थ-व्यवस्था की वल्गाएं उसके हाथों में हैं।


आश्चर्य यह है कि नाभिकीय ऊर्जा संधि को देश की संप्रभुता के लिए खतरा बताने वाले दक्षिणपंथी व वामदल संसद नहीं चलने देते लेकिन जो कृषि संधि किसान, गरीब और मजदूर की रोटी छीन रही है, उसके वजूद के लिए संकट बनी हुई है और देश की स्वतंत्रता व संप्रभुता के लिए भी खतरे की घंटी है, उस संधि पर संसद में देश का संपूर्ण विपक्ष मौन रहता है। आखिर इस चुप्पी की क्या वजह है ? सत्ता पक्ष और विपक्ष का पूंजीवाद और भोगवादी संस्कृति के समक्ष नतमस्तक हो जाना तो नहीं ?

हालांकि मौजूदा खाद्यान्न संकट की गिरफ्त में केवल भारत नहीं है, दुनिया के 36 विकासशील देशों पर भुखमरी की काली छाया मंडरा रही है। इनमें 21 अफ्रीकी देश हैं। भुखमरी की भयावहता तब और मुखर हो गई थी जब खाद्य और कृषि संगठन के प्रमुख जेक्स डियॉफ ने खुलासा किया था कि वर्तमान में जो चार-पांच मिलियन टन का खाद्यान्न भण्डार उपलब्ध है वह दो तीन माह में समाप्त हो जाएगा।

पिछले एक डेढ़ माह में दुनिया भर में आसमान छूती महंगाई ने भयावह हालातों की तसदीक भी कर दी है। 14 देशों में महंगाई से हाहाकार मचा हुआ है। कैमरून में खाद्यान्न लूटने की कोशिशों में 40 से ज्यादा लोग मारे जा चुके हैं। हैती में अनाज के लिए संयुक्त राष्ट्र परिसर का दफ्तर तक आग के हवाले कर देने के प्रयास किए गए। रोकने की कोशिश में पांच नागरिक मारे भी गए। भारत में भी हालत नाजुक हैं। गरीब और आदिवासी इलाकों में अनाज ढुलाई के वाहन व गोदाम लूटने की खबरें आ रही हैं। शायद इसीलिए खाद्यान्न संकट से पल्ला झाड़ लेने की दृष्टि से विश्व बैंक की अंतरराष्ट्रीय खाद्य और कृषि संगठनों ने स्पष्ट कर दिया है कि दुनिया अगले कई सालों तक खाद्यान्न संकट झेलती रहेगी। खाद्यान्न संकट पैदा करने वाले संगठनों के गैर जिम्मेदार बयान भी बढ़ती महंगाई, सामाजिक अस्थिरता, लूट व हिंसा के लिए किसी हद तक जिम्मेदार हैं। क्योंकि यही वे संगठन हैं जो संयुक्त राष्ट्र की देखरेख में भारत समेत अन्य तमाम गरीब मुल्कों में विश्व खाद्य कार्यक्रमों के अंतर्गत सस्ती दरों पर अनाज उपलब्ध करा रहे हैं।


हालांकि बदले हालातों में पी चिदंबरम अब चिंतित दिखाई दे रहे हैं। वाशिंगटन में आयोजित विश्व बैंक समिति की बैठक में उन्होंने अमेरिका का नाम लिए बिना चेताया भी कि ऊर्जा के वैकल्पिक स्त्रोतों को विकसित करने के लिए गेहूं, मक्का और सोयाबीन का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल न किया जाए। क्योंकि ऊर्जा और उर्वरक के दाम बढ़ने से ही दुनिया में खाद्यान्नों के दाम बढ़ रहे हैं। यह सह भी है कि खाद्यान्न का ईंधन के रूप में रूपांतरण न तो गरीबों के लिए उचित है और न पर्यावरण सुरक्षा के लिहाज से उचित है।
ऐसे ही हालातों से उपजे खाद्यान्न संकट और महंगाई के मद्देनजर हमारी सरकार ने पहली मर्तबा कृषि भूमि के व्यावसायिक इस्तेमाल को अनावश्यक माना है। जैविक ईंधन के लिए कृषि भूमि और खाद्यान्न के उपयोग को भी सीमित करने पर पिछले चार साल में पहली बार विचार करने को विवश हुई है। इसके साथ ही इस सवाल पर भी विचार करने की जरूरत है कि कृषि की वर्तमान कार्य पध्दतियां क्या खाद्य सुरक्षा के लिए संकट का सबब तो नहीं ? क्योंकि हकीकत को छिपाने के लिए अभी भी अर्थशास्त्री खाद्यान्न संकट के जो कारण गिना रहे हैं उनमें गरीबी का मखौल उड़ाते हुए एक कारा यह भी है कि गरीबों ने ज्यादा भोजन करना शुरू कर दिया है। इंसान कितना भी भोजन करे पेट की सामर्थ्य से ज्यादा भोजन तो वह किसी भी हाल में नहीं कर पाएगा ? फिर क्या उसे भर पेट आहार से केवल इसलिए वंचित कर दिया जाए कि वह गरीब है ? जैविक ईंधन की उपयोगिता बढ़ाने की शर्त पर गरीब के आहार को सीमित कर देने की शर्त नहीं रखी जा सकती ? दरअसल ऐसे आर्थिक विश्लेषण ही भू मण्डलीकरण से उपजी बाजारू मानसिकता की देन हैं, जो गरीब को आहार से वंचित कर एक बढ़ी आबादी को खत्म कर देने पर आमादा है।

प्रमोद भार्गव