संस्करण: 26मई-2008

'भैया मोदी' के राज में असुरक्षित बहनें

सुभाष गाताड़े

 

क्यसूबा गुजरात के कई सारे सरकारी महकमे यह भी नहीं जानते कि वर्ष 1997 में विशाखा जजमेण्ट में कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न को रोकने के लिए सर्वाच्च न्यायालय ने दिशानिर्देश जारी किए थे।
एक राष्ट्रीय अख़बार में (इण्डियन एक्सप्रेस, 24 अप्रैल 2008, सैक्सुअल हैरेसमेण्ट पैनल ....) में छपी रिपोर्ट इसी कड़वी हकीकत की ओर इशारा करती है। दरअसल हुआ यह कि पिछले दिनों गुजरात के चर्चित मानवाधिकार कार्यकर्ता एवम टेरड यूनियन नेता रोहित प्रजापति ने सूचना के अधिकार का इस्तेमाल करते हुए इस मामले में जानकारी इकट्ठा करने की कोशिश की और इसी में यह सच्चाई उजागर हुई।

 

राज्य स्वास्थ्य विभाग और गुजरात पवित्रा यात्राधाम विकास बोर्ड ने लिखा कि यौन प्रताडना कमेटी बनाना उनका सरोकार नहीं है और न उन्होंने ऐसी कमेटी बनायी है। अहमदाबाद स्थित कालेज आफ नर्सिंग का जवाब अधिक चिन्ताजनक था। इन्स्टिटयूट कहती है कि उसके पास ऐसा कोई निर्देश नहीं आया है कि ऐसी कमेटी बनायी जाए। गौरतलब है कि उपरोक्त कालेज में कई छात्राएं पढ़ती हैं। दूसरी तरफ गुजरात स्टेट कोआपरेटिव ट्रिब्युनल का जबाव भी मजेदार था, उसके मुताबिक उनके यहां महज तीन महिला कर्मचारी हैं, वे सभी शादीशुदा हैं एवम वयस्क हैं तथा वे ऐसी समस्याओं का समाधान जानती हैं। इसलिए हमें ऐसी कमेटी की आवश्यकता नहीं पड़ती, अलबत्ता हम इसे बनाने की प्रक्रिया में है।

 

यह बात कोई भी मानेगा कि यौन प्रताडना कमेटी को लेकर कायम विराट मौन एक तरह से समाज में स्त्रियों की वास्तविक स्थिति का सूचक है।

 

यह अकारण नहीं कि स्त्रियों के खिलाफ बर्बर किस्म की हिंसा के मामले में - भ्रूण हत्या या दहेज हत्या में - यह राज्य बढ़ चढ़ कर आगे है। पंजाब, देहली, हरियाणा के साथ मिल कर गुजरात उन राज्यों में शुमार है जहां स्त्री-पुरूष अनुपात काफी विषम है। गुजरात में तो हर 1,000 लड़कों के पीछे 670 लड़कियां दिखती हैं।

इतना ही नहीं किसी को भी यह सुनकर आश्चर्य तथा शक हो सकता है कि इस राज्य में हर साल स्टोव फटने से तीन सौ से ऊपर महिलाएं मरती हैं। और यह मौतें एक ऐसे समय में हो रही है जब पम्प करनेवाले स्टोव की तुलना में - जिसकी फटने की सम्भावना अधिक रहती है - बाती स्टोव अधिक उपयोग में आता है, जिसके फटने का कोई सवाल ही नहीं उठता। ताज्जुब की बात यह है कि हर साल ऐसी घटनाओं के रेकार्ड पुलिस थानों में दर्ज होने के बावजूद उन्हें इन मौतों पर सन्देह नहीं होता और दुर्घटना का मामला दर्ज किया जाता है और फाइल बन्द की जाती है। सन 2005 में जहां पूरे राज्य में 343 महिलायें ऐसी दुर्घटनाओं का शिकार हुईं तो वर्ष 2006 के नवम्बर माह तक यह आंकड़ा 330 पार कर चुका था। इनमें अधिकतर महिलायें नवविवाहिता थीं।

 

साफ है जिस समाज में स्त्रियों की प्रोजेक्टेड छवि और वास्तविक हक़ीकत में इतना अन्तराल हो, वहां के शिक्षा संस्थान स्त्री विरोधा प्रताडना से कैसे मुक्त रह सकेंगे ? यह अकारण नहीं कि सूबा गुजरात के अग्रणी अख़बारों मे आए दिन शिक्षा संस्थानों में बच्चियों या महिलाओं के साथ होने वाले अत्याचारों की ख़बरें आती रहती हैं। कुछ कतरनें गौर करनेलायक हैं। पिछले दिनों बरोडा के रतनपुरा गांव स्थित आश्रम शाला की एक 'विकलांग' लड़की पर स्कूल के एक हंगामी कर्मचारी 'मानसिंह मोहनभाई' ने बलात्कार किया। राज्य के नखत्राणा तालूका 'पानेली' गांव के प्राथमिक शाला के शिक्षक भरत परमार ने शाला में 9 वीं कक्षा में पढ़ रही एक छात्रा पर बलात्कार किया। इस घटना के करीब 20 दिनों बाद पुलिस ने केस दर्ज हुआ। वलसाड जिला धारमपुर के खांण्डा ग्राम स्थित आश्रम शाला में एक नाबालिग बच्ची के साथ शिक्षक ने बलात्कार किया। गांववालों ने आरोपी शिक्षक को पीटकर गांव से बाहर कर दिया।

 

अभी ज्यादा वक्त नहीं बीता कि पाटन जिले के बीटीसी कालेज में एक दलित छात्रा तथा उसके अन्य सहपाठियों के साथ कालेज के छह शिक्षकों द्वारा लम्बे समय तक जारी यौन अत्याचार का मामला सूर्खियों में था, जिसे लेकर व्यापक आन्दोलन भी खड़ा हुआ था। मोदी एवम उनकी हुकूमत के प्रति आम तौर पर सहानुभूतिपूर्ण रवैया अख्तियार करनेवाले गुजराती मीडिया ने भी यह बात सामने लाने की कोशिश की थी कि बलात्कार के आरोप में पकड़े गए छह  अध्यापको किस किस्म का सियासी रसूख रखते हैं, यहां तक यह भी उजागर किया था कि इन बलात्कारी अध्यापको का नेता 2002 के चुनावों में सत्ताधारी पार्टी की वरिष्ठ  नेता राठी का चुनावी एजेण्ट था।तथ्य बताते हैं कि बलात्कार के उपरोक्त प्रसंग ने मोदी सरकार की गहरी असम्वेदनशीलता को बेपर्द किया था। पीड़िता एवम अन्य छात्रों एवम अभिभावकों के साथ 'व्यस्तता' का बहाना बना कर मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी मिले भी नहीं थे।

 

पाटण काण्ड के उजागर होने के बाद यह बात प्रखरता से सामने आयी कि गिनेचुने शिक्षा संस्थानों को छोड़ दें तो ज्यादातर शिक्षा संस्थानों में ऐसी कोई जेण्डर सम्वेदनशीलता कमेटी बनी नहीं है। दूसरी तरफ आंकड़ें बताते हैं कि महिला एवम बाल कल्याण मंत्रालय - जिसका जिम्मा भी फिलवक्त आनन्दीबेन पटेल के साथ है - के पास ऐसे जो आंकड़े इकट्ठा होते हैं उनका बहुलांश शिक्षा विभाग से आनेवाली यौन हिंसा सम्बन्धी शिकायतों का ही होता है।

 

कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न रोकने के लिए सर्वोच्च न्यायालय के दिशानिर्देशों के अनुपालन की स्थिति देशभर के किसी भी राज्य में या प्रतिष्ठान में सन्तोषजनक नहीं कही जा सकती, अलबत्ता एक के बाद एक उजागर होते ऐसे काण्ड इसी बात का परिचायक हैं कि सूबा गुजरात इस मामले में अधिक फीसड्डी साबित हुआ है।

 

गुजरात के शिक्षा संस्थानों में छात्रायें क्या महिला शिक्षक भी सुरक्षित नहीं है, यह कटु सच्चाई पिछले दिनों भगवतीबेन पटेल नामक चालीस साला अध्यापिका  की आत्महत्या के बाद उजागर हुई। अहमदाबाद के रानीप इलाके के नवचेतन हाईस्कूल की  अध्यापिका भगवतीबेन पटेल ने अपनी जीवनलीला खुद समाप्त की। दरअसल उनकी एक ही पीड़ा थी ,स्कूल की अध्यापकाओ  का अपना असुरक्षित जीवन और स्कूल के ट्रस्टी दिनेश पटेल द्वारा पिछले एक साल से की जा रही उनकी यौन प्रताडना, जो काफी पहुंचवाला आदमी था।

 

अपने सुसाइड नोट में भगवतीबेन ने लिखा था कि आखिर ऐसे शिक्षा संस्थानों के चलने की इजाजत कैसे दी जा सकती है जहां बच्चों के भविष्यनिर्माण में लगी अध्यापकाए  खुद अपने पुरूष साथियों के हाथों या अपने वरिष्ठ अधिकारियों के हाथों यौन उत्पीड़न का शिकार होती रहें। उन्होंने ऐसे स्कूलों को बन्द करने की और इसके कामकाज की सीबीआई जांच करने की भी मांग की थी।

 

बताया जाता है कि यही वह स्कूल है जहां सूबा गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी अपना वोट डालने आते हैं। भगवतीबेन ने अपना खत उन्हीं के नाम लिखा है। यह कहना मुश्किल है राष्ट्रीय राजनीति में अपनी छवि बनाने में फिलवक्त मुब्तिला जनाब मोदी इस मामले से उभरे सवालों से रूबरू होने की कोशिश करेंगे।
यह जुदा बात है कि पिछले रक्षाबन्धान पर उन्होंने इस बात को लेकर काफी ढोल पीटा था कि समूचे सूबे से उनके पास कितनी हजार राखियां आयी हैं।


सुभाष गाताड़े