संस्करण: 26मई-2008

दलित की बेटी और दलितों की बेटियाँ

वीरेन्द्र जैन

 

रक्षण सामाजिक समरसता स्थापित करने और जातिवाद मिटाने का बहुत कमजोर तरीका है किंतु जब तक हमारे पास उससे अच्छा तरीका नहीं मिल जाता तब तक उसे जारी रहना चाहिये। आरक्षण यों तो एक कमजोर और दलित व पिछड़ी जाति को बराबरी पर लाने हेतु की गयी व्यवस्था है पर वह किसी जाति के लिए नहीं अपितु व्यक्ति को दिया जाता है। यह आवश्यक नहीं कि व्यक्ति को दिया गया लाभ हमेशा ही जाति को मिले। आज तो व्यक्ति-व्यक्ति के बीच बँटते जा रहे समाज में यह लाभ व्यक्तियों से समाज तक कम ही पहुँच पा रहा है। जिन्हें मिल गया होता है वे कई बार तो अपनी जाति के उल्लेख को ही छुपाने लगते हैं जिससे उसका प्रभाव अपने लक्ष्य से दूर रहता है।

 


उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री और बहुजन समाज पार्टी की सुप्रीमो मायावती जातिवाद के नाम पर व्यक्ति को मजबूत किये जाने और सामाजिक उत्थान के लिए तय की गयी सुविधाओं को व्यक्ति विशेष तक केन्द्रित होते जाने का प्रत्यक्ष उदाहरण हैं। इतना ही नहीं जब लाभ लेने का सवाल आता है तो वे मायावती(व्यक्ति) से दलित की बेटी(जाति समूह का शिखर) हो जाती हैं पर जब दलित शोषित कार्यकर्ताओं द्वारा उन्हें दिये गये करोड़ों रूपयों के बैंक में जमा करने का सवाल आता है तो खाता न जाति संगठन के नाम खुलता है न पार्टी के नाम अपितु वह केवल और केवल मायावती के नाम पर खुलता है, जो अचल सम्पत्ति खरीदी जाती है वह मायावती या उनके निकट रिश्तेदारों के नाम पर ही खरीदी जाती है।

 

दल में कोई आंतरिक लोकतंत्र नहीं है क्योंकि उन्होंने जिन दलित जातियों के नाम पर संगठन जोड़ा है उन दलितों पर उनका भरोसा नहीं है और वे स्वयं भी उन्हें इतना योग्य व क्षमतावान नहीं समझतीं कि उन्हें कोई जिम्मेवारी दे सकें, इसलिए पार्टी सुप्रीमो भी वे ही रहती हैं और मुख्यमंत्री भी वे ही बनती हैं। अगर बिना पद दिये वे किसी को काम का आदमी समझती हैं तो वो भी दलित नहीं होता। उसके दलित न होने का उनका तर्क योग्यता का होता है, जो असल में वही तर्क है जो सवर्ण लोग नौकरियों में दलितों के कमजोर काम पर प्रतिक्रिया करते समय देते हैं।

 

मायावती को दलितों से वोट उगाहने होते हैं इसलिए वे दलित की बेटी बन जाती हैं। वैधा और अवैधा की चिंता किये बिना बटोरे धान से हीरों का मुकुट केवल मायावती पहिनती हैं व दलितों की अन्य बेटियों के कानों में नीम की सींक ही पड़ी रहती है। उनकी पार्टी में चन्दे का कोई हिसाब किताब नहीं रखा जाता। उनके यहाँ कोई फाइल नहीं होती। उनके यहाँ कोई सांगठनिक चुनाव नहीं होते। दलितों को उनकी समस्याओं से मुक्ति के सुखद सपने दिखाकर उनसे वोट झटक लेने के अलावा वे ना तो कृषि की समस्याओं पर बात करना पसंद करती हैं, न मिल मजदूरों की समस्याओं पर, जैसे दलितों की एकमात्र समस्या दलित जाति की बेटी को मुख्यमंत्री बनवाना हो। उनकी रैलियाँ मँहगाई और बेरोजगारी के खिलाफ नहीं होतीं अपितु या तो वे उनके जन्मदिन पर होती हैं या चुनाव के अवसर पर मतदाताओं को उस व्यक्ति की पहचान कराने के लिए होती हैं जिसने उनसे टिकिट पा लिया होता है। दलितों को उनकी पार्टी के ज्यादातर टिकिट आरक्षित सीटों पर ही दिये जाते हैं व गैर आरक्षित सीटों पर उन लोगों को दिये जाते हैं जो 'पार्टी चलाने के लिए' उनके व्यक्तिगत नाम पर बड़ी बड़ी रकम भेंट देते हैं। टिकिट देने का घोषित फार्मूला तो देश की कई बड़ी बड़ी पार्टियों के पास भी नहीं हैं तो फिर मायावती की इकलौते वर्चस्व वाली पार्टी के पास होने का तो सवाल ही नहीं उठतां।

 

हमारी व्यवस्था का दुर्भाग्य यह है कि इसमें शोषण के विरूध्द संघर्ष करने वालों की स्थिति यह है जैसे कि बलात्कार के खिलाफ रिपोर्ट लिखाने वाली महिला की रिपोर्ट लिखने वाला थानेदार ही खुद यौनशोषण करने लगे जो लोग शोषण से मुक्ति का झन्डा लेकर आते हैं उनमें से अनेक देर सवेर खुद ही शोषक या शोषकों के दलालों में बदल जाते हैं।

 

मायावती ने अपने वर्चस्व के विस्तार के लिए बहुजन समाजपार्टी के मूल आधार को ही उलट दिया है और उनके एक साल के कार्यकाल को देख कर ऐसा भी नहीं लगता कि सवर्णों के समक्ष अपने दल का समर्पण करके उन्होंने दलितों के हित में कोई बेहतर कूटनीतिक कदम उठा लिये हों। उत्तर प्रदेश के गाँवों की दशा को देखते हुये लगता है कि मंत्री बनते समय मायावती के पैर छूने वाले सवर्ण अपने गाँवों में अपने ब्राम्हण समर्थकों को जुटाये रखने के लिए पुराने भेद भाव को ही सत्ता की ताकत पाकर और तेजी से बढा रहे हैं क्योंकि वे जानते हैं कि उनकी वर्तमान स्थिति में उनको मिलने वाले ब्राम्हण समर्थन को जुटा कर रखने की बड़ी भूमिका है। नई सरकार में जिन ब्राम्हणों को महत्व दिया गया है उनके समर्थकों ने बहुजन समाज पार्टी की सदस्यता लेना आवश्यक नहीं समझा है और ना ही उनके मन में बहुजन समाज पार्टी के गठन की भावना के प्रति कोई सम्मान है। उनका साथ तो केवल उनकी उच्च जाति के प्रतिनिधि को सत्ताधिकार में हिस्सा देने के लिए मजबूरी में किये गये समझौते की तरह है। वे केवल चुनाव और सत्ता में हिस्सेदारी के लिए मिले हैं और जातिवादी भेद भाव मिटाने में ना तो उनका विश्वास है और ना ही उन्होंने ऐसा कोई कार्यक्रम ही बनाया है। गत दिनों अम्बेडकर के जन्मदिन के अवसर पर आयोजित सम्मेलनों में सवर्णों की उपस्थिति ना के बराबर रही। यह विचारणीय प्रश्न है कि अम्बेडकर के सिध्दांतों में आस्था रखे बिना कोई कैसे बहुजन समाज पार्टी का सदस्य पदाधिकारी, विधायक और मंत्री हो सकता है।

 

मायावती ने अभी तक अपनी कोई सैकिन्ड लाइन नहीं बनायी है जबकि उनके ऊपर लालूप्रसाद से अधिक आर्थिक अनियमतताओं के आरोप है। लालू जी की तो खैर एक पत्नी हैं जिन्हें मौका आने पर मुख्यमंत्री की कुर्सी सम्हलवा दी गयी थी जिससे घर की बात घर में ही रह गयी थी पर मायावती को तो ऐसी भी कोई सुविधा प्राप्त नहीं है। ऐसी कोई नौबत आने पर उन्हें जिसे सत्ता व संगठन की चाबी सोपना पड़ेगी उससे बहुजन समाज पार्टी की आत्मा ही मर जायेगी। क्या ऐसी स्थिति में मायावती अपना दलित समर्थन सुरक्षित रख सकेंगीं। उनकी इस कमजोरी के रहते यह भी संभव है कि ऐसी नौबत लाने के लिए राजनीतिक दल अधिक सक्रिय हों जिनमें संघ परिवारी जो हथकझडों की ही राजनीति करते हैं, विशेष भूमिका अदा करें।
क्या 'दलित की बेटी ने दलितों की बेटियों के बारे में सोचना छोड़ दिया है!

वीरेन्द्र जैन