संस्करण: 26मई-2008

मच्छर पर फ़तह पाने की कोशिश

महेश बाग़ी

 

पूरी दुनिया में एड्स का हौवा है और हेपेटाइटिस के ख़तरों का शोर मचाया जा रहा है, जबकि इन दोनों से ख़तरनाक रोग है मलेरिया। हालांकि चिकित्सा विज्ञानी इस पर नियंत्रण पाने के लिए लगातार शोध कार्यों में जुटे हुए हैं, लेकिन उन्हें अब तक सफलता नहीं मिली है। मच्छरों से सिर्फ़ मलेरिया ही नहीं, बल्कि डेंगू, जापानी इंसेफेलाइटिस और फाइलेरिया (हाथी पांव) जैसी घातक बीमारियां भी होती हैं। चिकित्सा विज्ञान ने मच्छरों पर नियंत्रण पाने की अब तक जो कोशिशें की हैं, वे नाकाम रही हैं। इसके विपरीत मच्छरों ने अपना प्रभाव क्षेत्र बढ़ा लिया है। पहले मच्छर का जन्मस्थान गंदे पानी में भी प्रजनन करने लगा है। अब आशा की एक किरण् दिखाई दी है। भारत और जापान के चिकित्सा विज्ञानियों ने ऐसा टीका तैयार करने का दावा किया है, जो मलेरिया की रोकथाम कर सकेगा, मगर अभी इसका परीक्षण होना तथा इसका प्रभाव क्षेत्र बढ़ाना शेष है। ऐसे में मानव को मच्छरों के ख़िलाफ अपनी जंग अभी जारी रखना होगी।

 

मच्छरों ने चिकित्सा विज्ञान को कितना थका दिया है, इसका एक उदाहरण यह भी है कि अब तक मलेरिया नियंत्रण के लिए जिस क्लोरोक्वीन नामक दवा का इस्तेमाल किया जाता रहा है, उसके विरूध्द मच्छरों में प्रतिरोधक क्षमता बढ़ने लगी है। साफ़ पानी में पैदा होने वाले मच्छरों द्वारा उत्पन्न डेंगू की अभी तक कोई मारक दवा नहीं खोजी जा सकी है, टीका तो बहुत दूर की बात है। इसी तरह जापानी इंसेफेलाइटिस की भी कोई कारगर दवा उपलब्ध नहीं है। यद्यपि इंसेफेलाइटिस का काम-चलाऊ टीका तैयार कर लिया गया है, तथापि उसके अत्यधिक महंगे होने के कारण उसे टीकाकरण कार्यक्रम में शरीक करना संभव नहीं है। इसके लिए लगभग सौ अरब का बजट चाहिए जिसे उपलब्ध कराना सरकार के बूते से बाहर है। जहां तक फाइलेरिया का सवाल है तो इसका भी टीका उपलब्ध नहीं है और सिर्फ़ दवाओं से ही काम चलाया जा रहा है।

 

मलेरिया का मामला तो लगभग पूरी दुनिया के सामने चुनौती के समान है। दुनिया में हर साल लगभग 50 करोड़ लोग इस रोग की गिरफ्त में आते हैं, जिनमें से 10 लाख से भी ज्यादा मौत के मुंह से चले जाते हैं। भारत में पी.फाल्सीपरम मलेरिया के मामले अधिक सामने आते हैं, जिसके सही-सही आंकड़े उपलब्ध  नहीं हो सके हैं। इसकी वजह यह है कि कस्बे तथा ग्रामीण अंचलों के रहवासी स्थानीय झोलाछाप चिकित्सकों या नीम-हकीमों तक ही सीमित होकर रह जाते हैं। मच्छरों के प्रति विज्ञान की नाकामी के चलते हमारा स्वास्थ्य मंत्रालय इस बात पर ज़ोर दे रहा है कि मच्छरों की प्रजनन दर घटाई जाए तथा लोगों को मच्छरों के संपर्क से दूर रखा जाए। इसके लिए मच्छरों को पनपने वाले स्थानों पर डीडीटी आदि के छिड़काव की योजनाएं हैं, जिन्हें नगर निगम, नगर पंचायत आदि स्थानीय एजेंसियां संचालित करती हैं। यदि सप्ताह में एक बार दवा का छिड़काव हो तो मच्छरों की प्रजनन दर कम की जा सकती है, लेकिन ऐसा हो नहीं पाता है। अब तो हालात यह हैं कि साल में एक बार भी दवा का छिड़काव नहीं होता है और सारी कार्रवाई काग़जों में ही निपटा दी जाती हैं। ऐसे में मच्छरों की संख्या तथा प्रजनन दर बढ़ना स्वाभाविक है।

 

मच्छरों की प्रजनन दर कम करने का दूसरा उपाय यह खोजा गया है कि जलभराव वाले क्षेत्रों में मच्छरों के लार्वा खाने वाली मंबूशिया तथा गप्पी नामक मछलियों को छोड़ा जाए। हालांकि यह बहुत प्रभावी उपाय है, किंतु नौकरशाही की उदासीनता के कारण यह अभियान भी अपेक्षित परिणाम नहीं दे पा रहा है। नतीजतन मच्छरों की प्रजनन दर तेज़ी से बढ़ती जा रही है। इनमें मादा मच्छर की दर तो वैसे ही तेज़ होती है। एक बार मानव रक्त पीने के बाद वह दो से तीन बार अंडे देती है। अंडे से लार्वा, लार्वा से प्यूपा और प्यूपा से मच्छर बनता है। अंडे देने से मच्छर के सक्रिय होने तक की प्रक्रिया में सात दिन का समय लगता है। इस दौरान यदि प्रजनन वाले स्थान पर डीडीटी, थ्री टेक्स आदि का छिड़काव हो जाए तो अंडे, लार्वा तथा प्यूपा के नष्ट होने की संभावना 80 से 90 प्रतिशत तक रहती है। एक मच्छर की औसत आयु लगभग 21 दिनों की होती है। एक मच्छर रात में कम से कम चार बार काटता है। इसका अर्थ यह हुआ कि वह 12 बार प्रजनन करता है। इसी कारण मच्छरों की संख्या में निरंतर इज़ाफ़ा हो रहा है। मच्छरों से बचाव के नाम पर बाज़ार में उपलब्ध तमाम टिकिया, क्वाइल, लोशन आदि प्रभावी नहीं हैं। हालांकि इन्हें बनाने वाली कंपनियां 10 से 12 घंटे तक प्रभाव का दावा करती हैं, लेकिन हकीकत यह है कि 4 से 5 घंटे बाद इनका प्रभाव कम होने लगता है तथा मच्छरों ने इनसे निपटने की भी प्रतिरोधक क्षमता विकसित कर ली है। इसके अलावा इन साधानों के साइड इफेक्ट भी हैं। खासकर दमा रोग होना इसका सबसे खतरनाक इफेक्ट है। ऐसे में सिर्फ़ मच्छरदानी ही एकमात्र सुरक्षित तथा प्रभावी बचाव का तरीका है।

 

एक ओर जहां मच्छर अपना प्रभाव तथा क्षमता बढ़ाने में लगे हैं, वहीं चिकित्सा विज्ञान भी उन पर नियंत्रण पाने की अपनी कोशिशों में दिन-रात जुटा है। जबलपुर स्थित राष्ट्रीय मलेरिया अनुसंधान संस्थान के वैज्ञानिकों ने अमेरिका के सहयोग से ऐसा प्रायोगिक टीका बनाने में सफलता हासिल कर ली है, जो मलेरिया का मुकाबला कर सकेगा। हालांकि इसका मानवीय परीक्षण बाकी है और इसका लाभ सिर्फ़ दो साल तक के बच्चों को ही मिल सकेगा। संस्थान ने इसके प्रायोगिक परीक्षण की तैयारियां पूरी कर ली हैं और निकट भविष्य में इसकी सफलता की आशा की जा रही है। इसी के साथ यह टीका तैयार करने के लिए दवा कंपनियों से भी अनुबंध की कार्रवाई जारी है। इस सफलता के बाद इस दिशा में अनुसंधान किया जाएगा कि दो वर्ष से अधिक उम्र के लोगों को यह टीका किस तरह लाभ पहुँचा सकेगा। बहरहाल, मच्छरों से जारी जंग में चिकित्सा विज्ञान सफलता के नज़दीक है। उम्मीद की जाना चाहिए कि इसमें उसे और सफलता मिले, ताकि मानव को मलेरिया के महाजाल से मुक्ति मिल सके।

महेश बाग़ी