संस्करण: 26  दिसम्बर- 2011

साम्प्रदायिक राजनीति की विद्रूपता

   

? राजीव कुमार यादव

                   निर्दोष राजा डंकन की हत्या में सहभागी बनने के बाद लेडी मैकबेथ बार-बार अपने हाथ धोती है। लेकिन उसके हाथ से खून नहीं मिटता और उसका अपराध लगातार उसका पीछा करता है। विश्वप्रसिध्द नाटक मैकबेथ के इस दृश्य को शेक्सपीयर ने एक भावपूर्ण और सशक्त उक्ति जिसका हिंदी में अर्थ है 'अरब के सारे इत्रों से हाथ धोने के बावजूद खून की गंध नहीं मिटेगी' से किया है। आज शेक्सपीयर का यह विश्वप्रसिध्द वाक्य गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी पर बिल्कुल सटीक बैठता है। जिनका,बार-बार सद्भावना उपवास करने के बावजूद गुजरात 2002 और उसके बाद के फर्जी मुठभेडों में निभाई गयी बदनाम भूमिका पीछा नहीं छोडती। ताजा मामला 2004 में मुम्बइ से अहमदाबाद ले जा कर फर्जी मुठभेड में मारी गयी इशरत जहां और बाकी तीन लोगों का है। जिसमें ठीक उसी दिन सीबीआई ने 20 दोषी पुलिसकर्मियों पर हत्या का मुकदमा दर्ज किया जिस दिन नरेंद्र मोदी सद्भावना उपवास पर बैठे थे।

                     दरअसल इशरत जहां का फर्जी एंकाउंटर हमारे समय की एक अहम त्रासदी है जिसके व्यापक अर्थ हैं। सिर्फ इसलिये नहीं कि इसमें अपने घर को चलाने वाली एक उन्नीस वर्षीय निर्दोष लडकी समेत तीन लोगों को आतंकी बताकर मार दिया गया था या इस फैसले से न्यायतंत्र में लोगों का विश्वास बहाल होगा। बल्कि इसलिये कि इससे एक बार फिर साबित हुआ कि अगर न्याय की लडाई बिना डरे निरंतर लडी जाये चाहे लडनेवाली कोई साठ साल की बुजुर्ग और विधवा ही क्यों न हो उसके सामने ताकतवर से ताकतवर सरकारें भी पस्त होती हैं,और इसलिये भी कि इससे साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण के आधार पर की जानेवाली राजनीति की विद्रूपता भी उजागर होती है।

                  दरअसल,जो लोग मुम्बई के मुम्ब्रा इलाके के एक छोटे से घर में रहने वाली इशरत की विधवा मां शमीमा कौसर को जानते हैं उन्हें पता है कि आज 7 साल के बाद यह केस जिस स्थिति में पहुंचा है उसका सारा श्रेय उन्हीं के संघर्ष को जाता है। वर्ना फर्जी मुठभेडों में मारे तो बहुत लोग जाते हैं लेकिन पुलिस और सरकार से कहां कोई लडने का साहस दिखाता है। अभी कुछ दिनों पहले ही इन पंक्तियों के लेखक के बुलावे पर आजमगढ आयीं शमीमा कौसर ने हजारों लोगों के बीच दृढविश्वास से कहा था कि इंसाफ की यह लडाई सिर्फ उनकी अपनी लडाई नहीं है बल्कि लोकतंत्र और उसके द्वारा दिये गये जीने के अधिकार के पुर्नबहाली की लडाई है। जाहिर है इशरत के हत्यारों पर मुकदमा दर्ज होना उनके और इन मूल्यों में यकीन रखनेवालों के लिये हौसला अफजाई की खबर है।

                  वहीं इस घटना ने अल्पसंख्यक विरोध को राष्ट्रवाद बतानेवाली विचारधारा और बहुसंख्यकों में अल्पसंख्यकों से असुरक्षाबोध पैदाकर की जानेवाली राजनीति को भी बेनकाब कर दिया है। आखिर आज नरेंद्र मोदी से यह जरूर पूछा जाना चाहिये कि जब से उनकी सुरक्षा के जिम्मेदार डी डी वंजारा और नरेंद्र अमीन जैसे वरिष्ठ पुलिस अधिकारी कुछ दूसरे फर्जी मुठभेडों में जेल भेजे गये, उसके बाद उन पर कोई आतंकवादी हमला करने क्यों नहीं आया? यहां गौरतलब है कि इशरत जहां की हत्या को सोहराबुदीन शेख की फर्जी मुठभेड की तरह ही यह कह कर जायज ठहराने की कोशिश की जा रही थी कि वह अपने साथियों के साथ मोदी की हत्या करने आयी थी।

                 दरअसल नरेंद्र मोदी जिस राजनीतिक विचारधारा का प्रतिनिधित्व करते हैं उसका समता और धर्मनिरपेक्षता जैसे संवैधानिक मूल्यों में न तो कोई आस्था है और न उसके पास जनता के वास्तविक मुद्दों पर ही कोई ठोस कार्यक्रम है। ऐसे में समाज के ही एक छोटे से हिस्से को समस्या की जडबताना और उस पर लगातार हमला वर रहना ही उसे सत्ता प्राप्ति का आसान रास्ता लगता है। इसीलिये जब हम इस राजनीतिक विचारधारा के इतिहास में झांकते हैं तो कभी वह अल्पसंख्यकों के तुष्टिकरण के आरोप में पिछली सदी के सबसे बडे अहिंसा के पुजारी की हत्या करती दिखती है तो कभी हर समस्या की जड एक चार सौ साल पुरानी मस्जिद को बताकर उसे गिराते दिखती है तो कभी वो ग्राहम स्टेंस और उनके दो मासूम बच्चों को या इशरत को देशद्रोही बताकर जलाती-मारती दिखती है।

                   जाहिर है ऐसे में अगर इशरत जैसे किसी मामले में इंसाफ होता दिखता है तो इससे संविधान और लोकतंत्र के भविष्य के प्रति भी उम्मीद बढती है।

                     लेकिन यहीं यह निराश करने वाला सवाल भी उठता है कि क्या धर्मनिरपेक्षता और जीने के अधिकार जैसे संवैधानिक मूल्यों को बचाने की जिम्मेदारी सिर्फ पीडित परिवारों को है?क्या ऐसे मामलों में अपने को धर्मनिरपेक्ष बताने वाले राजनीतिक दलों की कोई जिम्मेदारी नहीं होनी चाहिये?


? राजीव कुमार यादव