संस्करण: 26  दिसम्बर- 2011

पक्षाघात की राजनीति

? टी.के.अरुण

                  सरकार के पक्षाघात के बारे में बहुत ज्यादा चिन्ताएं है। निर्णय या तो मंत्रियों द्वारा नही लिये जा रहे है या फिर नौकरशाहों द्वारा। ऐसी दुविधाएं योजनाओं को रोकती है और निवेश को बंद कर देती है। विकास की गति को चोंट पहुँची है, बैंकों के डूबत ऋण  में लगातार वृध्दि हो रही है, बैंक अपने निर्धारित न्यूनतम स्तर तक भी ऋण नही बॉट पा रहे है, वित्त प्रबंधित खरीदियों में गिरावट आई है, औद्योगिक उत्पादन कम हुआ है और सरकार के पक्षाघात  के कारण एक और कठोर फंदे में वृध्दि कर दी है। आइये हम इस अकर्मण्यता की राजनीति को समझे जिससे कि इसी में से कोई रास्ता निकल सके।

                  मोटे तौर पर, यह सरकारी नैतृत्व की अकुशलता और विपक्ष का गैरजिम्मेदाराना अवरोध है। मीडिया दोनों को ही भड़का रहा है, वह उस शिकारी कुत्ते की तरह भौंक रहा है जिसे खून की गंध आ गई हो, इससे उसे कोई फर्क नही पड़ता कि किसका खून बह रहा है, भेड़िये का या मेमने का। इसकी रक्तपिपासा सब चीजों से बढ़कर है, जो नैतिक सीमाओं को भूल गया है या यहॉ तक कि मुद्दों पर प्रारंभिक स्पष्टता को भी भूल गया है।

                  प्रतिनिधित्ववादी नैतृत्व की स्पष्ट रूप से कमी है। अंतिम राजनैतिक प्राधिकारी अनुपस्थित है। निर्णय की समस्त शक्तियाँ प्रधानमंत्री की अपेक्षा पार्टी अधयक्ष के पास है। यह विपक्ष के पार्टी और सरकार के बीच कर्कशता की तीखी आलोचना करने का अवसर देता है। यह पार्टी के वरिष्ठ नेताओं और मंत्रीमण्डलीय सहयोगियों को सरकार में जोखिम भरे खेल खेलने को प्रोत्साहित करता है जैसे कि उन्होने गंभीर चोंट के विरूध्द पार्टी अधयक्ष से बीमा करवा रखा हो।

                जो प्रत्यक्ष/स्पष्ट नही है वह है सरकार की ढाँचागत सीमाएं। उसका राज्यसभा में बहुमत नही है और यदि विपक्ष मदद न करें तो वह कोई कानून पास नही कर सकती। यहाँ तक कि लोकसभा में भी सरकार के पास कोई मजबूत और स्थिर बहुमत नही है। उस विषय पर जिस पर बहुत आगे की और दूरगामी सोच की आवश्यकता है। ममता बनर्जी की पार्टी उससे बाहर हो गई है। किसी भी विषय पर अपने अल्पकालिक ........... की परवाह किये बगैर डी.एम.के. एकाएक शर्तों पर उतर सकती है। उसका व्यापक राष्ट्रीय मुद्दों के लिये समर्थन पूरी तरह से असंबध्द जेल संबन्धी मुद्दों में मदद पर निर्भर करता है। गठबंधन सरकार होने से यह शर्तें राष्ट्र पर उसके ही मतदाताओं का फैसला है। अल्पमत या गठबंधन सरकार के पास विपक्ष के सहयोग से ही काम करने का एकमात्र रास्ता है। विपक्ष गेंद खेलने का इच्छुक नही है। वह अनुगृहीत महसूस करता है। प्रतिदिन के अभ्यास में व्याख्या करना। फाइनेंसियल टाइम्स की स्तंभकार मार्टिन वोल्फ की यू.एस. रिपब्लिकन्स के बारे में वर्णन : वे सरकार की सफलता को देखने की बजाय अपने देश की असफलता को देखना ज्यादा पसंद करेंगे।''

                 गुड्स और सर्विस टेक्स (जी.एस.टी.) में ट्रांजिशन सुधार का एक बहुत महत्वपूर्ण भाग है जिसकी भारत को जरूरत है। राजनीतिक चन्दों और विस्तार पर राजनीतिक प्रशासनिक सुधारों की दुनियाँ के अतिरिकत हमें न्याय प्रक्रियाओं में भी सुधार की जरूरत है जिससे कि कोई भी केस के निराकरण अंतिम अपील के बाद 18महीनों से अधिक लंबा नही खींचा जा सके। किन्तु भाजपा जी.एस.टी. का विरोध करती है। संगठित रिटेल क्षेत्र में विदेशी निवेश हो सकता है साथ ही इसमें मुक्त सुधार होंगे जैसे-कृषि उत्पाद विपणन समिति एक्स समाप्त हो जायेगा। ग्रामीण सड़कों का निर्माण होगा और किसान समृध्द होंगें। मुद्रास्फीति कम होगी और ग्रामीण आय में वृध्दि होगी। किन्तु नही। भाजपा इनमें से कुछ नही करेगी। भाजपानीत एन.डी.ए. सरकार ने डिफाइन्ड कान्ट्रीब्यूशन पेंशन शुरू की थी जिस पर प्राप्त आय आवश्यक रूप से ओपन एन्डेड है किन्तु वह इस प्रकार की पेंशन पर सुनिश्चित आय प्रस्तावित करने वाले पेंशन रेग्यूलेटर बिल का अवश्य विरोध करेगी।

               भारत की बढ़ती युवा जनसंख्या को नये विश्वविद्यालयों और कॉलेजों की मांग कर ही है। शिक्षा में सुधार के 13 बिल संसद में सुस्त पड़े है। सोच समझकर विरोध करने वाली विपक्ष को धन्यवाद। यह ऐसा है कि यदि भाजपा यह महसूस करती है कि कांग्रेस ने किसी तरह ताकत नही होने पर भी उसके साथ धोखा किया और इसलिये वह यू.पी.ए. को एक इंच भी आगे नही बढ़ने देगी। यदि वह उसकी मदद कर सकती है। उस समय जब निष्क्रिय राजनीति ने अमेरिका और यूरोप में आर्थिक संकट पैदा कर दिया है। भाजपा के लिये भौंकना और दाँत दिखाना (न स्वयं करना और न दूसरों को करने देना राष्ट्रहित में नही हैं। किन्तु भाजपा की कपटपूर्ण अशिष्टता से भरी गद्दारी तुलनात्मक रूप से दिखाई नही दे रही है। यद्यपि गद्दारी के फलस्वरूप सरकार जो अच्छा काम कर रही है प्रकाश में नही आती और सारा ध्यान आकर्षित करती है। या? सरकार का सारा दोष दिखाई देता है। इसके दो कारण है :-पहला यह कि प्राथमिक रूप से शासन चलाने की जिम्मेदारी सरकार की है। दूसरा, बड़े स्तर पर भ्रष्टाचार के आरोपों ने जनता के बीच में प्रचार पा लिया, जिससे सरकार का नैतिक रूप से नग्न हो गई। क्या किसी एक का भी ऐसा प्रकरण है कि भ्रष्टाचार पर इस सरकार का एकाधिकार है?भ्रष्टाचार सभी राजनैतिक दलों को सहयोग करता है चाहे वह कांग्रेस हो या भाजपा या क्षेत्रीय दल। इसको बदलना अत्यंत आवश्यक है। भ्रष्टाचार के विरूध्द आक्रोश व्यापक रूप से फैल चुका है जो अन्ना के आन्दोलन में प्रकट हो चुका है। यद्यपि उनकी सर्वशक्तिमान,गैर उत्तरदायी लोकपाल की मुख्य मांग देखने में अच्छी लेकिन दोषपूर्ण है।

                  कांग्रेस स्वयं के द्वारा भ्रष्टाचार के विरूध्द कदम स्वयं उठाने की पहल करने की जिम्मेदारी से बच नही सकती। एक अपूर्व/नवीन फण्ड उगाहने की मुहिम के लिये एक विश्वसनीय, व्यवहार्य कदम होगा: इकट्ठा करो, कहो- ज्ञात स्त्रोत से 5000 करोड़ चेक द्वारा।

                    पक्षाघात की राजनति का अंतिम तन्तु है कांग्रेस की स्वयं की प्रकृति। सत्ता के दलालों का समूह जो गाँधी के चमत्कार को स्वयं को लाभ पंहुचाने के लिये उपयोग करते है, उनमें कोई आंतरिक प्रजातंत्र नही है। विचारधारा पर आधारित आकर्षण (संसंजन) या इससे मुक्ति को किसी कार्यक्रम पर स्पष्टता नही है। उसके नेतागण देश को आगे ले जाने की बजाय एक दूसरे को काट रहे हैं।

 

? टी.के.अरुण