संस्करण: 26  दिसम्बर- 2011

कहीं पे निगाहें, कहीं पे निशाना

क्या चिदम्बरम पर हमले के बहाने हिन्दुत्व आतंकवाद के खिलाफ उठे कदमों की धार कम करने की कोशिश हो रही है ?

? सुभाष गाताड़े

                 पिछले दिनों आईबीएन चैनल पर 'डेविल्स एडवोकेट' शीर्षक अपने कार्यक्रम जनाब करण थापर ने राज्यसभा में भाजपा के नेता अरूण जेटली से एक सवाल पूछा जिसे सुन कर जेटली कुछ समय के लिए थोड़े सन्न से भी रह गए।( http://ibnlive.in.comènewsègovt-owes-an-explanation-on-chidambaram-jaitleyè213048-3.html (Transcript) थापर ने पूछा कि कई लोगों का यह मानना है कि गृहमंत्री पी चिदम्बरम का बहिष्कार करने या उसके लिए संसद की कार्रवाई बाधित करने जैसे कदम के पीछे असली मसला यह नहीं है कि वह 2जी घोटाले में कथित तौर पर शामिल रहे हैं, दरअसल आप यह भी नहीं मानते कि वह एस पी गुप्ता मामले में गलती पर हैं। बात यह है कि गृहमंत्री होने के नाते उनकी अगुआई में ही गुप्तचर एजेंसियों ने मालेगांव, मक्का मस्जिद एवं समझौता एक्सप्रेस जैसे बम धमाकों के साथ हिन्दू आतंकी संगठनों के रिश्तों को उजागर किया है, जिसकी वजह से आप उध्देलित हैं।

               बातचीत में भले ही जनाब जेटली ने कुछ सफाई देने की कोशिश की मगर साक्षात्कार का ट्रान्स्क्रिप्ट देख कर भी कहा जा सकता है कि जवाब बहुत कमजोर था। वैसे जिस एकांगी तरह से भाजपा जनाब चिदम्बरम को निशाना बना रही है,उससे धीरे धीरे यह बात कही जाने लगी है। नवम्बर माह में जब भाजपा की पहल पर राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबन्धन की तरफ से यह निर्णय लिया गया कि वह संसद में चिदम्बरम का बहिष्कार करेगी जब तक वह इस्तीफा नहीं देते उस पर टिप्पणी करते हुए अंग्रेजी अखबार डीएनए में लिखा गया था कि (डीएनए 24नवम्बर 2011) कि किस तरह भाजपा की तरफ से 'एक ही तीर से कई निशाने साधे जा रहे हैं, जिसमें एक तरफ 2 जी घोटाले पर फोकस बना रहेगा और यह कदम संघ के नेतृत्व को भी मुफीद जान पड़ेगा जिनके कई नेताओं ने हिन्दू आतंकी संगठनों के खिलाफ कार्रवाई के लिए चिदम्बरम को ही जिम्मेदार माना है।' सूत्रों के मुताबिक भाजपा संसदीय दल को इस सम्बन्ध में पार्टी एवं संघ की तरफ से ही सुझाव मिले थे।

                यह पूछा जाना लाजिमी है कि 2008 के अन्त में जब चिदम्बरम को गृहमंत्री बनाया गया था तबसे लगभग डेढ साल तक वह महज भाजपा के ही नहीं बल्कि संघ परिवार के भी लाडले रहे हैं और आज अचानक आंख की किरकिरी कैसे बन गए (चिदम्बरम एण्ड बीजेपी : द एण्ड आफ एन अफेअर 16 दिसम्बर 2011) इसके कई प्रमाण दिए जा सकते हैं। अक्तूबर 2009को बिहार के राजगीर में सम्पन्न संघ के बैठक को याद करें जब संघ के अग्रणी नेता मदन दास देवी ने चिदम्बरम के कसीदे पढ़ते हुए कहा था कि ''राज्यों के बीच समन्वय कायम सुनिश्चित करने के जरिए नक्सल आतंक को काबू में करने की गृहमंत्री की कोशिशों एवं उनके नज़रिये की सराहना की जानी चाहिए।'' उसी माह के उत्तरार्ध्द में पूर्वकेन्द्रीय मंत्री और उन दिनों राज्यसभा सदस्य अरूण शौरी ने लखनउ में एक कार्यक्रम में चिदम्बरम को ''एक विज़न/दृष्टि से युक्त एवं पेशेवर रूख वाले'' गृहमंत्री के तौर पर सम्बोधित किया।

               फरवरी 2010 में आन्तरिक सुरक्षा पर आयोजित एक सरकारी सम्मेलन मे गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी ने आतंक से निपटने के चिदम्बरम एवं तत्कालीन गृहसचिव जी के पिल्लई के रूख की तारीफ करते हुए कहा था ''जबभी राज्य की तरफ से इस सिलसिले में कोई मांग आती है तब गृहमंत्री एवं गृहसचिव की प्रतिक्रिया बेहद सकारात्मक एवं सत्वर होती है।'' अप्रैल 2010 में भी चिदम्बरम के प्रति भाजपा के रूख में कोई परिवर्तन नहीं आया और नक्सलवाद के खिलाफ चिदम्बरम की मुहिम का समर्थन करती रही। इसी माह में जब छत्तीसगढ़ के दांतेवाडा के पास माओवादियों द्वारा घात लगा कर सीआरपीएफ एवं राज्य पुलिस के 76 जवानों को मारे जाने की घटना हुई, उसके बाद भी पार्टी द्वारा पारित प्रस्ताव में यह कहा गया कि हालांकि उनके मंत्रालय ने इस समस्या के प्रति अपने रूख में तब्दीली की है, मगर उससे कैसे निपटा जाए इसे लेकर सरकार में आपसी सहमति नहीं है।

                यह पूछा जा सकता है कि आखिर वह कौनसा बिन्दु था जब भाजपा को चिदम्बरम अचानक खलनायक दिखने लगे। दरअसल जैसे जैसे हिन्दुत्व आतंक के खिलाफ जांच एजेंसियों की सक्रियता बढ़ने लगी,तभी से संघ-भाजपा ने उनसे अपनी दूरी बनानी शुरू कर दी। याद करे 12 मई 2010 का जनाब चिदम्बरम का वह वक्तव्य जिसमें उन्होंने हिन्दू आतंकवादी संगठनों को देश के लिए सबसे बड़े खतरे के तौर पर सम्बोधित किया था और यहभी रेखांकित किया था आन्तरिक आतंकवाद को पहचानना बेहद कठिन काम है। (Youtube) हम कह सकते हैं कि अगस्त 2010 को जब देश के पुलिस अधिकारियों के सम्मेलन को सम्बोधित करते हुए तथा सुरक्षासम्बन्धी विभिन्न मसलों की बात करते हुए जब उन्होंने ''केसरिया आतंकवाद की नयी परिघटना'' पर फोकस किया, तभी से यह रिश्ता खटाई में पड़ने लगा। 25 अगस्त के उपरोक्त वक्तव्य में चिदम्बरम ने स्पष्ट किया था : ''केसरिया आतंकवाद की नयी परिघटना सामने आयी है जिससे सम्बधित लोग अतीत के कई बम विस्फोटों में शामिल पाए गए हैं। मेरी आप से यह सलाह होगी कि हमें हमेशा सावधान रहना होगा और आतंकवाद से निपटने के लिए अपनी क्षमताओं को, केन्द्र और राज्य स्तर पर, बढ़ाते जाना होगा।'' चिदम्बरम द्वारा 'केसरिया आतंकवाद' को निशाना बनाने को लेकर संघ परिवारी जमातों ने खूब एतराज जताया था, केसरिया शब्द को हिन्दू धर्म के साथ जोड़ते हुए यह भी कहा था कि ऐसे बयान देकर गृहमंत्री ने 'हिन्दुओं का अपमान किया है।' मालूम हो कि इस अहम मुकाम पर कांग्रेस के अन्दर भी विसम्वादी सुर सुनायी दिए थे।

                वर्ष 2010 के अन्त में जब संघ परिवार के प्रचारक एवं आतंकी घटनाओं में मुब्तिला असीमानन्द ने जब धारा 164 के अन्तर्गत अपना कबूलनामा दिया जिसे अदालत में सबूत के तौर पर भी पेश किया जा सकता है, कांग्रेस के बुराडी अधिवेशन में हिन्दुत्व के आतंक के खिलाफ संघर्ष करने का संकल्प लिया गया और राष्ट्रीय जांच एजेंसी (नेशनल इन्वेस्टिगेशन एजेंसी) के हाथ मालेगांव, मक्का मस्जिद और समझौता एक्स्प्रेस बम धामाके में हिन्दुत्व आतंकी संगठनों की संलिप्तता के ठोस सबूत सामने आए, तभी से संघ परिवार के एक तरह से हाथ पांव फूलने लगे। माओवादी सक्रियताओं के खिलाफ गृहमंत्री के रूख की ताईद करनेवाले संघ-भाजपा के लिए यह बात हजम नहीं हुई कि दक्षिणपंथी हिन्दुत्ववादी संगठनों के प्रति भी वह ऐसा ही 'विजनरी' एवं 'पेशेवर' रूख अख्तियार किया जाए। हमें यहभी नहीं भूलना चाहिए कि इन तमाम आतंकी घटनाओं में शामिल संघ के कार्यकर्ताओं ने बार बार इस बात को कहा है कि संघ के वरिष्ठ नेता इन्द्रेश कुमार की सलाह पर, या उनके उकसावे पर तथा उनकी मदद से उन्होंने इस काम को अंजाम दिया है। यह अकारण नहीं था कि पिछले साल जब अजमेर बम धमाके का रहस्योद्धाटन हुआ था तब अखबारों में यह सूर्खियां बनी थीं कि 'व्हेदर गहलोत वुड डू ए तोगडिया टू इन्द्रेश ?' (क्या गहलोत इन्द्रेशकुमार के साथ तोगडिया जैसा सलूक करेंगे?') इसमें सन्दर्भ था राजस्थान के मुख्यमंत्री गहलोत की इसके पहले की पारी का, जब उन्होंने त्रिशूल दीक्षा के जरिए राजस्थान में आपसी तनाव बढ़ाने के लिए तोगडिया को जेल में डाल दिया था, जिसमें उन्हें जमानत करा कर बाहर आना पड़ा था।

                    स्पष्ट है कि गृहमंत्री पी चिदम्बरम भले ही अपनी पार्टी में सबसे लोकप्रिय शख्स नहीं हो, इसके बावजूद कांग्रेस नेताओं का मानना है कि उनके खिलाफ भाजपा का मौजूदा हमला उन पर लगाए जा रहे आरोपों के कारण मुख्यत:नहीं बल्कि हिन्दुत्व आतंकी जमातों के खिलाफ गृहमंत्रालय की तरफ से जारी कार्रवाई है। अपने आलेख 'चिदम्बरम एण्ड बीजेपी' में स्मिता गृप्ता लिखती हैं कि कांग्रेस सूत्रों की मानें तो दरअसल भाजपा एवं संघ परिवार के लिए भ्रष्टाचार का मसला परेशान नहीं किए हुए है बल्कि हिन्दू आतंकी समूहों के उद्धाटन के चलते आम जनमानस में हिंसाचारी के तौर पर उनकी जो छवि बनी है, वही उनकी बेआरामी का सबब है।

                   इसे विडम्बना ही कहा जाएगा कि भ्रष्टाचार के आरोपों को झेल रही कांग्रेस इन दिनों हिन्दुत्व आतंक के खिलाफ कार्रवाई में सुस्त पड़ी हुई है। यह बात समझ से परे है कि फिलवक्त बचावात्मक पैंतरा अख्तियार करने के लिए मजबूर कांग्रेस संघ परिवारी संगठनों की इस दुखती रग पर हाथ रखने से या किसी हेमन्त करकरे जैसे जांबाज अफसर को इसका जिम्मा सौंपने से क्यों कतरा रही है ?

? सुभाष गाताड़े