संस्करण: 26  दिसम्बर- 2011

  विचारों की अस्थिरता से

अन्ना की चमक खो रही है

?       वीरेन्द्र जैन

               कवि मुकुट बिहारी सरोज ने कभी कहा था-          

               अस्थिर सब के सब पैमाने तेरी जय जय कार जमाने बन्द किवार किये बैठे हैं अब कोई आये समझाने फूलों को घायल कर डाला कांटों की हर बात सह गये कैसे कैसे लोग रह गये भ्रष्टाचार के मुद्दे पर जनभावनाओं के प्रतीक बन गये  अन्ना हजारे की अस्थिर मानसिकता पर सरोजजी की यह कविता याद आनी स्वाभाविक है। इस बात से कोई इंकार नहीं कर सकता कि भ्रष्टाचार देश में एक बड़ी समस्या है और देश की दूसरी बड़ी समस्याओं को हल करने के लिए उठाये कदम भी इसी भ्रष्टाचार की भेंट चढ कर भटक जाते हैं, जिससे वांछित लक्ष्य नहीं मिल पाते। अन्ना हजारे और गिने चुने लोगों की उनकी टीम के पास न तो न तो कोई सुचिंतित विचारधारा है और न ही वह जनतांत्रिक ढंग से काम करती है। वे अपने आप में एकांगी होने के कारण यह भी नहीं सोचना चाहते कि किसी बड़ी और व्यापक बुराई को दूर करने के लिए उससे भी बड़े और अधिक शक्तिशाली संगठन तथा परिवर्तन की एक बेहतर कार्य प्रणाली की जरूरत होती है,जिसके अभाव में जेपी और वीपी का आन्दोलन अपने ऐसे ही लक्ष्य नहीं पा सका था। अन्ना हजारे की टीम ने अपनी मनमानी करके सामाजिक परिवर्तन के एक सम्भावनाशील आन्दोलन को उभार कर भटका दिया है।

                भावनाओं के ज्वार में बिना उचित विमर्श के लिये गये फैसले और असफलताओं के बाद ठुकरायी गयी सलाहों को मानने पर विवश होने से उनके नेतृत्व की क्षमता पर प्रश्न चिन्ह लगता है। आन्दोलन के अपने प्रारम्भिक दौर में उन्होंने सभी राजनीतिक दलों से दूरी बनायी और एक सिरे से सबको अपराधी व चोर कहा। रोचक यह है कि उन्होंने इसी संसदीय व्यवस्था और चुनाव प्रणाली में पूर्ण आस्था व्यक्त करते हुए सारे सुधारों को संवैधानिक ढंग से लागू करने के लिए नया कानून बनवाना चाहा। इसकी दूसरी तरफ कानून बनाने वाली संसद को चोर ठहराते रहे। इसका मतलब साफ था कि वे किसी एक जगह झूठ या नासमझी को प्रकट कर रहे थे। उनके सदस्यों ने जनलोकपाल के प्रस्ताव को रखते हुए कहा भी था कि अगर संसद इसे पास कर देगी तो अपने पैरों पर खुद ही कुल्हाड़ी मारेगी। अर्थात उनका विश्वास इस संसद से इसे पास कराने में नहीं था और वे संभवत:पूरी संसदीय प्रणाली को परोक्ष में बदनाम करने का खेल खेल रहे थे।

                भीड़ को भुनाने वाले राजनीतिक दलों को उनका करिश्मा आकर्षक लगा तो उन्होंने उनके मंच को हथियाना चाहा पर उन्होंने सबसे पहले पहुँचने वाले ऐसे नेताओं उमा भारती, ओमप्रकाश चौटाला, अरुण जैटली आदि को मंच तक फटकने नहीं दिया था तथा संघ के राम माधव को भी मंच से उतार दिया था। दूसरे अनशन के समय भी जब भाजपा के अनंत कुमार और गोपीनाथ मुंडे ने प्रयास किया था तो उन्हें दूर रहने के लिए कहा गया था। जब किसी भी राजनीतिक दल ने उनके जनलोकपाल बिल का समर्थन नहीं किया तो अपने आन्दोलन के अगले चरण में उन्होंने अपने एनजीओ नुमा समर्थकों से क्षेत्रीय विधायक और सांसदों का घेराव करने का आवाहन किया था ताकि वे संसद में जनलोकपाल बिल का समर्थन करें। उनका यह आवाहन सफल नहीं हुआ और उनके द्वारा जुटायी गयी भीड़ का उत्सवधर्मी चरित्र प्रकट हो गया,जो हवाई फायर तो कर सकती है पर मैदान में नहीं लड़ सकती। बाद में संघ के नेताओं की खुली घोषणा से यह तथ्य भी प्रकट हो गया कि उनके अनशन तमाशे को न केवल संघ ने परोक्ष में पूरा सहयोग दिया था अपितु अनशन के साथ चलने वाले लंगर को भी उन्होंने ही चलवाया था। अपने नकार में कमजोर अन्ना टीम यह नहीं बता सकी कि यदि संघ के नेताओं की बात झूठी थी, तो सत्य क्या था!

                 हरियाणा के हिसार विधानसभा चुनाव में कांग्रेस का विरोध करते हुए उन्होंने दूसरे दो जिन दलों को चुनावी लाभ देने का दावा किया वे किसी भी तरह से अपने चरित्र में कांग्रेस से भिन्न नहीं थे। उनकी इस गलत चाल ने उनके मेधा पाटकर सन्दीप पाण्डे सहित दो प्रमुख समर्थकों को उनसे विमुख कर दिया। जबकि कर्नाटक के पूर्व लोकायुक्त संतोष हेगड़े, और स्वामी अग्निवेश पहले से ही अलग हो चुके थे। अरुन्धति राय तो वैसे भी उनके समर्थन में नहीं थीं।

               अपने पिछले तौर तरीके को पलटते हुए 11 दिसम्बर 2011 के धरने पर अन्ना ने सारे राजनीतिक दलों के नेताओं को अपने मंच पर बुलवाया जो राजनीतिक कारणों से वहाँ गये पर उनमें से किसी ने भी उनके जनलोकपाल बिल का पूरा समर्थन नहीं किया। जब इन नेताओं की उपस्थिति में केजरीवाल ने उनसे लोकपाल के गठन, सीबीआई निदेशक की नियुक्ति, और शिकायत निवारण तंत्र आदि पर रुख स्पष्ट करने को कहा तो  सीपीआई के डी राजा ने उनके हाथों से माइक छीन कर कहा कि ये बहस की जगह नहीं है,इस विषय पर जो भी बहस होगी वह संसद में होगी। भाजपा के राज्य सभा में नेता वकील अरुण जैटली ने कहा कि बुनियादी मुद्दों पर सभी राजनीतिक दलों ने अपनी राय पहले ही सार्वजनिक कर दी है और विशिष्ट मुद्दों पर बहस का जिम्मा संसद का है। माकपा की नेता वृन्दा करात ने भी कहा कि मजबूत लोकपाल के लिए जो भी जरूरी होगा वह संसद करेगी,लोकपाल के दायरे में निजी कारोबारी घरानों को लाये जाने पर जोर देते हुए उन्होंने कहा कि ये लोग देश को लूट रहे हैं। सीपीआई के महासचिव एबी वर्धान ने तो साफ साफ कहा कि अन्ना की टीम के नौ दस लोगों को यह नहीं सोचना चाहिए कि उन्हीं के पास सारी बुध्दि है और वे देश का प्रतिनिधित्व करते हैं। जो लोग इनकी बातों से सहमत नहीं हैं, उसका यह मतलब नहीं निकाला जा सकता कि वे भ्रष्ट लोगों के समर्थक हैं। एक सौ बीस करोड़ के देश में विद्वानों की कमी नहीं है। अन्ना को यह उम्मीद नहीं करना चाहिए कि जन लोकपाल बिल का एक एक शब्द मान लिया जायेगा। आपको राजनीतिक दलों के नेताओं को बुलाने की समझ आयी यह अच्छी बात है- कभी नहीं से देर भली। राजनीतिक वर्ग की प्रासंगिकता को कम करके मत ऑंकिए। अकेले जनलोकपाल बिल के पास हो जाने से भ्रष्टाचार नहीं मिट जायेगा। समाजवादी पार्टी के नेता रामगोपाल यादव ने हजारे टीम से संयम बरतने की सलाह दी, जो यहाँ आकर तिरंगा लहराते हैं वे इटावा में भ्रष्टाचार करते हैं। शरद यादव ने तो अन्ना पक्ष को सीधो उपेक्षित करते हुए कहा कि वे चाहेंगे कि सदन की भावना के अनुरूप जो प्रस्ताव पास किया गया था उसमें तनिक भी बदलाव न हो। राजनीतिक दलों के नेताओं के भाषण से यह साफ हो गया कि वे कानून बनाने के मामले में अन्ना को कोई श्रेय या दखल देने को तैयार नहीं हैं। वहीं अन्ना ने अपने समर्थकों के लिए कुछ सूत्र घोषित किये जो 1-शुध्द आचरण, 2- शुध्द विचार, 3- निष्कलंक जीवन, 4- अपमान सहने की ताकत। रोचक यह है कि अन्ना की टीम में से शायद ही कोई इन पर खरा उतरे।   

                 अन्ना ने स्वयं भी जिस तरह से सोनिया गान्धी और राहुल गान्धी पर व्यक्तिगत हमले किये हैं वे शुध्द आचरण और शुध्द विचारों को प्रकट नहीं करते क्योंकि ये हमले भाजपा के तौर तरीकों के निकट हैं। भाजपा जानती है कि कांग्रेस की एकता के सूत्र नेहरू परिवार में केन्द्रित हैं और उन्हें बदनाम करने से कांग्रेस कमजोर होगी। यही कारण है कि वे सच जानते हुए भी सरकार और कांग्रेस को छोड़ कर सरकार से बाहर रहने वाले राहुल गांधी को लक्ष्य बना रहे हैं। यह संघी तरीका है जो सोनिया गान्धी के कांग्रेस अध्यक्ष बनने के बाद धर्मांतरणों के बहाने ईसाइयों तक पर इसीलिए हमले करने लगा है ताकि उन को किसी तरह साम्प्रदायिक दायरे में लाया जाये। वे उनके कुम्भ स्नान या किसी हिन्दू समारोह में भाग लेने पर भी आपत्ति करने से नहीं चूकते। शरद पवार पर पड़े थप्पड़ के मामले में दी गयी अपनी प्रतिक्रिया पर वे अपने गान्धीवाद की कलई खोल ही चुके हैं। विवादस्पद मुद्दे के समय मौन धाारण कर वे किसी बेहद साधारण राजनेता की तरह प्रकट हो चुके हैं।

                अन्ना को आत्ममंथन के बाद अपने दर्शन और कार्यक्रम को तैयार करना चाहिए, उस पर देश के प्रमुख व्यक्तियों से सलाह करना चाहिए और फिर परिणाम की चिंता किये बिना अपना कार्यक्रम घोषित करना चाहिए। यदि वे दिन प्रति दिन अपने विचार और कार्यक्रम बदलते रहे तो जल्दी ही वे अपनी चमक खो देंगे जो पिछले दिनों से काफी कम हो चुकी है।

? वीरेन्द्र जैन