संस्करण: 26जनवरी-2009

कृषि से विमुख होता किसान

 

 

 

शब्बीर कादरी

चाहे भारतीय कृषि नीति यह वकालत करे या आमजन इस सुखद स्वप्न में जिये कि हमारे यहां खेती-किसानी एक जीवन शैली की तरह है, हाल ही में रेमन मैग्सेसे पुरस्कार से सम्मानित मशहूर पत्रकार और ग्रामीण मामलों के जानकार पी.साईनाथ ने इस अवधारणा का भ्रम दूर करते हुए कहा है कि भारत में कृषि मौत का रास्ता है। श्री साईनाथ के अनुसार देश में पिछले कुछ सालों में एक लाख से अधिक किसानों ने आत्महत्या की है, और 80 प्रतिशत से अधिक किसान इस पेशे को छोड़कर किसी और क्षेत्र में आजीविका तलाशने को मजबूर हैं, क्योंकि वे मौत से हर पल रूबरू नहीं होना चाहते। जबकि सरकारी दावा है कि 40 प्रतिशत लोग कृषि से विमुख हो कुछ और करने के पक्षधर हैं। श्री साईनाथ के अनुसार भारतीय कृषि गलत नीतियों के दुष्चक्र से जकड़ी हुई है, ऋण नीति से लेकर खाद नीति, बिजल-पानी की व्यवस्था, न्यूनतम समर्थन मूल्य आदि सभी किसान के विरूध्द काम करते हैं। वे इस भ्रमजाल को भी काट फेंकते हैं और मज़बूती से कहते हैं कि देश में कृषि संकट वर्ष 90 के उत्तरार्ध्द से नहीं, यह संकट चालीस साल पुराना है जो प्राकृतिक आपदाओं से नहीं उपजा बल्कि मौलिक और जागरूक नीति के अभाव से पैदा हुआ स्वरचित संकट है। दुख के साथ नाथ यह उध्दत करते हैं कि केवल दिल्ली शहर में ही आदिवासी राज्य, झारखंड की दो लाख आदिवासी लड़कियां घरेलू नौकर के तौर पर काम करने को विशप्त हैं, यह भद्दा मजाक है उनके साथ, क्योंकि आदिवासी कभी अपनी जमीन से अलग ही नहीं होना चाहता।

यह कड़वी सच्चाई है कि आज लगभग चालीस प्रतिशत से अधिक कृषक ने खेती छोड़ कर अन्य काम-धंधा प्रारंभ कर दिया हैं। क्योंकि पिछले कई वर्षों में खेती में निवेश भी कम हुआ है। जो निवेश कभी 4 प्रतिशत था अब घटकर केवल 2 प्रतिशत रह गया है। वर्ष 1950 में कृषि की भागीदारी सकल घरेलू उत्पाद में 56.89 प्रतिशत था जो वर्ष 2001 तक सिर्फ़ 24.90 ही रह गया था। कृषि के प्रति उपेक्षापूर्ण इन गिरते आंकड़ों के कारण ही कृषक आत्महत्या कर रहे हैं। 92-97 में जब देश की जीडीपी 6.7 थी तब कृषि सेक्टर का योगदान 4.7 प्रतिशत था अब 2006-07 में देश की विकास दर 9.2 हुई तो यह योगदान घटकर सिर्फ़ 1.5 ही रह गया। यही हाल कृषि उत्पादन का भी रहा। वर्ष 06-07 में 217.3 मिलियन टन खाद्यान्न उत्पादन हुआ जो कि 219.3 मिलियन टन के उत्पादन की संभावना से बहुत ज्यादा नहीं है। खरीफ की उत्पादन 5.2 मिलियन टन बढ़ने की संभावना है जबकि रबी का उत्पादन 3.3 मिलियन टन कम होने की संभावना है। सरकार ने माना है कि घरेलू कीमतें जो खाद्यान्न में बढ़ी उसके लिए उत्पादन घटना भी एक कारण रहा है।

देश में सिर्फ़ 20 लाख से भी कम कृषक लगभग 17 हैक्ट भूमि के मालिक हैं, लगभग 75 लाख हैक्ट. के स्वामी वे हैं जिनके पास औसत 6 हेक्ट. भूमि है और लगभग 10 करोड़ वे लोग हैं जो खेतीहर मजदूर हैं ये वे लोग हैं, जो गरीबी रेखा की पहचान बनाते हैं और भुखमरी से हार कर शहरों की भीख पर गुजारा करते हैं। शहरों में झुग्गीरूपी नारकीय जीवन जीने वाले ये वही लोग हैं जिनके खून-पसीने पर शहर के चालबाज वोट-बैंक के अलग-अलग वर्ग बनाकर इनका उपयोग करते हैं। सूचना के अधिकार के युग में और मीडिया के क्रांति के दौर में ये वही लोग हैं जिनकी बदहाली का जिक्र एक सीढ़ी से भी आगे नहीं बढ़ पाता, यदि ऐसा नहीं है तो क्यों कृषि और किसानों की बर्बादी से संबंधित समाचार और वास्तविकताएं सामने नहीं आती, केवल किसान की आत्महत्या की खबर से नहीं उसके कारणों की पड़ताल कर उसके उपचार की जरूरत क्यों नहीं सुझाई जाती। सच्चाई यह है कि मीडिया भारतीय कृषि की विशाल और विस्तृत संपदा के बारे में भी पर्याप्त कुछ नहीं बता पाया है। वर्ष 65 के आसपास ''फैमिन 75'' नामक पुस्तक में दो भाईयों विलियम पैडोक और पॉल पैडोक ने लिखकर हमें चेतावनी दी थी कि सत्तर के दशक में भारत की आधी आबादी भूखी मर जाएगी, ऐसा हो भी सकता था, उन दिनों देश के अनेक राज्यों में भूख और अकाल ने अपना रौद्र रूप दिखाया भी पर तत्कालीन नेताओं और कृषि वैज्ञानिकों ने हालात पर काबू पाकर खाद्यान्न में आत्म निर्भरता प्राप्त की और धीरे-धीरे अस्सी के दशक में सरकार कृषि क्षेत्र से लगभग निश्चित हो गई। कृषि और किसान की इस लापरवाही से उत्पादन के जो कीर्तिमान बन सकते थे, वे आज भी प्रतीक्षा में हैं। दिनों-रात जोत का आंकड़ा सिकुड़ रहा है, वर्ष 76-77 में कृषि जोत का आंकड़ा दो हेक्ट. था, वह अब घटकर दशमलव दो रहा गया है, आबादी की बढ़ती रफ्तार को देखते हुए समझा जा सकता है कि जोंत का यह आंकड़ा सन् 2020 तक 0.11 हेक्ट. ही रह जाएगा।सर्विस क्षेत्र में पांचवे वेतन आयोग को लागू कर और अब छठवें वेतन आयोग की तैयारी में जुटी सरकार अपने कर्मचारियों के लिए बजट में 25 से 30 हजार करोड़ रु. का प्रतिवर्ष अलग से सावधान कर सकती है पर कृषि को दी जाने वाली सहायता या तो स्थिर है या कम कर दी गई है। सबसिडी दी भी जाती है तो वह हमारे यहां अप्रत्यक्ष रूप में मिलती है, जबकि विदेश में वह प्रत्यक्ष कृषकों को दी जाती है।

यह भी कम शर्मनाक नहीं है कि हमारी कृषि का जो उत्पादन वर्ष 1950 में 5.1 करोड़ टन था आज बढ़कर 2005 में 19.5 टन हो जाने के बावजूद हम आज तक विदेश से गेहूं मंगाए जा रहे हैं। सरकार ने हाल ही में गेहूं की कमी को दूर करने के लिए 136 डॉलर, 159 डॉलर, 239 डॉलर और 345 डॉलर प्रति टन की दर से गेहूं खरीदा है। पिछले वर्ष सरकार ने 30 लाख टन गेहूं का आयात किया था अब सरकार 50 लाख टन गेहूं के आयात पर आमादा है। खाद्य एवं कृषि विशेषज्ञ डॉ. देविंदर शर्मा का मानना है कि आयातित लाल गेहूं से बड़ा खतरा उसी के साथ आने वाली खरपतवार से है। यह खरपतवार एक दिन हमारी खेती को जरूर चौपट कर देगी। याद रखा जाना चाहिए कि आयातित गेहूं के साथ आने वाले गेहूं के साथ आने वाली 21 प्रकार की खरपतवार हमारे देश में अभी नहीं पाई जातीं। अमेरिका विश्व के 110 देशों को गेहूं निर्यात करता है। जहां इस गेहूं का आटा बनाया जाता है पर भारत में इसे कहीं कहीं बोया भी जा रहा है जो प्रत्यक्षरूप से खरपतवार की नई समस्या को आमंत्रित कर रहा है। केंद्रीय कृषि मंत्रालय ने घटते कृषि निवेश से चिंतित को हाल ही में कृषि के लिए वर्ष 2008-09 में रु. 280,000 करोड़ का निवेश करने का इरादा किया है वह भी तब जब दुनिया के अर्थशास्त्रियों ने एलान किया कि इस वर्ष खाद्यान्न को लेकर भारत में मारामारी हो सकती है। आने वाले वर्ष कृषि और किसान के विकास के लिए कितने प्रभावशाली साबित होंगे यह सरकार की नीतियों, कार्यक्रमों और दूरदर्शितापूर्ण योजनाओं पर निर्भर करता है। चुनावी वर्ष होने के कारण कई लुभावनी घोषणाएं भी हो सकती हैं पर यथार्थ में क्या शहर में मजदूरी कर रहे, भीख मांग रहे हमारे किसानों को वापिस खेती के लिए खेत तक लाया जा सकेगा इसका जवाब किसके पास है। क्योंकि जब तक हमारा किसान खेत से खुशी-खुशी जुड़ा रहेगा तभी तक हम अपनी परंपराओं पर गर्व भी करेंगे और नाज़ भी।


शब्बीर कादरी