संस्करण: 26जनवरी-2009

मुक्ति आंदोलन

वनवासी महिलाओं का
 

 

मीनाक्षी जोशी

क्षिण गुजरात के नवसारी जिले में वासंदा क्षेत्र। वहां से 45 कि.मी. दूर वलसाड़ जिले का धरमपुर और कपराड़ा क्षेत्र। टीलेनुमा प्रदेश, सर्पाकार रास्ते, कुछ दूर-दूर के अंतराल में बसे गांवों के बांस से बने छोटे-छोटे घर, जहां बसते है धरती के सबसे पुराने रहवासी-गुजरात की आदिवासी प्रजा। वारली, चौधारी, कोटवालिया, नायका, काथोड़ी और वांसफोड़ा।

धरमपुर, जो एक समय में रामनगर था, बलसाड़ जिले के पूर्व में महाराष्ट्र की सीमा से संलग्न यह क्षेत्र एशिया खंड में सबसे बड़ा ताल्लुका है।

ईसवी सन् 1262 में मेवाड़ सिसोदिया वंशी महाराणा राहप के छोटे पुत्र रामसिंह ने इस वनभूमि पर आदिवासियों के सहयोग से ''श्रीरामनगर'' राज्य की स्थापना की थी। इस क्षेत्र में वर्षा ऋतु में धुआंधार बारिश होती। टेकरीओ से नदी, झरने लहराते बहते। जनसंपर्क से दूर वनवासी महिलाएं, बच्चों के साथ भीगते हुए झोपड़ीनुमा घर में दिन काटती। रात को अंधोरा ओढ़ लेती। बिजली की बात तो दूर, मिट्टी के दिए भी नहीं। तेल बिना दीये जले भी कैंसे ? जीव जंतुओं का उन्हें डर नहीं। शहरी जीवन का जरा भी प्रभाव नहीं।

बरसात का पानी पथरीजी जमीन पर से बह जाता। इतनी अधिक वर्षा के बावजूद भी पानी संग्रहित नहीं किया जा सकता। उस पथरीली जमीन पर खेती भी न हो सकती थी। वनवासियों के पास मुट्ठी भर अनाज भी नहीं। पीने के लिए शुध्द पानी नहीं कितनों के पास रहने के लिए ठिकाना भी नहीं। आजीविका के साधन भी नहीं खेती विषयक कोई जानकारी नहीं। रोगों से रक्षा नहीं। कमजोर शरीर व्यसनों में जकड़े हुए।

वासंदा और धारमपुर के गांवों में जाने के लिए कच्चे पथरीले जंगल के रास्ते। बरसात में वह भी जनसंपर्क से अलग। नब्बे प्रतिशत आदिवासी जमीन के छोटे से टुकड़ों पर केवल धान की खेती करते। थोड़ा बहुत मिल जाता उससे भूख खत्म तो नहीं होती। कमजोर शरीर से वे विषम परिस्थितियों से जूझते रहे। थक-हार कर धीरे-धीरे शहर में भटकने लगे।

वनवासी महिलाएं वर्ष के आठ माह पति एवं युवा पुत्रों से वंचित अकेली जंगलों के अंधोरे उजाले में रहती। लकड़ी के गट्ठर बांध लाती। छोटे बच्चों को बगल में लिए घर के आंगन में थोड़ी सब्जी-भाजी और कंदमूल उगाकर जैसे-तैसे निभाती।

इन वनवासी महिलाओं का जीवन टूटे दर्पण की तरह होता। घर में मिट्टी के दो चार घड़े और पत्थर के चूल्हे पर चढ़ाने के लिए वर्षों पुराने बर्तन। पुरुष थोड़ा कुछ कमा कर आठ-दस माह के बाद वापस आते फिर भी अंत में गरीब के गरीब। स्त्रियां किससे कहे अपना दुख ? कौन सुनेगा ? मुश्किले सहन कर उन्होंने आत्मविश्वास खोया और बाहर के व्यक्ति के प्रति अविश्वास।

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद राज्य सरकार निरन्तर इस प्रयास में रही कि आदिवासियों का विकास हो, उनकी आर्थिक उन्नति हों। किंतु उन्हें गरीबी रेखा से हमेशा के लिए उपर उठाना आसान न था। 1982 की घटना है। बासंदा में आदिवासियों के बीच कार्यरत उद्योगपति को लोकसेवक अरविंद भाई मफतलाल ने इन गरीब वनवासियों के सुख हेतु बापू के अनुयायी मणिलाल देसाई को निमंत्रित किया। निमंत्रण स्वीकार कर वे आदिवासियों के बीच जाकर रहे तथा उनकी समस्याओं के समाधान के लिए योजना तैयार की। बापू को जिस तरह गुजरात की नारी शक्ति में विश्वास था, उसी तरह मणिभाई को इन वनवासी महिलाओं की ताकत पर विश्वास था। उन्होंने सोचा कि यदि उनके घर-आंगन में ही आय का स्थाई साधन हो तो दुखों का अंत हो। भूखमरी से जूझने वाले ग्राम जनों की जब तक सहायता नहीं कि जाएगी तब तक बेहतर भारत नहीं बन सकता। अपनी योजना को सफल बनाने के लिए उन्होंने महिलाओं को भी उसमें कार्यरत होने के लिए प्रेरित किया। विकट परिस्थितियों तथा गरीबी में भी इन महिलाओं ने अपने संस्कारों को सहेजा था। उनकी भाषा, पहनावा, श्रृंगार, संगीत, लोकनृत्य, हाथों से बनाए गए वाद्ययंत्र, चित्रकला, कढ़ाई-बुनाई में उनकी जीवन शैली दिखती है। संघर्षमय जीवन के बावजूद उनकी आंतरिक संवेदना अटूट है, अत: उन्हें योजना की बातें समझने में देर न लगी।

वाड़ी योजना के तहत, एक एकड़ की वाड़ी में आम की चालीस कलमें देना निश्चित हुआ। इसके लिए सरकारी अनुदान भी प्राप्त हुआ। इस योजना में वहीं शामिल हो सकता था जो दारू की व्यसनमुक्ति स्वीकारता। वनवासी महिलाओं ने पूरा सहयोग दिया। जब आदिवासी परिवारों ने बायफ के क्षेत्रीय कार्यकर्ताओं के साथ मिल जमीन सुधारणा किया तब बड़ी संख्या में आम की कलमों की आवश्यकता पड़ी। इतने सारे रोप एक साथ कहां से मिले ? वनवासी महिलाओं ने इस चुनौती को स्वीकार किया। उनकी बावली परंपरा से इसका हल मिला। अनन्य परंपरा 'बावली'। स्त्रियों द्वारा स्वयं उगाई गई शाक-भाजी, फल, अन्य वृक्ष या बनाई गई वस्तु पर किसी पुरुष का अधिकार नहीं। केवल महिलाओं का ही अधिाकार। व्यक्तिगत रूप से वावली करती महिलाओं को बीस-बीस के गुच्छ में कलम तैयार करना सिखाया गया। महिलाएं दिन में ही नहीं रात में भी कलम तैयार करने में जुट गई। काम के साथ सरकारी आर्थिक मदद भी उन्होंने प्राप्त की। अब सच्चे अर्थ में समूह वावली प्रथा से नारी मुक्ति आंदोलन की शुरूआत हुई। झोपड़ों में बंद दरवाजों के पीछे बैठी, टीलों पर, जंगलों में रहने वाली महिलाएं स्वजाति और परिवार की आर्थिक उन्नति के लिए बाहर निकली। पुरुषों के बराबर श्रम कर 'आल्फोंजो' आम की कलम समयानुसार तैयार की। वावली के दो समूह में लगभग पंद्रह सौ महिलाएं काम पर लग गई और स्वाश्रय दल की रचना हुई। बंधन में जकड़ी जिंदगी से वे मुक्त हुई। समाज से उपेक्षित इन महिलाओं ने स्वश्रम से तैयार किए रोपों को अपने गांवों में ही नहीं बल्कि आसपास के क्षेत्रों में भी बेचा। आर्थिक उन्नति होते ही वे एक पक्षीय माहौल से बाहर निकली। इन महिलाओं ने अपनी परंपरा निभायी, गरिमा संभाली और समाज की मुख्यधारा में मिलती गई। अपनी आंतरिक शक्ति से मुसीबतों को पार करती गई। आदिवासी पुरुषों का सहारा बन सके उनके साथ खड़ी रही। जीवन में सुधार किया। उन्हें आवश्यकता थी बस थोड़ी सहानुभूति की थोड़ी समझ और सहारे की, जो उन्हें मिली डॉ. मणिभाई से, बायफ के कर्मचारियों से तथा सरकारी मददगारों से। धारमपुर, वासंदा क्षेत्र में कभी जाकर देखिएगा। वहां एक लाख से अधिक फलदार, वृक्ष, केरी और काजू की वाड़ी अस्सी लाख वनवृक्ष, जामफल, बेर, चीकू के बाग आपकी आंखों को ठंडक पहुंचाएगें।

 

 

मीनाक्षी जोशी