संस्करण: 26जनवरी-2009

पेट्रोलियम पदार्थ
बने पर्यावरणीय संकट
 

 

 

प्रमोद भार्गव

पेट्रोलियम पदार्थ, कोयला और प्राकृतिक गैसों के लगातार बढ़ते उपयोग से पैदा हो रहा प्रदूषण पर्यावरण के लिए बढ़ा खतरा साबित हो रहा है। एक अनुमान के अनुसार इससे भारत को लगभग 200 खरब रुपये की वार्र्षिक हानि उठानी पड़ रही हैं। यहीं नही वायु में विलोपशील हो जाने वाले इस प्रदूषण से सांस, फेफडों, कैंसर हृदय व त्वचा रोग संबंधी बीमारियों में इजाफा हो रहा हैं। पेटोलियम पदार्थो का समुद्री जल में रिसाव होने से जल प्रदूषण का अलग से सामना करना पड़ रहा है। गोया पेट्रोलियम पदार्थ एक साथ मिट्टी, पानी और हवा को दूषित करते हुए मानव जीवन के लिए वरदान की बजाय अभिशाप साबित हो रहें हैं।

देश ही नहीं दुनिया के समुद्री तटों पर पेट्रोलियम पदार्थों और औद्योगिक कचरे से भयावह पर्यावरणीय संकट पैदा हो रहे हैं। तेल के रिसाव, तेल टैंकों के टूटने व धोने से समुद्र पर्यावरणीय परिस्थिति - तंत्र इको सिस्टम बेतरह प्रभावित हो रहा है। आए समुद्री तल पर 2000 मीट्रिक टन से भी ज्यादा तेल फैलने व आग लगने के समाचार प्रति पखवाड़े आत रहते है।

यदि राष्ट्रीय समुद्र विज्ञान संस्थान की रिपोर्ट पर गौर करें तो केरल के तटीय क्षेत्रों में तेल से उत्पन्न प्रदूषण के कारण झींगा और चिंगट मछलियों का उत्पादन 25 फीसदी कम हो गया है। हाल ही में डेनमार्क के बाल्टिक बंदरगाह पर 1900 टन तेल के फैलाव के कारण प्रदूषण संबंधी एक बड़ी चुनौती उत्पन्न हुई थी।

इक्काडोर के गैलापेगोस द्वीप समूह के पास समुद्र के पानी में लगभग साढ़े छह लाख लीटर डीजल और भारी तेल के रिसाव से मिट्टी, समुद्री जीव और पक्षी खतरे में पड़ गए थे। गुजरात में आए भूकम्प के बाद कांडला बंदरगाह पर भंडारण टैंक से लगभग 2000 हजार मीटिक टन हानिकारक रसायन एकोनाइटिल एसीएन फैल जाने से क्षेत्रवासियों का जीवन संकट में पड़ गया था। इसके ठीक पहले कांडला बंदरगाह पर ही समुद्र में फैले लगभग तीन लाख लीटर तेल से जामनगर के पास कच्छ की खाड़ी के उथले पानी में स्थित समुद्री राष्टीय उद्यान में दुर्लभ जीव-जंतुओं की कई प्रजातियाँ मारी गई थीं।

जापान के टोकियों के पश्चिमी तट पर 317 किमी की पट्टी पर तेल के फैलाव से जापान के तटवर्ती शहरों में हाहाकार मच गया था। रुस में बेलाय नदी के किनारे बिछी तेल पाइप लाइन से 150 मीटिक टन के रिसाव ने यूराल पर्वत पर बसें ग्रामों ग्रामवासियों को पेय जल का संकट खड़ा कर दिया था। सैनजुआन जहाज के कोरल चट्टानों से टकरा जाने के कारण अटलांटिक तट पर करीब तीस लाख लीटर तेल का रिसाव होने से समुछ्री जीव प्रभावित हुए।

मुंबई हाई से लगभग 1600 मीटिक टन तेल का रिसाव हुआ। इसी तरह बंगाल की खाड़ी में क्षतिग्रस्त तेल से फैले टैंकर ने निकोबार द्वीप समूह में तबाही मचाई। जिससे यहां रहने वाली जनजातियों और समुद्री जीवन को भारी हानि हुई। लाइबेरिया के एक टैंकर से 85000 मीटिक टन रिसे तेल ने स्कॉटलैण्ड में पक्षी- समूहों को बड़ी तादात में हानि पहुंचाई।

सबसे भयंकर तेल का फैलाव यूएसए के अलास्का में हुआ था। यह रिसाव प्रिंस विलियम साउण्ड टेंकर से हुआ था। इस तेल के फैलाव का असर छह माह तक रहा। इस अवधि के दौरान इस क्षेत्र में 35000 पक्षी, 1000 ओस्टर शेलफिस और 15 व्हेल मछली मरी पाए गए थे। इसके बावजूद इस घटना का असर इराक द्वारा खाड़ी युध्द में सद्दाम हुसैन द्वारा समुद्र में छोड़े तेल से कम था। यह तेल इसलिए छोड़ा गया था कि कहीं यह अमेरिका के हाथ न लग जाए। अमरिका द्वारा इराक तेल टेंकरों पर की गई बमबारी से भी लाखों टन तेल समुद्री सतह पर फैला। एक अनुमान के मुताबिक इस कच्चे तेल की मात्रा 110 लाख बैरल थी। इस तेल के बहाव ने फाइस की खाड़ी में घुसकर जीव जगत के लिए भारी हानि पहुँचाई। इस प्रदूषण का असर मिट्टी, पानी और हवा तीनों पर रहा। जानकारों का मानना है कि इराक युध्द का पर्यावरण पर पड़ा दुष्प्रभाव हिराशिमा पर हुए परमाणु हमले, भोपाल गैस त्रासदी और चेरनोबिल से भी ज्यादा था। इस कारण इराक का एक क्षेत्र जेहरीले रेगिस्तान में तब्दील हो गया और वहां महामारी का प्रकोप भी अर्से तक रहा।

भारतीय विज्ञान कांग्रेस में गैर परंपरागत उर्जा स्त्रोत मंत्रालय के वरिष्ठ सलाहकार डाँ.एस.के. चोपड़ा ने चौकाने वाली जानकारी दी हैं। उनके मुताबिक 200 खरब रुपये की पर्यावरणीय क्षति अकेले पेट्रोलियम पदार्थो के इस्तेमाल के कारण उठानी पड़ रही हैं। इस बजह से 42.6 प्रतिशत, कोयले से 37.4 और प्राकृतिक गैसों के प्रयोग से 20 प्रतिशत पर्यावरण को हानि हो रहीं है। तेल के रिसाव से जो मिट्टी का क्षरण होता वह हानि करीब 200 अरब रुपयों की हैं, जो कुल कृषि उत्पाद का 11 से 26 फीसदी है।

ईंधान उपयोग में विश्व में भारत का पाचवां स्थान है और 1981 से 2002 के बीच इसमें सालाना 6 प्रतिशत की वृध्दि हो रही हैं। पेटोलियम पदार्थों से होने वाली पर्यावरणीय हानि इन्हें आयात करने में खर्च होने वाली करोड़ों डालर की विदेशी मुद्रा के अलावा हैं। गौरतलब है कि भारत अपनी कुल पेट्रोलियम जरुरतों की आपूर्ति का 70 प्रतिशत तेल आयात करके करता है। भारत प्रति वर्ष टाटा द्वारा नैनो के रुप में सस्ती कार को तोहफा मानकर हम इतरा रहें है। लेकिन यह कार सस्ती होने के कारण 20 हजार की मासिक आमदनी वाले व्यक्ति की क्रय शक्ति में होगी, इसलिए पेटोल आयात की मात्रा बढ़ानी होगी, जो पर्यावरणीय संकटों को बढ़ावा देंगे।

दुनिया में करीब 63 करोड़ वाहन मार्गों पर गतिशील हैं। जिनमें लगाया जा रहा डीजल-पेटोल का उपयोग प्रदूषण का मुख्य कारण हैं। प्रदूषण रोकने तमाम उपायों केबावजूद 150 लाख टन कार्बन मोनोआक्साइड, 10 लाख टन नाइटोजनआक्साइड, और 15 लाख टन हाइड्रोकार्बन हरेक साल वायुमंडल में बढ़ जाते है। जीवाश्म ईंधान के प्रयोग से सालाना करोड़ो टन कार्बनडाइआक्साइड पैदा होती है जो ओजोन-परत को खतरा बन रही है। विकसित देश वायुमण्डल प्रदूषण के लिए 70 फीसदी दोषी है जबकि विकासशील देश 30 फीसदी।

पेटोलियम पदार्थो के जलने से उत्पन्न प्रदूषण फेंफड़ों का कैंसर, दमा, ब्रोकाइटिस, टीबी, हृदय रोग और अनेक त्वचा संबंधी रोगों का कारक बना हुआ हैं। कैंसर के मरीजों की संख्या में 80 फीसदी रोगी वायुमण्डल में फैले विषैले रसायनों के कारण ही होते है। दिल्ली में फेफड़ों के मरीजों की संख्या कुल आबादी की 30 प्रतिशत है जो दूषित वायु के शिकार है। दिल्ली में अन्य इलाकों की तुलना में सांस और गले की बीमारियों के रोगियों की संख्या 12 गुना अधिक है। इन बीमारियों से निजात पाने के लिए भारत के प्रत्येक नगरीय व्यक्ति को 1500 रुपये खर्चने होते है। विश्व बैंक ने जल प्रदूषण के कारण स्वास्थ्य पर पड़ने वाले असर की कीमत 110 रु. प्रति व्यक्ति आंकी है, जो समुद्रतटीय क्षत्रों में रहते हैं।

समुद्री खाद्य पदार्थो पर पेट्रोलियम अपशिष्टों का अपशिष्टों का असर भी पड़ता है। इस दूषित जल से ओस्टर शेल फिश कैंसर से पीड़ित हो जाती हैं। इन जाने में मासांहारी लोग इन्हीं रोगालु जीवों को आहार भी बना लेते हैं। इस कारण मासांहारियों में त्वचा संबंधी रोग व अन्य लाइलाज बीमारियां घर कर जाती हैं। बहरहाल लगातार बढ़ती पेटोलियम पदार्थों की खपत वायुमण्डल और मानव जीवन को संकट में डालने वाले साबित हो रहे हैं।
 

प्रमोद भार्गव