संस्करण: 26जनवरी-2009

राजनीतिक अस्थिरता से
झारखण्ड का भविष्य अधर में
 

 

अंजनी कुमार झा

त्ता मोह की जकड़न और उच्च महत्वाकांक्षा के कारण झारखण्ड में भी लोकतंत्र की मर्यादा की लगातार उड़ रही धज्जियों ने हास्यास्पद स्थिति पैदा कर दी है। राष्ट्रपति शासन समस्या का हल नहीं है। बिना विधायक के मुख्यमंत्री पद पर आसीन होने की चयन और सत्ता के दुरूपयोग ने अकस्मात झारखण्ड को सुर्खियों में ला दिया है। झारखण्ड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) के सुप्रीमो शिबू सोरेन ने हर सौदेबाजी की कीमत कांग्रेस से वसूली।

नरसिंहराव सरकार की दीर्घायु के लिए वोट के बदले नोट लेकर विवादों से घिरे सोरेन को जब नायाब तोहफे देने की कोशिश की गई तो विपक्षी दल भाजपा ने तीव्र विरोध किया। केंद्रीय मंत्री बनते ही दागी मंत्री का स्वर तेज होने के कारण सोरेन को इस्तीफा देना पड़ा। झा हत्याकांड के आरोपी सोरेन पर कई मुकदमे चल रहे हैं। मनपसंद कोयला मंत्रालय का पद अत्यंत अल्प समय तक ही रह सका। गुरुजी के नाम से मशहूर सोरेन के प्रति संथाल परगना (झारखण्ड का एक हिस्सा) में आज भी गहरी आस्था विद्यमान है, किंतु सत्तामोह ने उनके व्यक्तित्व को काफ़ी बौना कर दिया। अपने विरोधी लालू के राजद और कांग्रेस से गठजोड़ कर उन्होंने अपने राजनीतिक क्षितिज को लघु रूप दे दिया। इसी कारण मुख्यमंत्री बनने के चार माह बाद ही तमाड़ उपचुनाव में वे आठ हजार वोटों से पराजित होकर राजनीति के काले अधयाय में अपनी उपस्थिति दर्ज करा ली। स्थापना के आठ साल में राज्य ने छह मुख्यमंत्रियों को आजमया। जनादेश न मिलने के कारण तीन साल पुरानी विधानसभा में किसी को बहुमत नहीं मिल सका। 8 जनवरी को उपचुनाव में करारी शिकस्त के बाद 12 को सोरेन ने रूंधो गले और भारी दबाव में इस्तीफा दिया। अगर वे पद न छोड़ते तो संवैधानिक संकट खड़ा हो जाता।संविधान निर्माताओं ने कभी यह कल्पना नहीं की थी कि ऐसी भी स्थिति पैदा हो सकती है।

पद की लिप्सा ने सोरेन को भावशून्य बना दिया। विगत दो दशक से कभी कोयला मंत्री बनने की जिद तो कभी मुख्यमंत्री की कुर्सी पर कब्जा करने की महत्वाकांक्षा ने सोरेन की लंबी तप को स्याह कर दिया। पत्नी रूपा सोरेन को तात्कालिक सी.एम. बनाकर चुनाव में उतारना चाहते थे लेकिन इस पर उनके दल के लोग सहमत नहीं हुए। चंपई के नाम पर संप्रग के नेता तैयार नहीं हैं क्योंकि सभी को पता है कि पर्दे के पीछे से सोरेन सरकार चलायेंगे। सवाल उठता है कि नवंबर, 2000 में उदित तीन प्रदेशों झारखंड, उत्तराखंड और छत्तीसगढ़ में आखिरकार झारखंड की हालत सबसे ज्यादा अस्थिर और नाजुक क्यों है ? पहले मुख्यमंत्री भाजपा के बाबूलाल मरांडी बने। अंतर्कलह और गुटबाजी के कारण मरांडी को बाहर होना पड़ा तो अर्जुन मुंडा की ताजपोशी हुई।

इससे कुपित होकर मरांडी ने वनांचल विकास पार्टी ही बना डाली। वर्ष 2005 में जब विधानसभा चुनाव हुआ तो किसी को बहुमत नहीं मिला। फिर यूपीए ने केंद्र के फार्मूले को झारखंड में आजमाया। शिबू सोरेन के नेतृत्व में सरकार बनी, किंतु अटलबिहारी वाजपेयी की तरह वह भी विश्वासमत हासिल करने में विफल रहे। तोड़फोड़, जोड़तोड़ से राजग ने अर्जुन मुंडा को सत्ता की चाबी दी, किंतु डेढ़ साल बाद ही संप्रग की शह पर निर्दलीय विधायकों ने मुंडा सरकार का तख्ता पलट दिया। फिर निर्दलीय विधायकों ने राजनीति की नई इबारत लिख दी। भाजपा से नाराज मधु कोड़ा गुटीय राजनीति के शिकार हुए और संप्रग व घटक दलों के समर्थन के बल पर देश के पहले निर्दलीय मुख्यमंत्री बने। लेकिन सोरेन की धृतराष्ट्री अंध महत्वाकांक्षा के आगे पुन: यूपीए नतमस्तक हुई। बिना किसी कारण को बताये या बनाये चंद्रशेखर सरकार की भांति राज्य में कोड़ा सरकार को 27 अगस्त को छुट्टी कर सोरेन की ताजपोशी कर दी गई।

कोड़ा या सोरेन में भला क्या अंतर। दोनों कृपापात्र मुख्यमंत्री थे। सत्ता की डोर तो कांग्रेस और राजद के पास थी। ऐसी परिस्थिति में बिना जवाबदेही के शासन चलाना उपहास को फैलाता है। भ्रष्टाचार और बेरोजगारी के दंश से सूबा कराह रहा है। इसके बावजूद सभी दल राजनीतिक रोटियां सेंकने में जुटे है। झूठे वायदे कर भला, यह क्या मुंह दिखायेंगे। राजनीतिक नाटक का मंच बन चुके झारखंड में सोरेन को खलनायक बना दिया गया। सियासी जीवन की सबसे शर्मनाक हार का सामना करने के बाद भी सोरेन ने छवि सुधारने में दिलचस्पी लेने के बजाय कुर्सी से न हटने का एलान कर संविधान विशेषज्ञों के लिए मुसीबत खड़ी कर दी थी। चौतरफा दबाव के बाद मुर्सी का मोह छोड़े सोरेन का यह हट उनके गौरवशाली अतीत को मटियामेट करता है। लोकतांत्रिक तकाजों और लोकलाज को नष्ट करने से मर्यादा पर ग्रहण लग गया है। स्वतंत्र भारत के इतिहास में वे दूसरे ऐसे मुख्यमंत्री रहे जो उपचुनाव में हारे। इससे पूर्व 1971 में त्रिभुवन में हार के बाद उत्तर प्रदेश को मुख्यमंत्री का पद छोड़ना पड़ा था।

सत्ता के इस वीभत्स खेल ने झारखंड को बीमारू प्रदेश बना दिया है। पलायन और भुखमरी इसकी नियति है। नये प्रदेश से विकास की असीम संभावनायें बनी थीं, किंतु राजनीतिक अस्थिरता से विकास कोसों दूर चला गया। यह राज्य के भविष्य के लिए अशुभ है।


 

अंजनी कुमार झा