संस्करण: 26जनवरी-2009

 

पत्रकारिता की बलिवेदी पर

शहीद श्रीलंकाई पत्रकार का घोषणापत्र

 

 

एल.एस.हरदेनिया

श्रीलंका के समाचार पत्र 'दी सनडे' लीडर के संपादक लसनका विक्रमतुंगा की गत 6 जनवरी को उस समय हत्या कर दी गई जब वे अपने कार्यालय जा रहे थे। विक्रमतुंगा श्रीलंका की सरकार के विरुध्द अपने सैध्दांतिक विरोध के लिए जाने जाते थे।

उनकी मृत्यु के बाद 'दी सनडे लीडर' ने वह संपादकीय प्रकाशित किया जो उन्होंने अपने जीवन को आसन्न खतरे के कारण अपने जीवनकाल में लिखा रखा था। यह संपादकीय उन खतरों की जीवंत इबारत है जो हर उस पत्रकार को लिखना पड़ती है जो पत्रकारिता के बुनियादी धर्म का पालन करते हैं। मूल रूप से अंग्रेजी में लिखे गए उस अग्र लेख का हिंदी रूपान्तरण हम यहां प्रकाशित कर रहे हैं।

दुनिया में आम तौर पर सेना को छोड़कर किसी अन्य व्यवसाय से अपनी आजीविका चलाने वाले व्यक्ति से यह अपेक्षा नहीं की जाती कि वह अपने जीवन की बलि दे। परंतु श्रीलंका में पत्रकारों से यह अपेक्षा की जाती है। पिछले कुछ वर्षों में निष्पक्ष मीडिया में कार्यरत पत्रकारों को अनेक प्रकार की ज्यादतियों का सामना करना पड़ रहा है। पिछले वर्षों में इलेक्ट्रॉनिक एवं प्रिंट मीडिया को आगजनी, बमबारी आदि का सामना तो करना पड़ा ही है, उनके दफ्तरों को सील किया गया है और उन्हें तरह-तरह के हथकंडों से परेशान किया गया है। उन्हें तरह-तरह की धमकियां दी जाती हैं और अनेक मामलों में उनकी हत्या तक कर दी गई है। मुझे भी इन सभी प्रकार की ज्यादतियों के दौर से गुजरना पड़ा है।

शायद अब शीघ्र ही मुझे हत्या की धमकी या हत्या का सामना करना पड़ सकता है। मैं पिछले अनेक वर्षों से पत्रकारिता के व्यवसाय में हूं। जहां तक 'दी सनडे लीडर' का सवाल है, उसने 2009 में अपने अस्तित्व के 15 वर्ष पूरे कर लिए हैं। इन 15 वर्षों में श्रीलंका में बहुत कुछ बदला है। अफसोस की बात यह है कि यह परिवर्तन अच्छे के लिए नहीं हुआ है। मेरे समाचार पत्र को और स्वयं मुझे आतंकवादियों और सरकार दोनों के आतंक का सामना करना पड़ा है। हत्या एक ऐसा हथियार है जिसका उपयोग राजसत्ता पत्रकारिता की आवाज को दबाने के लिए आए दिन करती है। आज पत्रकारों को इन खतरों का सामना करना पड़ रहा है। कल जाकर न्यायपालिका को भी इस तरह के दौर से गुजरना पड़ेगा।

इस तरह के खतरों के बावजूद क्यों हम लोग पत्रकारिता के प्रति अपनी प्रतिबध्दता बनाए हुए हैं ? आखिर मेरा भी एक परिवार है, जिसमें मेरी पत्नी है, प्यारे बच्चे हैं। व्यवसाय के प्रति हमारी प्रतिबध्दता के साथ-साथ हमारी इनके प्रति भी जिम्मेदारी है। क्या मुझे इस तरह के खतरे मोल लेना चाहिए ? मेरे मित्र मुझे सलाह देते हैं कि मैं यह व्यवसाय छोड़ दूं। मेरे कुछ अन्य मित्र, जिनमें मेरे राजनीतिज्ञ मित्र भी शामिल हैं, मुझे सलाह देते मैं राजनीति के मैदान में कूद पड़ूं। पत्रकारिता के खतरों के मद्देनज़र मेरे अनेक कूटनीतिक मित्र मुझे अपने देश में शरण देने का ऑफर देते हैं। इस सबके बावजूद ऐसा कौन सा कारण है जिसके चलते मैं पत्रकारिता को अलविदा कहने को तैयार नहीं हूँ ? ऐसा इसलिए है क्योंकि यदि मैं पत्रकारिता छोड़ता हूं तो मैं ऐसा अपनी आत्मा का गला घोंटकर ही कर सकूंगा।

मेरा अखबार एक विवादित अखबार है क्योंकि हम वहीं लिखते हैं जो देखते हैं। मैं चोर को चोर और हत्यारे को हत्यारा कहने से नहीं हिचकिचाता हूँ। हम खोजी पत्रकारिता के हिमायती हैं। हम वहीं लिखते हैं जिसकी सत्यता सिध्द करने के लिए हमारे पास दस्तावेज हैं, ऐसे दस्तावेज जिन्हें जागरूक नागरिक काफ़ी खतरा उठाते हुए हमारे पास पहुंचाते हैं।

इन दस्तावेज़ों और अन्य सूचनाओं के आधार पर पिछले 15 वर्षों में हमने अनेक षड़यंत्रों और अनेक घपलों का पर्दाफाश किया है। हमारे द्वारा लगाए गए आरोपों में से एक भी गलत साबित नहीं हुआ है। आजाद मीडिया एक ऐसा आईना है जिसमें आप अपना असली चेहरा देख सकते हैं। इस आइने में दिखने वाला चेहरा कभी-कभी बदसूरत होता है। जब भी ऐसा होता है, मीडिया के विरूध्द शिकायत की जाती है। परंतु मीडिया भारी खतरे उठाकर ऐसा करता है।

प्रत्येक समाचार पत्र की अपनी कुछ प्रतिबध्दताएं होती हैं। हमारी भी हैं। हमारी प्रतिबध्दता है कि हम श्रीलंका को एक पारदर्शी, धर्मनिरपेक्ष, उदारवादी प्रजातंत्र के रूप में विकसित होते देखना चाहते हैं। इन सारी प्रतिबध्दताओं का अपना निहितार्थ है। पारदर्शी इसलिए क्योंकि हम चाहते हैं कि सरकारों को एक खुली किताब के समान व्यवहार करना चाहिए। धर्मनिरपेक्ष इसलिए क्योंकि एक बहुलतावादी, विभिन्न संस्कृतियों और नस्लों के समान व्यवहार करना चाहिए। धर्मनिरपेक्ष इसलिए क्योंकि हम बहुलवादी, विभिन्न संस्कृतियों और नस्लों तथा बहुधर्मी देश को धार्मनिरपेक्ष होना ही चाहिए। उदारवादी इसलिए क्योंकि हम समाज के सदस्यों को उसी रूप में स्वीकारें जैसे वे हैं। हम उन्हें वैसा बनाने का प्रयास न करें जैसा हम उन्हें देखना चाहते हैं। और प्रजातंत्र क्यों ? यदि कोई चाहता है कि मैं इस संबंधा में स्पष्टीकरण दूं, तो बेहतर होगा कि आप मेरा अखबार पढ़ना बंद कर दें। हमने कभी भी अपनी सुरक्षा की खातिर ऐसे विचारों का प्रकाशन नहीं किया है जो बहुमत को अच्छे लगते हो। इसके ठीक विपरीत हमने ऐसी बातों का भी प्रकाशन किया है जो अनेक लोगों को अच्छे नहीं लगते हैं। जैसे हमने हमेशा यह कहा है कि आतंकवाद को समाप्त करना चाहिए परंतु इसके साथ हमने यह भी कहा है कि हमें उन कारणों का भी पता लगाना चाहिए जो आतंकवाद को जन्म देते हैं। हमने साथ ही राज सत्ता के आतंक का विरोध किया है। संभवत: श्रीलंका दुनिया का एकमात्र ऐसा देश है जो अपने ही नागरिकों पर बम गिराता है। इस तरह के विचारों के कारण हमें भी आतंकवादी बताया जाता है। यदि ऐसा है तो हमें कहलाने में कोई संकोच नहीं है।

कुछ लोगों को संदेह है कि हमारी राजनैतिक महत्वकांक्षाएं हैं। इस बारे में हम स्पष्ट करना चाहेंगे कि उनका यह संदेह बेबुनियाद है। यदि हम सरकार की आलोचना प्रतिपक्ष की अपेक्षा ज्यादा तीखे शब्दों में करते हैं तो उसके कारण स्पष्ट हैं। जबसे यूएनपी सत्ता में आई है हमने अनेक बार उनके भ्रष्ट आचरण एवं उनके द्वारा की गई ज्यादतियों की तीखी आलोचना की है। हमारी कलम कभी-कभी उनके पतन का कारण भी बनी है। हम यदि युध्द और अनावश्यक हिंसा का विरोधा करते हैं तो हमें लिट्टे का समर्थक बताया जाता है। हमारी मान्यता है कि लिट्टे एक क्रूर व दुष्ट संगठन है। ऐसे संगठन को समाप्त करना आवश्यक है। परंतु उसे समाप्त करने की प्रक्रिया में साधारण तमिल नागरिकों के मानवाधिकारों का हनन करना अनुचित तो ही सिंहली जनता के इस दावे के भी विपरीत है कि वो 'धम्म' के सबसे लंबरदार हैं। श्रीलंका के उत्तर और पूर्व पर पूरी तरह से सेना का कब्जा है इसलिए वहां रहने वाले तमिल दूसरे दर्जे के नागरिकों का जीवन व्यतीत करने को मजबूर हैं। उनके तन व मन पर हमने ऐसे गहरे जख्म कर दिए हैं जो मात्र 'युध्दोपरांत विकास' के आश्वासन से ठीक नहीं होने वाले हैं।

सेंसरशिप के बावजूद मेरा समाचार पत्र इन त्रासद स्थितियों के प्रति सभी का धयान आकर्षित करता रहा है। शायद इसलिए मैं सरकार की आंख की किरकिरी बन गया हूं। मुझे इसकी कीमत भी चुकानी पड़ रही है। मुझपर दो बार कातिलाना हमले हो चुके हैं। एक बार तो मेरे घर पर मशीनगन से हमला किया गया। जब भी ऐसे हमले हुए मुझे आवश्यक कार्यवाही का आश्वासन दिया गया। इस तरह के आश्वासन के बावजूद कुछ भी नहीं हुआ। यहां तक की पुलिस द्वारा गंभीरता से जांच भी नहीं की गई। मुझे पूरा विश्वास है कि ये हमले सरकार द्वारा प्रायोजित थे। यहां मैं घोषित करना चाहता हूं कि यदि भविष्य में मेरी हत्या होती है तो उसमें पूरी तरह से सरकार का हाथ होगा। बहुत कम लोगों को यह ज्ञात होगा कि श्रीलंका के वर्तमान राष्ट्रपति महिंद्रा राजपक्षे और मैं वर्षों से दोस्त है। यद्यपि संपादकों के लिए राष्ट्रपति भवन में आयोजित बैठकों में शामिल नहीं होता हूँ, फिर भी शायद ही कोई ऐसा महिना होता है जब देर रात या तो अकेले या कुछ अन्य मित्रों के साथ राष्ट्रपति भवन में राष्ट्रपति महिद्रा से मेरी मुलाकात न होती हो।

मुझे अंदाज है कि जब भी मेरी हत्या होगी महिंद्रा बहुत शोर मचाएंगे। महिंद्रा पुलिस से कहेंगे कि शीघ्र जांच करो, हत्या के लिए  जिम्मेदार अपराधियों को पकड़ो। परंतु इस तरह की जांच का कोई नतीजा नहीं होगा, जैसा कि पूर्व में की गई जांचों में नहीं हुआ। आप भी जानते हैं और मैं भी जानता हूं कि यदि मेरी हत्या होती है तो उसके लिए कौन उत्तरदायी होगा ?

मुझे याद है कि आपने अपने देश के लिए क्या सपने देखे थे। परंतु लगता है सत्ता में आने के बाद आप उन सपनों को भूल गए और देशभक्ति के नाम पर अपने मानवाधिकारों की धज्जियां उड़ाई हैं, भ्रष्टाचार की नई ऊंॅचाईयों को छुआ है और सार्वजनिक धन का बेशर्मी की हद तक दुरूपयोग किया है। अफसोस है आपने अपने सपने इतनी जल्दी भुला दिए। आपका व्यवहार एक ऐसे बच्चे के समान है जो पहली बार खिलौने की दुकान में प्रवेश करने के बाद चाहता है कि दुकान के सारे खिलौने वह अपने साथ ले जाए। वैसे कभी कभी मैं सोचता हूं कि शायद यह तुलना उचित नहीं है क्योंकि कोई भी बच्चा इंसानों का खून नहीं बहाता है। पिछले तीन वर्षों में आप बड़ी मात्रा में खून बहा चुके हैं। आप इस समय सत्ता के मद में इतने चूर हैं कि यह भूल गए हैं कि आपके बच्चे तक आपको निर्दोषों लोगों के खून का जिम्मेदार मानेंगे।

जहां तक मेरा सवाल है मुझे इस बात का संतोषव है कि मैं जीवन भर सिर ऊंचाकर, बिना किसी के सामने झुके चला हूं। मुझे इस बात का भी संतोष है कि मेरी इस लंबी यात्रा में मैं अकेला नहीं था क्योंकि मेरे अनेक पत्रकार सहयोगी मेरी तरह इस लंबी यात्रा पर चल रहे हैं। उनमें से अनेकों को मौत का आलिंगन करने के लिए मज़बूर कर दिया गया है। उनमें से अनेक जेलों में सड़ रहे हैं। उनमें से अनेक मौत के साये में जी रहे हैं। इस सारी स्थिति के लिए आप जिम्मेदार हैं। आप शायद जिंदगी भर नहीं भूलेंगे कि मेरी मौत आपकी पूरी जानकारी में हुई है। मुझे पक्का विश्वास है कि आप मेरे हत्यारों को बचाने का पूरा प्रयास करेंगे।

जहां तक मेरे अखबार के पाठकों का संबंधा है, उनके लिए मेरे होंठों पर एक शब्द आता है-आपका शुक्रिया, आपका धान्यवाद। आपने मुझे जो सहयोग दिया, आप जिस ढंग से मेरे साथ खड़े रहे। इसकी मैंने कीमत और आगे भी चुकाने को तैयार हूं। मेरे हत्यारों को मैं बताना चाहता हूं कि मैं उनके समान कायर नहीं हूं।मुझे ज्ञात है कि किसी दिन मेरी हत्या करके मेरी आवाज को हमेशा के लिए समाप्त कर दिया जाएगा। मेरी हत्या मेरी या उस मिशन की हार नहीं है, जो मैंने किया।बल्कि, मेरी हत्या उन अनेक लोगों के प्रेरणा स्रोत होगी जो मेरी सुंदर मातृभूमि को मानवीय प्रतिष्ठा का सुखद घर बनाना चाहते हैं। अनेक लोग कहते हैं कि मैं क्यों इस खतरनाक रास्ते पर चल रहा हूं। परंतु मैं जानता हूं कि यदि आज मैं नहीं बोलूंगा, तो फिर ऐसा कोई व्यक्ति नहीं बचेगा जो उन लोगों की ओर से बोल सके जो स्वयं नहीं बोल सकते। फिर वे चाहे अल्पसंख्यक हों, चाहे सताए गए हों और चाहे शोषित हों। मुझे पत्रकारिता के मरे कैरियर में जर्मनी के धार्मिक नेता मार्टि नीमोलर ने प्रभावित किया है। वे अपनी जवानी के दिनों में यहूदी विरोधी और हिटलर के प्रशंसक थे। परंतु नाजीवाद का प्रभाव बढ़ने के साथ उन्होंने नाजीवाद के असली इरादों को भांपा। नाजीवाद सिर्फ यहूदी विरोधी नहीं था, वास्तव में वह उन सभी का विरोधी था जो हिटलर और उसकी विचारधारा से सहमत नहीं थे। नीमोलर बोले अवश्य। परंतु वे जब बोले तब तक काफी देर हो चुकी थी। उन्हें सीधो हिटलर की जेल में डाल दिया गया। जेल में रहते हुए उन्होंने एक कविता लिखी थी। यह कविता मैंने वर्षों पूर्व पढ़ी थी। तभी वे सह मेरे दिलो दिमाग पर छायी हुई है। वह कविता है-

पहिले वे यहूदियों के लिए आए
परंतु मैं चुप रहा क्योंकि मैं यहूदी नहीं था
फिर वे कम्यूनिष्टों के लिए आए
मैं उस समय भी चुप रहा क्योंकि मैं कम्यूनिस्ट नहीं था।
फिर वे ट्रेड यूनियन नेताओं के लिए आए
तब भी मैं चुप रहा क्योंकि मैं ट्रेड यूनियन नेता नहीं था
फिर वे मेरे लिए आए
परंतु उस समय तक ऐसा कोई नहीं बचा था जो मेरे लिए बोलता


                     यदि आप कुछ और याद नहीं रखना चाहते तो इसे याद रखें। 'दी सनडे लीडर' आपके लिए है। आप सबके लिए। भले ही आप सिंहली हों, तमिल हों, मुस्लिम हों, नीची जाति के हों, विरोधी हों या अपंग हों।

आप याद रखें जो भी बलिदान हम पत्रकार करते हैं, वह हमारी प्रसिध्दी के लिए नहीं होता है, वह आपके इस दिशा में ईमानदारी से प्रयास किया है।
 

एल.एस.हरदेनिया