संस्करण: 26जनवरी-2009

अब कर्नाटक में हिन्दुत्व आतंकवाद की दस्तक

 

 

सुभाष गाताड़े

हुबली में पिछले साल हुए बम विस्फोट किसी को याद हैं ? छुट्टी के दिन किए गए इन धमाकों में कोई हताहत तो नहीं हुआ था, लेकिन अदालत की इमारत को काफी नुकसान पहुंचा था।

जैसा कि आम तौर पर किया जाता है इसके लिए 'सिमी के तथा जिहादी आतंकवादी संगठनों के नेटवर्क पर दोषारोपण किया गया था और कई मासूम अल्पसंख्यक युवाओं को पुलिस की अवैध हिरासत में कई दिन गुजारने पड़े थे। कर्नाटक विधानसभा के लिए सम्पन्न चुनावों के पहले चरण में अदालत में हुए इन बम विस्फोटों ने एक तरह से भाजपा की डगमगाती नैया को सहारा प्रदान किया था और वह बहुमत के करीब पहुंची थी।

लेकिन जैसा कि कहा जाता है कि सच्चाई को लम्बे समय तक छिपाना सम्भव नहीं होता, और इस सम्बन्धा में भी सच्चाई सामने आ गयी है। पुलिस के मुताबिक इसे ऐसे अपराधी तत्वों ने अंजाम दिया जो उग्रवादी हिन्दुत्ववादी संगठनों से भी गहराईसे जुड़े थे। इनका सरगना नागराज जाम्बागी को कर्नाटक के प्रवीण तोगड़िया के तौर पर सम्बोधित किए जाने वाले एक नेता का निजी सचिव भी रह चुका बताया जाता है।

पिछले दिनों हुबली की अदालत के इन बम विस्फोटों की गुत्थी अचानक सुलझी जिन दिनों बागलकोट की पुलिस एक व्यापारी की हत्या की ततीश में लगी थी। इस सिलसिले में पुलिस ने - नागराज जाम्बागी (उम्र 24 साल) जो बिलागी तालुक के हेग्गूर प्लाट का रहने वाला है, तथा बागलकोट के रमेश पवार (24 वर्ष), बसवराज दिग्गी (22 वर्ष), मंजुनाथ बिन्जावादगी (19 वर्ष), दीपक गोविन्दकर (28 वर्ष), लिंगराज जलगर (24), गोकाक तालुक के होनाकुप्पी गांव के बसवराज रूगी (20), हानामान्थ सैनासकली (22) और बिजापुर के इन्दी तालुक के चन्नाबसप्पा हुनासागी (35 वर्ष) आदि नौ अपराधियों को पकड़ा। गिरतारी के वक्त शायद पुलिस को इस बात का अन्दाज़ा नहीं था कि अपहरण, हत्या, डकैती आदि तमाम मामलों में वांछित इन अपराधियों ने न केवल धारवाड जिले के नेशनल हाइवे के सीगिहल्ली के पास एक पूल पर भी बम रखे थे, जो अचानक आयी बरसात के कारण बेकार हुए थे बल्कि हुबली की अदालत में बम इन्होंने ही रखे थे।

विगत रविवार को ('डकैत विथ हिन्दू आऊटफिट लिंक्स बिहाइंड हुबली ब्लास्ट, 13 जनवरी 2009, इण्डियन एक्स्प्रेस) हुबली में आयोजित प्रेस कान्फेरेन्स में नार्थर्न रेन्ज के इन्स्पेक्टर जनरल आफ पोलिस श्री राघवेन्द्र औराडकर ने हिन्दुत्व आतंकवाद के इस चेहरे को उजागर किया जिसे अपराधी तत्वों से सांठगांठ करने में भी कोई गुरेज नहीं दिखता। राज्य के खुफिया विभाग के सूत्रों ने इस गिरतारी के सम्बन्धा में इण्डियन एक्स्प्रेस को बताया (13 जनवरी 2009) की 'जाम्बागी और रमेश पवार तथा लिंगराज जलागर ये तीनों युवा खुद एक उग्रवादी हिन्दू संगठन के कार्यकर्ता रह चुके हैं।' इतनाही नहीं विश्वस्त सूत्रों ने एक्स्प्रेस प्रतिनिधिा को यहभी बताया कि जाम्बागी काफी समय तक श्रीराम सेना से जुड़ा था। बजरंग दल से सम्बध्द रहे प्रमोद मुत्ताालिक - जिसे कर्नाटक का प्रवीण तोगड़िया कहा जाता है - द्वारा स्थापित यह संगठन 'राष्ट्र रक्षा सेना' भी बना रहा है। वे अपने कार्यकर्ताओं का हथियारों का भी प्रशिक्षण देता है, जिसके लिए जगह जगह शिविरों का आयोजन भी किया जाता है। कुछ समय पहले इसकी तरफ से कोडाला संगमा में ऐसे ही शिविर का आयोजन किया गया था।

पिछले दिनों श्रीराम सेना नामक उपरोक्त संगठन राजधानी दिल्ली में भी अपनी कार्रवाइयों के चलते चर्चित हुआ था, जब कथित तौर पर इसके कार्यकर्ताओं ने 'सहमत' द्वारा आयोजित प्रदर्शनी में जाकर तोड़फोड़ की थी तथा एक अन्य कार्यक्रम में इसका एक कार्यकर्ता दिल्ली विश्वविद्यालय के अधयापक एस. ए. आर. गिलानी के मुंह पर थूकते कैमरे में कैद हुआ था।

'मेल टुडे' ने इस मसले पर जारी रिपोर्ट में (हुबली कोट बाम्बिंग एक्जूड हैड हिन्दुत्व लिंक्स, 13 जनवरी 2009) इस बात को स्पष्ट रखा कि किस तरह हिन्दुत्व आतंक कर्नाटक में पैर जमाया है और किस तरह 'संघ परिवार से सम्बध्द नौ व्यक्तियों को' पिछले दिनों कर्नाटक पुलिस ने गिरतार किया। पुलिस के मुताबिक नागराज जाम्बागी नामक उपरोक्त अपराधी ने - जो सिमी के किसी बड़े सदस्य को खतम करना चाहता था - इस बमकाण्ड को अंजाम दिया। बागलकोट के स्थानीय निवासियों के मुताबिक गिरतार लोगों में से कइयों ने बाकायदा त्रिशूल दीक्षा ली थी, जब विश्व हिन्दू परिषद के अन्तरराष्ट्रीय महामंत्री प्रवीण तोगड़िया की अगुआई में देश के पैमाने पर ऐसे समारोहों का आयोजन किया जा रहा था।

हुबली के बम विस्फोट के पीछे उजागर हुए यह विस्फोटक तथ्य उसी सिलसिले की अगली कड़ी प्रतीत होते हैं, जिसके संकेत मालेगांव से लेकर नांदेड में मिलते रहे हैं। यह कहना अनुचित नहीं होगा कि वर्ष 2008 एक तरह से हिन्दुत्व आतंकवाद के खुलते पर्दों का वर्ष है। मालेगांव बम धमाके में हुए इन संगठनों के हाथ ने, अजमेर शरीफ में हुए बम धामाकों में तथा हैद्राबाद की मक्का मस्जिद में हुए बम विस्फोटों तथा समझौता एक्सप्रेस में हुए बाम्ब ब्लास्ट में भी इन्हीं संगठनों के सदस्यों के हाथ होने के सुराग प्रदान किए थे। अगर महाराष्ट्र एटीएस के प्रमुख हेमन्त करकरे जिन्दा रहते तो तय था कि वह मामले की तह तक पहुंचते।

वैसे अब मुल्क का शायद ही कोई सूबा बचा हो जहां हिन्दुत्व आतंकवाद का असर नहीं नज़र आता होगा। जनवरी 2008 में तमिलनाडु के तेनकासी में अगर संघ कार्यालय पर हुए बम हमले में गिरफ्तार हिन्दु मुन्नानी के कार्यकर्ताओं ने इसके तमिल संस्करण को सामने लाया था तो अगस्त 2008 में कानपुर धामाकों में संघ परिवार - बजरंग दल से सम्बध्द दो कार्यकर्ताओं की बम बनाते समय हुई मौत ने यह स्पष्ट किया था कि सूबा यूपी में भी वह गहरे जड़ जमा चुका है। लोगों को याद होगा कि वरिष्ठ पुलिस अधिकारी का वक्तव्य जिसमें उन्होंने साफ किया था कि कानपुर में मरे इन संघी आतंकवादियों ने बमों का इतना बड़ा जखीरा एकत्रित किया था कि आधा कानपुर तबाह हो सकता था।

यह कहना ज्यादा उचित होगा कि सितम्बर 2008 में मालेगांव में हुए आतंकी हमले में हुई साधवी प्रज्ञा एवम दयानन्द सरस्वती, मेजर पुरोहित आदि की गिरतारी और उसमें अभिनव भारत तथा अन्य छोटे मोटे हिन्दुत्व जमातों की सक्रियता ने पूरे देश को इस परिघटना से रूबरू कराया था। नया साल शुरू होते-होते इस बात का खुलासा कि मई 2008 में हुबली, कर्नाटक में हुए बम विस्फोट दरअसल हिन्दुत्व आतंकवादियो की कारगुजारी है, यह इसी बात को रेखांकित करता है कि देश का कोई भी कोना बचा नहीं है जहां हिन्दुत्व ब्रिगेड के आतंकवादी अलग अलग नामों से सक्रिय न हों।

जैसे कि अक्सर होता है प्रमोद मुत्तालिक या उनके संगठन ने - जहां संघ परिवार के तमाम संगठनों की तरह सदस्यता का स्वरूप अनौपचारिक किस्म का होता है - यह मानने से इन्कार कर दिया कि जाम्बागी और उसके आठ आतंकी साथी श्रीराम सेना से सम्बध्द है। हां, उनकी रिहाई के लिए कोशिश करने तथा कानूनी सहायता प्रदान करने का इरादा उसने जाहिर किया। याद होगा कि मालेगांव के आतंकवादियों से भी प्रत्यक्ष रिश्ता होने से संघ परिवारजनों ने इन्कार किया था, लेकिन उन्हें कानूनी सहायता देने की बात भी कही थी।

इसे विडम्बना ही कहा जाएगा कि मुम्बई आतंकी हमले के बाद भारत एवम पाक के बीच जारी नूराकुश्ती की आपाधापी में कर्नाटक से आयी इस अहम ख़बर पर किसी का ध्यान नहीं गया है। यह कम विचलित करने वाली बात नहीं कि राष्ट्रीय महत्व का यह समाचार - जो समूचे देश में पैर जमाए हिन्दुत्व आतंकवाद के तानेबाने को बेपर्द करता है -एकाधा अंग्रेजी अख़बारों में प्रकाशित होने के अलावा अन्य कहीं स्थान भी नहीं पा सका है।

 

सुभाष गाताड़े